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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

अम्मा

आज भी अम्मा की याद मेरा बचपन उनकी गोद में अच्छी तरह से याद है कसे वो  अपना  प्यार हम पर लुटती थी । में उनकी पोती नहीं उनकी सखी थी । वसे वो  नौ बच्चों की माँ थी ..मेरी अम्मा एक लड़की थी उनके बाकि सब लड़के । वो भी आज्ञाकारी । सब जलते थे इतने आज्ञाकारी बच्चो को देख कर और बहु आने पर तो और निहाल हो गई मेरी अम्मा बस छोटे  दो बच्चे बचे थे शादी के लिए । दादाजी अच्छी जगह से सेवा निवृत  हो कर आर्यसमाज की सेवा में लग गए .....अम्मा जच्चा बच्चे में लगी थी सारी उंगलिया बराबर , मतलब सब बच्चे एक से कमाते अपना कमते अपना खाते । अम्मा बाउजी का खूब ध्यान रखते । अम्मा कौन से कम् थी हलवा बनाना के बहुओ को खिलाती थी । लड़के लड़की में कोई भेद भाव नहीं रखती थी । कोई भी हो उठी ही सेवा करती थी । दया भाव की मूर्त । हिसाब से घर समभलने वाली । हम लड़कियों को लल्ली बोलती थी उनके मुह से यहे इतना अच्छा लगता था की बस .....
मेरा तो  एक ही प्रश्न होत्ता था ......की अम्मा तुम यहे बताओ की सब बहुओ में से तुम्हे कौन सबसे अच्छी लगाती है । अम्मा बोली लल्ली ....तू भी ...अपने पोले से मुह से हस  देत्ती थी आज भी हसी याद है मुझे ॥ अपना आठवी का फोटो  दिखा कर बोलती ......देख लल्ली में आठवी तक पढ़ी  और घड़ी पहन कर जाती थी में और उनका पूरा कैमरा । बाउजी का किताबो का डेरा । एक से बड़कर एक किताब । आज सब बेकद्री से पड़ी है कितने अरमानो से बाउजी ने ले होगी ।
सब समय की बात है आज अपने  बुदापे में ज़यादा ही अम्मा की बात समझ पा रही हु शायद ... अम्मा बाउजी को बहुत खुशी थी ......की उनकी सारी बहुए काम करती है अम्मा के पास न तो बहुत ज़्यादा पैसा  था न कभी कमी रही ......वसे भी इतने बच्चो को पलते उनकी ज़रूरत को पूरा करते करते उमर निकल गई । पर में बहुत खुशनसीब थी.. जो इसे घर में  हुई  । मेरे पिताजी....... ने  भी कभी लड़के लड़की में भेद भाव नहीं किया इसका एहसास  तब हुआ .......जब मेरी ससुराल में यह  बहुत ज़यादा था । अम्मा बाउजी को बहुत खुशी थी सारी बहुए नौकरी करती है कोई घर में रह कर पंचायत नहीं करती । सब सारा कम् करती थी । मिल कर रहती थी । समय  अपनी गति से चल रह था
बाउजी को हार्ट अटैक हो गया और वो चल बसे...... अम्मा बहुत रोई उस जामने में तार  देते थे बाउजी दिल्ली में थे तब यह  सब हुआ । अम्मा को बड़ी बहु ने रोटी खिला कर बिठा दिया उनको फटका भी नहीं था ऐसा  कुछ होगया है .........यहे किससा हमेशा अम्मा सुनती थी और आंखो  में आसू  आते और बोलती लल्ली उस दिन बेगन की सब्जी और रोटी बहुत अच्छी लगी खूब खाए। बड़ी बहु ने अपने अस्सू को छिपा रखा था बाउजी के आने तक .... दुनिया जहाँ के लोग आये थे । फिर पिताजी छोटे चाचा आर्यसमज को अपप्नाया कितनी अद्भुत  शान्ति मिलती है यज्ञ  करके । बाउजी के बाद सब ने सोचा  अब सब बदल जायेगा  पर एसा कुछ नहीं हुआ अम्मा का सम्मान उसी प्रकार था........ वसे भी उनके हाथ पैर चलते थे किसी के चार काम ही कर देती बच्चो के अलग अलग जगह ट्रान्सफर थे... उसी पारकर जहाँ मन करता वह चली जाती  सब उन्हें सम्मान  देते थे । तीज तयोर ही रोनक तो उनसे ही होत्ती थी ...एक हफ्ते पहेल से गाने लगती यहे त्यौहार  आ रहा है ऐसा करना है वैसा  करना है । चोक बनाना मैंने उनसे  सीखा । होली पर गुलरी (गया   के  गोबर  से  बनती  थी  )में तू ची ची करती थी । पर अब याद करती हु । अनमोल बचपन की याद को । अगर में या कोई भी वर्त करे तो बस कुछ खा ले...... की रत लगा देती थी खूब हाथ से बनके खिलाती थी । और जो तृप्ति इसके बाद उनके चहेरे पे देखती थी ...मन ख़ुशी  से भर उठता था ..वसे ही आज में करती हु । सुबह ही ५ बाजे उठ कर नहा  लेती थी । चौका का जादू ..वही लगती थी उनने दिखता भी नही था तब भी वही लगाती थी । हम जो भी लल्ली जल्दी नहा दो लेटती थे बड़ी खुश होत्ती थी......... मेरी माँ के स्कूल जाने के साथ वो नास्ता करती थी सुबह ७ बजे मेरे कॉलेज से आने पर सब उनको ही बताती थी । बड़ी दीदी को शादी के लिए बोलती तो दीदी बोलती चलो अम्मा पास वाले चौरेहे पर वही से माला लेके ...................जो पहला लड़का मिलेगा उसके गले में डाल  देंगे खूब हस्ती  । चुस्की आती तो सब खूब कहते चुस्की वाले को वही रूक कर खूब बिक्री करते हर दिन किसी भी एक बाड़े को पैसे चाचा तुजी   से स्पोंसर कर लेते थे हम बच्चे । गर्मी  की  छुट्टी  में  मिलते  थे  सब  सुचते  हुए लगता है सालो का सफर एक रील की तरह मेरे आखो  के सामने है । पता ही नहीं चलता बच्चे को कितनी ही बार यहे किसी सुना चकी हु ...अम्मा की तरह ..फिर उनको बोलती थी अम्मा तुम सुना चुकी हो तो ...वो  अपने पोपले मुह से हस देती थी । में सिलाई  और कड़ी का सामान  का अच्छा उपयोग करना है उनसे सीखा है । कितने ही घर के उपचार आते थे ......उनको इतनी घेरा जला हुआ ज़ख्म उनहोंने ठीक कर दिया था अपने ग्वार के पते की दवाए से । बड़े बड़े उपचार कर देती थी वो । बहुए के लिए इतने सम्मान  की बाउजी पानी लाके देदेत अगर सब  खाना खा रही होत्ती ।
गर्मी की छुट्टी में सब एक जगह आते थे मिलते थे और पूरे साल जो स्कूल में सीखा होता था वो सब के सामने कारते थे फिर सब बड़े हमे कुछ न कुछ देते थे । अम्मा भी हमे देती थी वो ५ रूपये इतनी कीमती थे वो रुपये आज के बच्चो को तो पाकेट  मनी मिलती है......... वसे सब चाहत माँ बाप पहले  ही पूरी कर देते है । दशहरे देखने के १० रुए मिलते थे दशहरे  जाने से पहले जानने कितने सामना खरीदने  का मन बन लेते थे ..और बाद में माँ को देखर बोलते आप  दिला देना यहे में गुलक में रखुगी । यह   सुख कहाँ आजकल के बच्चो  के पास या शायद माँ बाप यह सुख देना ही नहीं ॥ बहुत पैसा है सब के पास पर फिर भी पैसे की अहमियत समझन बहुत ज़रूरी है पता नहीं  मेरा यहे बूढ़ा दिमाग कब आज के रंग में रंगेगा ।
अम्मा, मेरी हमेशा बोलती में मर जाऊ कम् करते  । में बोलती अम्मा सब  ऊपर वाले के हाथ होत्ता है वरना कौन किसी पे बोझ बनना पड़ता  बोली सही है लल्ली । एक रोज़ अम्मा कुर्सी से गिर गयी  ....में अकेले थी समझ में नहीं आया क्या करू ...फिर  सोचा उनको अकेले  उथौनगी तो चोट आजाएगी .......इसलिए माँ पिताजी का इतेज़र करने लगी  थोडी देर में देख तो उनके माथे की  नस कट गई थी जल्दी से पास वालो बुलाया माँ पिताजी को फ़ोन किया  भिजवाया जब तक वो आते ३ टक्के  लग चुके थे चाचा को भी फ़ोन कर दीया । सब ठीक था अगर समय पर न देखती और कुछ हो जाते तो में अपने आप को ज़िन्दगी भर माफ़ नही कर पाती । पर भगवान को कुछ और मंज़ूर था अम्मा आखिर के तीन साल बिस्तर पर रही और चोट्टी चची के पास तो कुछ न बचा आखिर के ४ महीने बहुत कष्ट था । जब मेरे पिताजी के पास थी तो माँ पिताजी के स्कूल जानने के बाद में देखती थी . . पर कभी कोल्ल्गे जाती तो वो श्याद डरती थी फिर बिना बतये जानने लगी तो वो खुश रहती थी. अप्पने हाथ से खाना खिलाती  तो ज़यादा रोटी खाती वरना कुछ कहके रह जाती । आज सोचती हु एक डर हमेशा बुदापे  में  दिल में होत्ता है पर वो डर मौत से ज़यादा सम्मान  की मौत का होत्ता है... बच्चो के पास रहे  इसका होत्ता है । उनके जाने से दो दिन पहले  मिल कर आए थी.. उनकी हालत देख कर दिल घबरा गया था । पर यह  नहीं था वो चली जाएयेंगी ... उस दिन भगवन से माँगा था अगर मुझे जीवन में कभी किसे की सेवा करने का मौका मिले  तो में में पूरी श्रधा से सेवा करू  ..बस दाता इतना ही देना तन मन धन से सेवा करो । माँ पिता के अच्छे कर्म  बच्चो को लगते है। जसे मेरे माँ पिता ने सेवा की और हमे  इस लायक बन  पाए ।
सब का सारांश  निकल लिया ....... अम्मा ने अपने जीवन में कोई छल  कपट नहीं किया........... पर यह कलयुग है .....कौन  से  कर्मो  का  क्या  लेखा  जोखा   है  यह  कोई  नहीं  जानता  . पर  अपने  कर्त्तव्य  सब  जानते  है  .
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