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सोमवार, 31 अगस्त 2009

जीवन भगवन

मन की गुथी खोल रे भगवन
कसा है यह मन
यहे चंचल मन कभी अटके कभी भटके
कभी सवाल करे कभी जवाब दे
कभी हसाए कभी रुलाये
कभी भलाई कर पछताए कभी कपट
कभी जलन दिखाए तो कभी प्यार ।

क्या है यह मन ,गुथी खोल रे भगवन
कभी ऊँचे सपने दिखाए
कभी धरातल दिखाए
अपनों को करे पराया
परयो को अपना
कभी मरने को चाहए
कभी जीवन जीने की चाह जगाये।

महके सारा जीवन
में रोऊँ टीओ सब हसे
कसे है यहे जीवन
सब फसे मोह माया में
मन तो चंचल है
इसकी गुथी खोल रे भगवन ॥

जीवन वरदान है

आज नहीं तो कल सबको जाना है
जीवन चक्र को निभाना है
खाली हाथ आना और जाना है
खुशियों को गम से क्यों दबायेंगे
कल की चिंता में आज भी गवाएंगे
कल को आज होना ही है
समय चक्र को चलना है
शरीर ख़राब नहीं मन में व्याधि है
सच है जीवन एक पहेली है
जो जीवट है वो खुश है
जहाँ दुःख है वो मरघट है
किस्मत को रोना बस खोना ही खोना है
असफलताओ पे रोना नहीं उससे सीखना है
रोते हुए आना और हस्ते हुए जाना है
पाप पुण्य झमेला है
जो पाया वोही खोना है
आज कल की तस्वीर है
कुछ भी करो समय को नहीं रोक पाओगे
लिखा है तो होना ही है
क्यों मर्त्यु की दरख्वास्त है
जबकि जीवन ही वरदान है ।

जीवन की आस

मेरे मन की गहरायिओं का फ़साना हो तुम
मेरे जीवन का गुरुरु हो तुम
मेरे अक्स की परछायी का सुरूर तुम
तुम्हारा मेरे प्यार हो तुम ।

सपनो के भवर में ,मुझे ले जात्ते हो
कभी खयालो में गुनगुनाते हो
मेरे मन की बात को बिना कहे समझ जाते हो
मेरे जीवन की नईयां के खिवायिया हो तुम ।

अंधेरे मन के उजाले तुम
सुने जीवन के सहचर तुम
खुशियों के पुंज से महकती रहे यहे जीवन संध्या
तुम्हारे हमकदम सदा है हम ।


मेरे मन्दिर के देवता हो तुम
मेरे हर काम की खुशी तुम
मेरे संकल्प के ताकत हो तुम
मेरे सपनो की ताकत हो तुम ।

मेरे अरमानो का प्रकाश हो तुम सिर्फ़
तुम से बहुत प्यार यहे इज़हार नहीं इकरार है
,एक जीवन बंधन का
जिसमे प्यार,सम्मान ,खुशी और शान्ति
हो अनकहा रिश्ता हो संस्कारो का सम्मान हो ।

जिसका कोई सहारा न वो तलाश हो
तुम थक गए थे अकेले इस जीवन में
आज वो रास्ता तुम
अरमान जगा न करना हमे हताश तुम
इस डोर का आखिरी किनारा तुम ,
जीवन की आस हो तुम ।

जीवन की उड़ान

आकांशा की ऊँची उड़न ने कहा
मत जगाओ मुझे सुप्त ज्वालामुखी हु में
लावा रिस्ता है गरम है
नुकसान न पहुँचा रहा किसी को
सिर्फ़ पुकार रहा निकल जाने मुझे
आकंशाओ की ऊँची उड़ान ने रास्ता दिया
रहा दूर थी जब उमंगो ने जनम लिया
समय की धारा के साथ मिलाप हो गया
टूटी डोर से नाता बरसो का हो गया
बन गई नई राहें जिनसे कोई वास्ता न था
इस उड़ान को कलम ने सहारा दिया
किताबो ने बनाये नींव अभिलाशाओ की झड़ी लग गई
जिन्दा लाश में ज़िन्दगी बस गई
आंसू खुशी बनके छलक गए
गम के साये मंदिरा में डूब गए
वक्त की रफ्तार बदल गई
धरती ने अंचल दिया
अस्मा ने समेत लिया
कहाँ मत छोड़ो इन आकंशाओ को
यही जीवन की सबसे ऊँची उड़ान है ।

जीवन सार

जीवन एक कशमकश है
इसी में छिपी कहानी जीवन का सच है
तुम आए हो ,तुम्हारा मकसद है
तुंहारा लेखा जोखा है
तुम्हारी किस्मत है
पर इसको जीना तुम्हारी फितरत है
अच्छी बुरी किस्मत नहीं नजरिया है
जिससे बनेगी तुम्हारी दुनिया
निराशा ,दुःख असफलता तुम्हारी है
आशा ,खुशी ,प्यार दूसरो का है
तुम नहीं फेसला करना वाले
क्या तुम्हारा है
यह तो इन्सान का जाना और माना है ।

जीवन यात्रा

जीवन बिन मर्त्यु नहीं,हार बिन जीत नहीं
पानी बिन जगत नहीं, माली बिन बाग़ नहीं
भगवन बिन भक्त नहीं , रात बिन दिन नहीं
शक बिन विश्वास नहीं , समस्या बिन समाधान नहीं
किसान बिन खेत नहीं , जन बिन देश नहीं
मन बिन कार्य नहीं , गम बिन खुशी नहीं
कृष्ण बिन राधा नहीं , सूर्य बिन चाँद नहीं
लय बिन गीत नहीं , झूठ बिन सच नहीं
कमल बिन कीचड़ नहीं , स्त्री बिन पुरूष नहीं
पतझड़ बिन वसंत नहीं , बरखा बिन सावन नहीं
खुशी बिन गुन नहीं, बीमार बिन दवा नहीं
राही बिन पथ नहीं , पथ बिन यात्रा नहीं

चोला बदल कर नए भेष में आना है जाना है
यहे जीवन तो अंतहीन यात्रा है ॥

जीवन से मुक्ति

ध्यान की अन्त्प्रेक्षण , मूल का भाव
कर्म की प्रतिष्ठा ,कार्य का योग
विचार का द्वार ,हार का परिष्कार
जीता का परिष्कृत , सत्य का चैतन्य
पदार्थ की मिथ्यता,जीवन का स्वरुप
स्वरुप का बंधन , बंधन से रिश्ते
क्योंकि रिश्ता धरम है ,धरम ही कर्म है
कर्म ज्ञान है ,ज्ञान शक्ति है ,शक्ति ही युक्ति है
इससे ही जीवन की मुक्ति है ।

जीवन का सिद्धांत

आज फिर नई सुबह ने ली अंगडाई
जगा रही उमग तरंग को
याद दिला रही कल की खामी को सुधारो
विश्वास जगा रही नई सुबह
सुबह कभी नहीं दोहराती
हर सुबह नई किरण के साथ ढेरो पैगाम लाती
बना लो इस जीवन का सिद्धांत रोज़ करो एक नया काम ।

रविवार, 30 अगस्त 2009

जीवन चाहत

सुर्ख खाक होती ज़िन्दगी में
फूल की चाहत नहीं
बूँद के मोती में बदलने की आरजू नहीं
सिर्फ़ एक चाहत है
चेन की एक सास चाहिए
रात की सुकून भरी नीद
ताकि कल को नई नज़र से देख पाए
सिर्फ़ सुकून के दो पल बहुत है
लम्बी से जिंदगी के लिए ।

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

मोहबत

आपके देखने का अंदाज़ हमको भा गया
और हम अपना दिल गवा बेठे
आपको सुरूर में रंग गए हम
चाहत की दिल्लगी है या अफसाना प्यार का
इस तरह के इज़हार से मुश्किलहै पता लगना
आपकी यहे शोखियाँ नज़र उठाने का अंदाज़
करता है आपकी मोहबत का इज़हार
शायद हम आज रूबरू हुए अपने अक्स से
या सिर्फ़ खयालो की परछहयिए है
हर तरफ़ हलचल है आपकी रंगत है
शायद इसलिए मोहबत ख़ुद को मिटने का नाम है
सिर्फ़ आपका नाम ही चारो तरफ़ दिखता है
इसलिए तुझ में रब दिखता है ।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

तुम ..सिर्फ़ तुम

हर वक्त मेरे साथ रहते हो
हर लम्हा हर पल एक नया एहसास देते हो
मेरे खयालो की परछायी बन जाते हो
आँखों में तुम्हारा अक्स दिखता है
बातो में तुम्हारा असर होता है
हर काम में मेरा ख्याल बन जाते हो
आंसू गिरने से पहले उठा लेते हो
सपनो को हकीकत बना देते हो
सब कुछ खूबसूरत बना देते हो
तुम्हारी सोच से महकता यह मन
अक्स की जगह जो तस्वीर बने हो
शिदत से जो इंतज़ार था उसको सफल किया है
मेरी सुनी आँखों की चमक बन गए हो
ज़िन्दगी की रौशनी बन गए हो
और क्या कहू हमेशा इसे ही रहना
मेरी कविता की प्रेरणा बन गए हो ।

मेरा प्यार

किसी बच्चे की निश्चल हसी में
किसी पोधे की महकती खुशबो
ओस की बूंद में ,यदि मेरा अक्स नज़र आए तो
समझ लेना मेरा प्यार whi है


उड़ते पंछी में , बहती नदी में
बीमार के आराम में, रिश्तो की गर्माहट में
यदि तुम महसूस करो
तो मेरा प्यार प लिया

बडो की इज्ज़त में परम्परो के samaman में
अपनी आँखों में ,बडो छोटे की जरुरत में
यदि तुमने मुझे खोज लिया
मेरा प्यार तुम्हारा है

भगवन की भक्ति में ,संत की विनती में
गीत के सुर में ,यदि तुमने मुझे देख लिया
तो में सदा के लिए तुम्हारी हु ।

एक गम

दो बूंद आस की जा मिली समन्दर में
कर गई सारा पानी खारा
इतना दर्द था उन आसुंओ में
इतना सा सहारा था
इतना नमकीन घुला था जीवन में
कोई राग नहीं कोई द्वेष नहीं
कितनी मार खायी से यहे ज़िन्दगी से
छोटी छोटी खुशियों के लिए तरस है यहे दिल
बुझ गई आशा की किरण
पता नहीं कहाँ ला के खड़ा कर दिया
एक पल में बदला यह जीवन
छुट गया सब और दे गया एक रंज
हर पल इस तरह जीने के लिए ।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

ख्याल - एक लम्हे का

ऊँचे असमान को देख छिपने को जी चाहता है
धरती देख समाने को जी करता है
बस अब और नहीं मन यहं रमता है
सूरज की किरणों से अपनी जगह टटोलती हु
नए सपनो को बुनने के लिए ठोस आधार दूंद रही हु
समन्दर की अथाह गरह्यिए सा यहे जीवन अपने में समेट रहा है
ऊपर से निर्मल जीवन अन्दर के तूफान को नहीं पढ़ पा रहा है
एक तड़प उठती है जाने की
फिर जिंदगी अपनी ओर खीच लेती है
जीवन चल निकलता है
एक रूकावट धम से गिरा देती है
बंजर सी बेजार होती यहे ज़िन्दगी
चंद टुकडो के खातिर झुठला दिया वजूद को
ख्वाबो के दबे करवा पर बेठे लोगो की उम्मीद कुचल गया एक लम्हा
फिर एक टूटी ,लाचार,बेबस ,बेइंतहा परीक्षा लेती
अब तो तेरे दर पे मालिक पटक पटक के मर जाने दे
और साहस नहीं ऐसे जीवन जीने का ।

सपना

सपने का कोई ओर नहीं कोई ठोर नहीं
सबके मन में बसते
अपनी राह ख़ुद चुनते
जबान पर आने से कतराते
जोश जस्बे के साथ किस्मत का साथ भी चाहते
कभी टूटने का दर्द पगला देता
कभी आंखे नम कर जाता
कभी पसीने से तरबतर कर जाता
सच्चे हो न हो पर अच्छे होते सपने
कभी मकसद दे जाते सपने
कभी कोरी कल्पना बन जाते सपने
सपनो के गलियारों में गोते लगना सब को सुहाता
काश ! सबके सपने सच हो जाते
कोई नहीं इन्हे तोड़ पता
बुनने से नहीं रोक पता
सच होते हमेशा सुबह के सपने ।

दायरे

अनजान अजनबी राहो में गोते लगते
अपनी किस्मत की चाल को समझने के लिए
एक छोर से दुसरे को नाप लेना चाहते है
जीवन नईया की दिशा को समझना चाहते है
इतना असं नहीं होता
भाग्य किस्मत सभी अजमाने से नहीं चलते
एक अनजान शक्ति से संचालित है
सब विधि का विधान है
मन की चंचलता का कोई ज़ोर नहीं होता
अपने दायरे ख़ुद बन जाते है कभी बना दिए जाते है
मन उसमे बाँध जाता है हम जीवन चक्र में समां जाते है
अपनी सीमाए निर्धरित कर देते है
अपनी चाहत भूल कर नया दायरा बना लेते है
अपनी पहचान खो कर नया अक्स पहन लेते है
एक भ्रम मैं पूरा जीवन गुजर कर उसके सार्थक होने के इंतज़ार करते है
जीवन दायरे से निकल जनम दायरे में प्रवेश कर खुश हो जाते है
प्रभु के इस दायरे के सार्थकता का अनुभव सामाजिकता से लगा बेठेते है ।

लक्ष्मी रूपा

दादी के आमो के बीजो में हर क़र्ज़ चुका दिया या उधार उठा लिया
नारी देह की प्रथम किलकारी से महकती बगिया प्यारी
या कर्जो की शरुआत का सिलसिला मान लिया
पिता जोड़ तोड़ से घबराए ,माता बुजुर्गो से कतराए
दादा दादी मायूस नज़र आए
शायद लक्ष्मी रूप समझ न पाए
सिर्फ़ बेटे के चाह में तड़पते नज़र आए
ऐसे द्वार सात जनम तक लक्ष्मी न आए
कौन जाने इस लक्ष्मी रूप के लिए कल कतार लग जाए ।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

आदर्श महिला

yh कविता मेरी अपनी, माँ,नानी, दादी, तई,दीदी,..........इन सब लोगो के सफल गृहस्थी चलने के आधार पर कहा है । इनका नजरिया ,दूर की सोच ,घर का बंधन ,प्यार और खुशी की परिभाषा और भी बहुत कुछ ........मुझे बताता है यहे आदर्श है और महिला है ... आज का समाज और स्त्री की सोच ही उसके इस अस्तित्व के पतन का कारण बनेगी ।शायद ,मेरे इस विचार से बहुत लोग सहमत नहीं होंगे .. बदलवा है पर फिर भी अच्छी लड़कियों की कमी नहीं है ,मेरा मन यही कहता है

मैंने कभी आदर्श महिला को नहीं देखा
सोचती हु ऐसी मूरत है वो
पूजा में सजी एक तस्वीर है वो
सब मानते सब जानते है
सबके मन की अभिलाषा वो
भारतीय नारी वो
सारे दुःख सह लेती वो
हर मोड़ पर बदल देती वो
नारी की पहचान वो जननी,बहिन,बेटी,भार्या वो
मत ढालो उससे पाश्चत्य संस्कृति में
बनी वो भारतीयता के लिए
मत पुकारो कल के प्रलय को आज
भसम कर देगा पूजा की देवी के स्वरुप को
चाह नहीं तुम पूजो उसे
बस इतना सम्मान दो ,
न झुके वो स्वय की नजरो से
चाहत है उसे उठने की ,
पर इतनी नहीं की मखोल बन जाए
समझो उसकी आत्मा की भाषा को
वो आन हमारी वो शान हमारी

नभ का तारा

मेरी दादी श्रीमति अनसुईया देवी के लिए ......मेरे दिल से लिखी गई एक कविता । वो मेरी सखी ही नहीं मेरी प्रेरणा थी मूरत थी वो कोई लालच नहीं कोई चाह नहीं ......हर काम को करने में तत्पर .......गजब का आकर्षण और santusti थी उनके जीवन में ....मेरी khush kismati hai ki में उनके घर आए और उनका पूरा साथ मिला ..मेरा har kaam में उनकी झलक हमेशा रहेगी ।

मेरी बचपन की छावा का अंचल छुट गया,
मेरे सारा से मेरा हमकदम साया टूट गया,
बस रह गई उनकी यादें
कहाँ था जो ..दिया था जो उन्होंने
मुझे तराशा था उस देवी ने
मुझे दिखया था वो सपना
मिलाया था मेरे बचपन से हाथ
नई बुलंदियों को दिखाया था
सिखलाया था परम्परा की बारीकियों को
समझाया था मानवीय कर्तव्यों को
जीवन की कठिन रहा का
बहादुरी से सामना करना
न bhulna माता पिता को वो सवोपरी है
न गवाना एक पल भी
जीवन की कीमत पैसा नहीं है
बस प्यार और सम्मान दो
खूब पढो और पढ़ाऔ परम्परो को आगे ले जाओ
'में ' न हो तुम्हारा संदेश "हम सब एक है "यह दो संदेश
देख रही हु आकाश सवार ,बस चमक रहा एक ही तारा
यही है दादी का मुख प्यारा जो दे रहा है जग को उजियारा
यही है दादी माँ का आशीर्वाद दुलारा ।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

महकते घर

पुराने घरो की दीवारों में ज़िन्दगी बसती थी
एक अपनेपन की गंध जो सदा बंधे रखती थी
jhdhte प्लास्टर में मनुहारों की खुशबू थी
अलमारी को खोलते ही शरू होते यादो के गलियारे
झरोखों से आती हवा में अपनेपन का एहसास
उन कमरों से आती बचपन की महक
गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा
सारे bhai बहनों का मिलना
बिच के आंगन में धमाचौकडी मचना
दादी नानी के कहानियाँ , दादा नाना के प्यार से लबरेज़
ताप ,शीत ,बरसात से बेखबर वो बचपन का खेल
पूर्वजो की कहानी कहता yh घर
आज के यहे आलीशान महल
न वो कशिश न वो प्यार न आशीष
आधुनिकता की चकाचौंध में खो गया वो घर ,वो अपनापन वो प्यार ।

एक लम्हा

मशगुल हो गये
अपने गम में कुछ देख न पाए
चारो तरफ गमो को बिच्छा दिया
ख़ुद को सिमटा लिया
जब उकता गए तो देखा हर गम अपने से बड़ा लगने लगा
न जाने क्यों क्यों ज़िन्दगी को गम का सागर बनके कोसते रहे
ज़रा हस दिए तो मन की हसरत पुरी मान ली
तेरा शुक्रिया खुदा
इस हसी के अनमोल लम्हों निकल कर जीने का मकसद दे दिया ।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

मेरे जीवन साथी

तेरे लिए तेरे संग
हरदम रहूंगी सजन
चाहिए गम हो या खुशी
तेरे बिन वो सदा अधूरी ।


मेरे घर की रौशनी तुम
मेरे मन की शक्ति तुम
प्यार की इस आस्था से सजी
मेरी बगिया हो ।


तू ही मेरी ताकत
तू ही मेरी पहचान
इतना अटूट यहे नाता हो ।


शक शुबह की जगह नहीं
प्यार की मूरत हो
सच्चाई विश्वास की नींव से
बना मेरा मधुबन हो।


खुशियाँ यहं प्यार से
आदर जहाँ सस्कार में
साथ हमारा सदा रहे
कभी न चटके यहे आधार रे।


छुटी सी पहेली यहे ज़िन्दगी
करदी तुम्हारे हवाले साथी
साथी ओ मेरे जीवन साथी ।

किस गली है मेरा देश

जाने कौन गली है मेरा देश
क्यों .?मेरा घर ही है परदेश ,
किसने यहे नियम चलाया
एक शहनाई ने करा पराया
एक अंजन को जीवन दे डाला
जिस घर में उमर बिताई उसे ही नाता टूट जाता
बाबुल सखी, अटखेलियाँ सब हो जाते परये
जब प्रीत ने बंसी बजाई ।
जाने कौन गली है मेरा देश .
डोली में बेठे तो असू उतरे तो खुशी
पल पल बदलती यहे ज़िन्दगी
सालो के प्यार से पल का प्यार आगे निकल जाता
पल में पराया अपने सब कुछ हो जाता
आने वाले कल की तस्वीर बन जाता
जाने किस गली है मेरा देश जहाँ थी वो था परदेश ।

कहाँ है यहे जहा

उस जगह की सेर करना चाहती हु
जहा कोई तमना अधि न हो
हर तस्वीर में चाहत हो
सच्चाई हो एक दुसरे के लिए सम्मान हो
हर बंधन अपने में आजाद हो
हर शब्द में अपनापन हो
आँसू दर्द दुःख जसे शब्द ही न हो
सिर्फ़ प्यार ही प्यार हो
हर चाहत पूरी हो
हर मज़िल असं हो
हर साथी सच्चा हो
काश एसा मेरा जहाँ हो ।

बाबुल

छूता बाबुल का आगन चल दी परदेश
छुट गई वो सखी सहेली
छुट गई बचपन की बगियाँ
वो हस्सी ठठोली वो कहकहे
सब घूम हो जाएगा
दुनिया सिमट का इन्सान के वश में हो जाती है
सब खो कर कच अपना नहीं लगता
खुशियों के सपनो के मायने बदल जाते
हरचाह हर आवाज़ को उसकी चाह के साथ मिलना होता है
अपनी सोच अपनी नज़रियाँ बंद बक्से में डालना होता है
सिर्फ़ उनको खुश रखना होता है
अपनी परेशानियों अपने आंसू सिर्फ़ आपके होते है
कोई नहीं होता बाबुल के आंगन के परे
हलकी छींक से बाबुल परेशां होता
सिर्फ़ पसंद न पसंद बताई जाती है
कोई नहीं जो एक पल सुन लेता
सिर्फ़ तुम सुनो
पहनन ऊड़ना चलना फिरना सब बदल जाता
पर फिर भी एक रस है इस भाव में
एक बार जीत लो सबका मन वो ही जीत है ।


सावन

रिमझिम बोंदु ने एक चाह जगा दी
अपने प्रीत की याद दिला दी
नज़र से उझल हो लेकिन दिल के करीब हो
आज फिर पहली बारिश याद दिला दी
अलहदा मस्ती मज़े में खो जाते थे
भीग भीग फिर आते थे
ऊओले गिरने की चाह में असमान निहारते थे
धुप के लूकचीपी में इन्राधनुष तकते थे
उन लम्हों को याद करा दी फिर रिमझिम ने
चपक छापक पेरू का खेल का मज़ा
उस उमर के प्यार का पहेला नशा
अंगडाई लेती इच्चाच्य जगती से बरखा
चंचल मदमस्त करता यहे सावन
काले बदल के बीच में बता सूरज
लहरों का चंचल होता यहे मन
उजली हरियाली से लगते मन के पंख
कितना मदहोश करता है यहे सावन ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

औरत

कैसा अजीब शब्द है यहे औरत ...जब यही माँ ,बेटी ,पत्नी ,बहिन बनता है तो कितना सुखद एहसास होता है ,वही दूसरी ,वो , एसे शब्द सुन कर जी खट्टा हो जाता है । पर है तो सब एक ही बस मायने बदल गए ..लोगो ने अपने समझ के हिसाब से बदल दीये । हर नारी ,स्त्री , एक ही मकसद के लिए जीती है अपने प्रियजनों की खुशी पर कितने लोग इसकी परवाह करते है और उसकी भरपाई कर पाते है ? उसके जीवन के हर मोड़ पर एक हिसाब माँगा जाता है । कभी अच्छी बेटी होंने का ,कभो अच्छी बहिन का ,कभी अच्छी पत्नी और अच्छी माँ का जब इस हिसाब में गड़बड़ होत्ती है......... तो उसे उसकी खता मानी जाती है और इसकी सजा दुनिया तय कर देती है........ उसे जिंदगी भर चुकानी होती है, कही न कही उसकी सजा का हिसाब भी औरो के हिसाब से होते है... वो तो  बस एक कोने  में खाडे रहती है सजा के लिए : एकदम तन्हां जो ऐसा नहीं करती ,वो नारी का दुखद एहसास दे जाती है । सफल नारी कौन है .......यह  कौन जनता है ...इसका क्या मापदंड है ? कौन बता सकता है की सफल कौन है... जो चुप चाप सुनती है ..या जोर जोर से बोलती है कोई नहीं जानता । क्या बताएं ? यहे भाग्य की बात है ऐसा अपने बडो से सुना है..... दादी माँ सब हर बात में लड़की के भाग्य को बता देती थी ..लड़का पैदा हो  लड़की हो अच्छी शादी हो.. बेकार शादी हो अच्छा पढ़  ले या अच्छे घर में रह सब भाग्य अच्छा हो तो लड़की का बुरा तो लड़की का ....पर जो परीक्षा है उसे हर समय देनी  होता है । पर यह  सही है नारी का मन है पढ़ा पाना सही रहता है ..उसके ख़ुद के लिए ...कोई ज़यादा प्यार करे  वो बिगड़ जाती है सर चढ़ जाती है मनमानी करती है ...थोड़ा डर रहता है तो सही रहता है ।

वसे जो आज नारी की हालत है उसके लिए पुरूष ही जिम्मेदार है , अपने इसे पुरूष के सामने अच्छा दिखने के लिए नारी को कई रूप धरने पड़ते है । पिता की अच्छी बेटी , भाई की अच्छी बहिन, पति की अच्छी पत्नी ,पुत्र की अच्छी माता ,ससुराल की अच्छी बहु । अलग अलग रिश्ते... अलग अलग रूप हर रूप का अपने दायरा ......इतने बड़े दायरे में अपना अस्तित्व खो देती है । जब इस दायरे का घेरा इन् लोगो के आगे प्रियतम या कोई और संतान के नाम जाता है...... तब वो एक सामाजिक दयारा पर कर जाती है और उसमे से बेदखल हो जाती है । शायद, एक नारी दूसरी नारी के बारे में बोलने का अधिकार ले लिया जाता तो ..आज कुछ और परिस्थिति होती ...इसमे कोई दो राय नहीं-- नारी नारी की दुश्मन होती है ..बेटी बुरा करे या ससुराल में  बुरा हो तो माँ  वापस नहीं देखना  चाहती , माँ दूर भाग जाती ...है..,पत्नी बुरी हो तो पति से पहले ननद या सास भड़का देती है कितने ही ऐसा लोग है..... जिनका तलाक अलगाव ससुराल की  की नारी के कारण हुआ है । कितनी ही औरत ने दूसरो के पति पर जादू कर के अपने वश में कर लिया और एक घर उजाडा गया ।

समय एक सा नहीं रहता बदलता रहता है इसी समय के फेरे ने औरत के अस्तित्व के नित नए रूप देख .... सरे रूप धरवाए गए नर द्वारा....... पर उसका मूल अस्तित्व नारी का  खोता गया और आज कलयुग में नारी का जो जलन ,इर्षा ...अपना तेरे का रूप बहुत उन्नत हो गया ॥ आज नारी सुपर वूमेन है ...पर उसकी अस्मिता की मर्यादा की सीमा खो चुकी  है ,सब ऐसा है पर नारी की विचारधारा का करांतिकारी परिवर्तन है ...अपने अत्याचारों  का खूब बदला लिया । पर समाज के नियम इतनी आसानी से नहीं बदलते । अपने उन्नत स्वरुप के चक्कर  में वो अपने  असली अस्तित्व और कर्ताय्व्यो को नर- नारी के बहस में घूम कर गई ।

नारी का चंडी रूप समय समय पर सब ने देखा है, और सामना किया है पर हर समय एक रूप कायम नहीं रह जा सकता । आज के अस्तित्व में पैसा है , प्यार नहीं ,सुन्दरता है पर प्रेमी नहीं , पति है पर सम्मान नहीं ,घर है पर खुशाली नहीं ,मन है पर उसके द्वार नहीं,संतुस्ठी नहीं है कहीं ।
नारी को इन सब नियम  में डाल कर भगवन खुश होकर सब देखते रह । और एसे भवर में फासया की वो कभी नहीं निकल सकती ....वो स्वार्थी हो गई.. अपने लिए नहीं तो अपने बच्चो के लिया... कभी पति के लिए और इन सब को अपने बारे में बिना सोचे सब की भलई करने में अपनी और आने वाले स्त्री को मुश्किल में डाल दिया । जब बेटे की पत्नी उससे काम करने के लिए बोलती है तो उसे बुरा लगता है वोही अगर दामाद वोई काम करे तो खुशी मिलती है ,माँ बोले तो ठीक है सास बोले तो बुरा भी लगता है , मायका मायका होत्ता है ससुराल ससुराल ...सच है ।
बहुत मुश्किल होत्ता है ख़ुद से लड़ना और अपने को मानना के आप जिसके लिए हम अपनी ज़िन्दगी की खुशियाँ  बुन रह हो ...वो भी आपका  उतना ध्यान रखता हो  शायद पिता के बाद कोई ऐसा नहींं होता जो अच्छे के लिए सोचे ...पिता भी तब तक सोचता होगा जब तक बेटी सही रहा चलती रह और सही उमर में उसकी शादी हो जाए ... पति का काम चुपचाप आकर दे उसके घर वालों  का प्यार अपमान आसानी से सह ले और बेटे के लिए बहुत सा धन छोड़ दे ...भाई से किसी राखी का मोल न ले ....वो नारी सफल हो जाती है ....क्या?
नारी को हर उपन्यास के इसे किरदार में ढाला जाता है जो कभी भी हटा जाती है कभी भी अपमानित हो जाती है और जो भी कुछ होत्ता है ...उसके लिए उसे एक किरदार के तरह कभी बेवफा कभी तन्हां कभी लाचार दिखया जाता है। वो कभी न कभी अपनी ज़िन्दगी में यहे देख ही लेती है । हर नारी को यहे महसूस होत्ता है ।
जीवन में नर नारी की बहस हमेशा चलती रहगी । नारी हमेशा अच्छी बुरी रहगी । जिस दिन नारी सिर्फ़ बुरी रह गई तब दुनिया ख़तम हो जायेगी .....क्योंकि नर को जेह्लने वाल आर सारा इल्जाम अपने ऊपर लेने वाला कोई नहीं रहेगा ।

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

बच्चे

आज दिवाली है पर लग नहीं रह है । इस बुदापे में हम दोनों अकेले है। कहाँ एक भरा पूरा परिवार होत्ता था । जितना नास्ता बनू उतना कम पड़ता था। आज डायबिटीज़ के करना कुछ नहीं खा सकते । बच्चे अपनी अपनी जगह है । शायाद ही हमे कोई याद करता होगा इससे आस में बेठे है हालाँकि सुबह ही चारो बच्चो का फ़ोन आ गया बेटी का भी आ गया । सब बुला रही है , पर बेटी के पास साल में २ बार जन सही नहीं लगता ।बेटे बहु को हमारा आना अच्छा नहीं लगता जबकि आज तो हाथ पेर चलते है पता नहीं जब नहीं चलेगे तब क्या होगा । में तू फिर भी बहु के साथ निभा लू पर इनका क्या करू बिना बोले रह नहीं पते में बस बहु बेटे ससुर में पिसते रहती हु । न बहु समझे न यहे बेटा इनको बोलू बोले तू लडाई हो ।
एक वो जमाना भी था , जब हम बहु थे , हमारी भी सास थी और कभी कोई बंदिश नहीं ,बस अपना काम करो चके के खाऊ और बदू का लिहाज़ करू । अच्छा था की परदा था , कोई मतलब ही नहीं होत्ता था । आज कल कोई लाज कोई शर्म नहीं बडो के सामने कोई भी बात बोल दे जाती है सब टीवी का असर है सब सीरियल में बस लडाई जलन यही सब सिखाते है । सब देख कर मन खातात हो जाता है ।
बड़े बेटे की बहु बातूनी है ,पर अगर कोई टोक दे या कुछ बोल दे एसा मुह सुजाति है की किस्सी के सामने भी न बोले सब को पता चल जाए की कुछ हुआ है । किसी से बात नहीं करती यहाँ तक की मेहमान के सामने भी मुहु फूला रहता है । चोट्टी बहु घुन्नी है उससे क्या अच्छा लगता है कुछ नहीं पता । जबकि वो यहं आती है तो सब में हाथ में ही देती हु मेरे परे ही सूज जाते है ,पर किस्सी बेटे को नहीं दीखते अपनी बहु का घमना शौपिंग और डिनर बस माँ बाप कासी हालत में नहीं पूछते बीपी दैबेतेस कुछ नहीं घर का ऊपर का वाला हिस्सा अब न मुझसे साफ़ होत्ता है न इनसे बच्चो के बहरोसे भी नहीं रह सकते एक दिन अगर कम की बो दिया तो बीवी मुझे पे बोलती है बहुत कम होत्ता है आपके घर जसे इनका बचपन तो हमेशा इनके साथ रहा है । काम का क्या है बाई को ५० रूपये दो वो कर देती है चार दिन हसी खुशी बोल लो यही बहुत है । न हमें इनका एक रुपया चाहिए न ज़रूरत है फिर भी इतने खिचे रहते है मेरे घर आने के लिए छुट्टी नहीं मायके जाने के लिए है ,पता नहीं मेरे बोलने में कसा है या इनकी समझ में ।
जमाना बदला है अब सास बहु से डरती है । सही है कलयुग है मेरे बच्चो केलिए मेरे सीने में जो दर्द है वो अब बहु के आने के बाद में दिखा नहीं सकती । जो तयोर पे में अपने पति को छोड़ बच्चो के हिसाब से मानती थी आज उस्सी त्योहार पर मुझे अकेले मानना पड़ता है हर मिठाई बनते समय हर जानने की याद आती है पर चार आसो ढुलक कर रह जाते है माँ की आतम कलपती है ..हे भगवन में कभी बद्दुआ न दे दू इससे बचना ॥
शायद मेरी बहु भूल गई उसके भी लड़का ही है वो क्या करेगी ॥? तब शायद मेरे दिल का दर्द समझ पाए आज एक चोट लगने पर जितने आँसू बहती है ..कल सोच कर देख बहु अगर इस बेटे ने तुझे नहीं पुछा तो ..... तेरे दिल पर क्या बीतेगी ...बस एक कसक में हु सब कच बहुएओ के हिसाब से करकेभी मुझे कोई सुख न मिला इससे तो अच्छा था अपने हिसाब से करने देती सब और में भी खुश रहती । जब जायेंगे तो कुछ दे कर ही जायेंगे पर फिर भी ... यहे कुछ कलयुग के नियम ही इसे है। स्कूल में ग्रंद्फठेर डे मानते है तब अपने बच्चो को क्या बताते है यहे तो पता नहीं बच्चे ने कभी अपने ग्रंद्फठेर से बात नहीं की । आजकल एक बच्चा होत्ता है दोनों माँ बाप उसे अच्छा बनने में यहे ब्भुल जाते है वो क्या है ..कभी खद तो फर्स्ट आए नहीं पर बच्चो को फर्स्ट लाना कहते है उसकी मासूमियत से खिलवाड़ करते है ..उसकी अपनी चाहत मर जाती है । माँ बाप अपनी नाकामी को अपने बच्चो की कामयाबी में बदलते देखना चाहते है । अपनी मस्ती अपनी शरारत उन्हें नहीं बताते । मेहेंगे मंहगे खिलोने से उसका कमरा भर देते है ...पतंग नहीं देते जो कभी वो बहुत उमग के साथ उड़ते थे, कपड़े दोना ka दोव्ना ko बा bante थे पूरा khandan एक hi थान से कपड़े पहनता tha यहे nahin बताते , चंचादी नहीं बजाने देते अब वो शर्म की बात होत्ती है ..माँ का बुना स्वेटर नहीं पेहेनते क्योंकि वो ब्रांडेड नहीं होत्ता माँ ब्रांडेड थोडी है माँ पुरानी है वो saari पहनती hai । घर में थोडी सामना बनया जाता hai त्योहार पर सब bazar से आता hai पहले तो hum ५० लोगो ka बनते the अब ३ -४ logo का भी nahin बनता मेहमान ke सामने सिर्फ़ रखना होता hai खाना नहीं पहले काजू badam कभी mil जाए to बस धन्य ho जाते थे sab बड़े छुपा ke रखते थे अब to मुह mein सोने की चम्मुच hotti है । कभी इनका बच्चा अगर दादी के पास रह गया तो यहे किस्से सुना कर वो उससे बिगड़ देगी उसका स्ताट्स कम हो जाएगा .....समझ नहीं आता हसू या रूऊ ...
..पर में उन माँ में से नहीं जो रोते रह में ही अपने पति के साथ आराम से रहती हम पिक्चर देखते है ,डिनर करते है और यहं अपना सर्कल बना लिया है जो अकेले कपल्स है आराम से मिलकर हर त्योहार मानते है । बच्चो के याद भी नहीं आतीपर जब उन्हें हमारी याद आएगी तब बहुत देर हो चुकी होगी ।

अम्मा

आज भी अम्मा की याद मेरा बचपन उनकी गोद में अच्छी तरह से याद है कसे वो  अपना  प्यार हम पर लुटती थी । में उनकी पोती नहीं उनकी सखी थी । वसे वो  नौ बच्चों की माँ थी ..मेरी अम्मा एक लड़की थी उनके बाकि सब लड़के । वो भी आज्ञाकारी । सब जलते थे इतने आज्ञाकारी बच्चो को देख कर और बहु आने पर तो और निहाल हो गई मेरी अम्मा बस छोटे  दो बच्चे बचे थे शादी के लिए । दादाजी अच्छी जगह से सेवा निवृत  हो कर आर्यसमाज की सेवा में लग गए .....अम्मा जच्चा बच्चे में लगी थी सारी उंगलिया बराबर , मतलब सब बच्चे एक से कमाते अपना कमते अपना खाते । अम्मा बाउजी का खूब ध्यान रखते । अम्मा कौन से कम् थी हलवा बनाना के बहुओ को खिलाती थी । लड़के लड़की में कोई भेद भाव नहीं रखती थी । कोई भी हो उठी ही सेवा करती थी । दया भाव की मूर्त । हिसाब से घर समभलने वाली । हम लड़कियों को लल्ली बोलती थी उनके मुह से यहे इतना अच्छा लगता था की बस .....
मेरा तो  एक ही प्रश्न होत्ता था ......की अम्मा तुम यहे बताओ की सब बहुओ में से तुम्हे कौन सबसे अच्छी लगाती है । अम्मा बोली लल्ली ....तू भी ...अपने पोले से मुह से हस  देत्ती थी आज भी हसी याद है मुझे ॥ अपना आठवी का फोटो  दिखा कर बोलती ......देख लल्ली में आठवी तक पढ़ी  और घड़ी पहन कर जाती थी में और उनका पूरा कैमरा । बाउजी का किताबो का डेरा । एक से बड़कर एक किताब । आज सब बेकद्री से पड़ी है कितने अरमानो से बाउजी ने ले होगी ।
सब समय की बात है आज अपने  बुदापे में ज़यादा ही अम्मा की बात समझ पा रही हु शायद ... अम्मा बाउजी को बहुत खुशी थी ......की उनकी सारी बहुए काम करती है अम्मा के पास न तो बहुत ज़्यादा पैसा  था न कभी कमी रही ......वसे भी इतने बच्चो को पलते उनकी ज़रूरत को पूरा करते करते उमर निकल गई । पर में बहुत खुशनसीब थी.. जो इसे घर में  हुई  । मेरे पिताजी....... ने  भी कभी लड़के लड़की में भेद भाव नहीं किया इसका एहसास  तब हुआ .......जब मेरी ससुराल में यह  बहुत ज़यादा था । अम्मा बाउजी को बहुत खुशी थी सारी बहुए नौकरी करती है कोई घर में रह कर पंचायत नहीं करती । सब सारा कम् करती थी । मिल कर रहती थी । समय  अपनी गति से चल रह था
बाउजी को हार्ट अटैक हो गया और वो चल बसे...... अम्मा बहुत रोई उस जामने में तार  देते थे बाउजी दिल्ली में थे तब यह  सब हुआ । अम्मा को बड़ी बहु ने रोटी खिला कर बिठा दिया उनको फटका भी नहीं था ऐसा  कुछ होगया है .........यहे किससा हमेशा अम्मा सुनती थी और आंखो  में आसू  आते और बोलती लल्ली उस दिन बेगन की सब्जी और रोटी बहुत अच्छी लगी खूब खाए। बड़ी बहु ने अपने अस्सू को छिपा रखा था बाउजी के आने तक .... दुनिया जहाँ के लोग आये थे । फिर पिताजी छोटे चाचा आर्यसमज को अपप्नाया कितनी अद्भुत  शान्ति मिलती है यज्ञ  करके । बाउजी के बाद सब ने सोचा  अब सब बदल जायेगा  पर एसा कुछ नहीं हुआ अम्मा का सम्मान उसी प्रकार था........ वसे भी उनके हाथ पैर चलते थे किसी के चार काम ही कर देती बच्चो के अलग अलग जगह ट्रान्सफर थे... उसी पारकर जहाँ मन करता वह चली जाती  सब उन्हें सम्मान  देते थे । तीज तयोर ही रोनक तो उनसे ही होत्ती थी ...एक हफ्ते पहेल से गाने लगती यहे त्यौहार  आ रहा है ऐसा करना है वैसा  करना है । चोक बनाना मैंने उनसे  सीखा । होली पर गुलरी (गया   के  गोबर  से  बनती  थी  )में तू ची ची करती थी । पर अब याद करती हु । अनमोल बचपन की याद को । अगर में या कोई भी वर्त करे तो बस कुछ खा ले...... की रत लगा देती थी खूब हाथ से बनके खिलाती थी । और जो तृप्ति इसके बाद उनके चहेरे पे देखती थी ...मन ख़ुशी  से भर उठता था ..वसे ही आज में करती हु । सुबह ही ५ बाजे उठ कर नहा  लेती थी । चौका का जादू ..वही लगती थी उनने दिखता भी नही था तब भी वही लगाती थी । हम जो भी लल्ली जल्दी नहा दो लेटती थे बड़ी खुश होत्ती थी......... मेरी माँ के स्कूल जाने के साथ वो नास्ता करती थी सुबह ७ बजे मेरे कॉलेज से आने पर सब उनको ही बताती थी । बड़ी दीदी को शादी के लिए बोलती तो दीदी बोलती चलो अम्मा पास वाले चौरेहे पर वही से माला लेके ...................जो पहला लड़का मिलेगा उसके गले में डाल  देंगे खूब हस्ती  । चुस्की आती तो सब खूब कहते चुस्की वाले को वही रूक कर खूब बिक्री करते हर दिन किसी भी एक बाड़े को पैसे चाचा तुजी   से स्पोंसर कर लेते थे हम बच्चे । गर्मी  की  छुट्टी  में  मिलते  थे  सब  सुचते  हुए लगता है सालो का सफर एक रील की तरह मेरे आखो  के सामने है । पता ही नहीं चलता बच्चे को कितनी ही बार यहे किसी सुना चकी हु ...अम्मा की तरह ..फिर उनको बोलती थी अम्मा तुम सुना चुकी हो तो ...वो  अपने पोपले मुह से हस देती थी । में सिलाई  और कड़ी का सामान  का अच्छा उपयोग करना है उनसे सीखा है । कितने ही घर के उपचार आते थे ......उनको इतनी घेरा जला हुआ ज़ख्म उनहोंने ठीक कर दिया था अपने ग्वार के पते की दवाए से । बड़े बड़े उपचार कर देती थी वो । बहुए के लिए इतने सम्मान  की बाउजी पानी लाके देदेत अगर सब  खाना खा रही होत्ती ।
गर्मी की छुट्टी में सब एक जगह आते थे मिलते थे और पूरे साल जो स्कूल में सीखा होता था वो सब के सामने कारते थे फिर सब बड़े हमे कुछ न कुछ देते थे । अम्मा भी हमे देती थी वो ५ रूपये इतनी कीमती थे वो रुपये आज के बच्चो को तो पाकेट  मनी मिलती है......... वसे सब चाहत माँ बाप पहले  ही पूरी कर देते है । दशहरे देखने के १० रुए मिलते थे दशहरे  जाने से पहले जानने कितने सामना खरीदने  का मन बन लेते थे ..और बाद में माँ को देखर बोलते आप  दिला देना यहे में गुलक में रखुगी । यह   सुख कहाँ आजकल के बच्चो  के पास या शायद माँ बाप यह सुख देना ही नहीं ॥ बहुत पैसा है सब के पास पर फिर भी पैसे की अहमियत समझन बहुत ज़रूरी है पता नहीं  मेरा यहे बूढ़ा दिमाग कब आज के रंग में रंगेगा ।
अम्मा, मेरी हमेशा बोलती में मर जाऊ कम् करते  । में बोलती अम्मा सब  ऊपर वाले के हाथ होत्ता है वरना कौन किसी पे बोझ बनना पड़ता  बोली सही है लल्ली । एक रोज़ अम्मा कुर्सी से गिर गयी  ....में अकेले थी समझ में नहीं आया क्या करू ...फिर  सोचा उनको अकेले  उथौनगी तो चोट आजाएगी .......इसलिए माँ पिताजी का इतेज़र करने लगी  थोडी देर में देख तो उनके माथे की  नस कट गई थी जल्दी से पास वालो बुलाया माँ पिताजी को फ़ोन किया  भिजवाया जब तक वो आते ३ टक्के  लग चुके थे चाचा को भी फ़ोन कर दीया । सब ठीक था अगर समय पर न देखती और कुछ हो जाते तो में अपने आप को ज़िन्दगी भर माफ़ नही कर पाती । पर भगवान को कुछ और मंज़ूर था अम्मा आखिर के तीन साल बिस्तर पर रही और चोट्टी चची के पास तो कुछ न बचा आखिर के ४ महीने बहुत कष्ट था । जब मेरे पिताजी के पास थी तो माँ पिताजी के स्कूल जानने के बाद में देखती थी . . पर कभी कोल्ल्गे जाती तो वो श्याद डरती थी फिर बिना बतये जानने लगी तो वो खुश रहती थी. अप्पने हाथ से खाना खिलाती  तो ज़यादा रोटी खाती वरना कुछ कहके रह जाती । आज सोचती हु एक डर हमेशा बुदापे  में  दिल में होत्ता है पर वो डर मौत से ज़यादा सम्मान  की मौत का होत्ता है... बच्चो के पास रहे  इसका होत्ता है । उनके जाने से दो दिन पहले  मिल कर आए थी.. उनकी हालत देख कर दिल घबरा गया था । पर यह  नहीं था वो चली जाएयेंगी ... उस दिन भगवन से माँगा था अगर मुझे जीवन में कभी किसे की सेवा करने का मौका मिले  तो में में पूरी श्रधा से सेवा करू  ..बस दाता इतना ही देना तन मन धन से सेवा करो । माँ पिता के अच्छे कर्म  बच्चो को लगते है। जसे मेरे माँ पिता ने सेवा की और हमे  इस लायक बन  पाए ।
सब का सारांश  निकल लिया ....... अम्मा ने अपने जीवन में कोई छल  कपट नहीं किया........... पर यह कलयुग है .....कौन  से  कर्मो  का  क्या  लेखा  जोखा   है  यह  कोई  नहीं  जानता  . पर  अपने  कर्त्तव्य  सब  जानते  है  .
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