बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

प्रिय बिटिया

प्रिय बिटिया अनुष्का,
तुम्हें जानकर  हर्ष होगा ,तुम्हारी उस आख़री  पुचकार  और अलिगन से सहारे में ज़िंदा हूँ ।   हर लम्हा उस ईश्वर का धन्यवाद करती हूँ की मुझे तुम्हारी जैसी बेटी की माँ बनाया।
  आज भी याद है, जब तुम्हेँ  नर्स ने मुझे दिया था, तुम्हें  देखते ही मैंने अपने आपको पूरा मान  लिया था। यक़ीन  मानों, आज भी कल  बात लगती है। .".. समय की पंख होते है, दादी सही कहती थी ".
अपने सारे सिटिच भूलकर तुम्हारी छठी  और बाराही की तैयारी कर रही थी। ...... ऐसा नहीं की भैया और तुझमें भेद था.........  खुश तब भी उतनी ही थी ........ बस तुझे पा कर पूरा महसूस करती थी ऐसा लगता था मेरा सहारा  आ गया..तू मुझे हमेशा पूरा करती थी। .
एक पल मुझे नहीं छोड़ती थी। कभी कभी तुझे गोद  में ले कर खाना बनाती  थी। कभी तंग नहीं करती थी खाने का तो तुझे कितना शौक था। मुझे खाना बनाने में तेरी वजह से ही मज़ा आता था। अच्छा ! सुन वो डोनट और चॉक्लेट जो तुम दोनों केलिए बनती थी उसकी इतनी डिमांड हो गयी  ..... सब जगह खूब स्टाल लगयी कॉलोनी में। ...... एक तो तेरे ही सामने लगायी थी।  फिर बिंदिया आंटी ने चॉकलेट क्लास खोलने के लिए तैयार ही कर लिया मुझे वो भी हर महीने ले लेती हूँ  मैं ।  पूरा करा  न मुझे तूने, बिटिया !
.तेरे पापा ने भी बहुत खिलाया तुझे। पापा और मेरी तरफ की हर एक रिस्तेदार से तू मिली है और खूब गोद में खेली है। सबको तेरी खूब याद है।
भाई तो तुझ पर जान छिड़कता ही है। आज भी भाईदूज पर तेरी दी राखी रोली चावल  लागाता है
पापा भी याद करते है बहुत वही छोटा सा मुँह बना लेतेहै।  तेरी याद आती है सोफे का कवर सही कर देते है। आजकल कभी कभी काम भी करा देते है।  नेलपॉलिश और लिपस्टिक लगते वक़्त तेरी याद आ ही जाती है। सरिता भी तुझे याद करती है। मौसी की शादी में सब तेरी ही बातें कर रहे थे। मामा तेरा फ़ोन पे बात करना बहुत मिस करता है ।  नानी नाना ठीक है बस, और धीरे काम करने लग गए है।

पुरानी और नयी दोनों कॉलोनी में कंचके पर तुझे सब बहुत याद करते है तेरा लहँगा बिंदी चूड़ी पूरी देसी गुड़िया सी सबको बहुत याद आती  है।

कभी कोई हमे बेचारे माँ बाप बता कर तरस खाता है कभी कुछ...... पर हमे पता है मेरी गुड़िया  हमें  पूरा कर दिया। .........  भाई की कलाई ,भरने पिता की लक्ष्मी  बन कर आयी थी तू। ........ देवी ने दिया और देवी ने ही लिया।  जहाँ रहना खुश रहना स्वस्थ रहना। ...
जितनी थी हमारी थी. जब तक हम है तू हमारी ही  रहेगी।
 ढेर ढेर प्यार और आशीर्वाद
 एक पूरी माँ. ....


रविवार, 30 सितंबर 2018

आप क्या लोगे क्या दोगे
facebook के पोस्ट देख कर खुद के मन में टीस उठेगी 
ऐसा  लगेगा बस तुम्हारा ही घर है जहाँ कलेश ही कलेश है 
मन में चाह उठेगी, काश !वह पहुंच जाये 
जहाँ मेरी so  called  दोस्त post मेरे दिमाग और दिल में परेशां कर रहे है 
क्या कर सकते  है?  चलो इसी बात पे लड़ लेते है 
जाने क्यों! खुद का अस्तित्व को छोड़ के एक पर्दा में क्यों रहते है 
थोड़ी थोड़ी छोटी छोटी बातें  क्यों उलझा जाते है 
जाने क्यों यहाँ यहाँ क्यों होत्ता है 
मन को टटोले उसमे  छिप्पी  अच्छाई को  गले लगा लो 
थोड़ा सा देखो थोड़ा सा समझो
बस इतनी ही सहन शक्ति है छोड़ो दो
आसान राह अपना लो
ज़रा सोच को बड़ा करके देखो
बहुत बड़ा है यह दिल और दिमाग उसको फैला करदेखो
कभी कोरे कागज़ पे कूची चला के देखो
खुद के दिमाग की परछायी  मिलेगी उससे नयी राह  दो
आपने से नाता जोड़ो ,बाकि सब छोडो
नयी दुनिया हो या पुरानी हर जन्म हर वक़्त बस दिमाग  ही कीमती होता है
बंद मुट्ठी की ताकत को social media पे बर्बाद मत करो
social media एक मंच है, अपनी दिमाग का अस्तित्व है
उससे सही इस्तेमल  करो
मज़े  लो दुनिया में आके
 पता करो  हम दुनिया में क्यों आये है। 

रविवार, 23 सितंबर 2018

रूहानियत


काश ! यही कशिश की रूहानियत यूही  बरक़रार रहे
समय के साथ रुखसत होत्ते एहसास
प्यार  पे सवाल और तकरार के ध्यान
एक एहसास की खातिर पूरी उम्र बीत जाती है
कभी धूल से निकलते उस दबे एहसास को
कोई छू के  मन में दर आ जाता
वक़्त या बेवक़्त आ जाते है
एक एहसास ने बहुत किस्से लिखे है।

उम्र के लिहाज़ और वक़्त के एहसास को
अपनी गलतियों का नाम मत दो
कुछ एहसास बहुत भीगे होते हो
मन को भिगो देते है
उनकी याद में आंसू नहीं बहते
 उन्हें अपनी ताकत बनाते है
रश्क़ से कह सकते है
यह दिल नादाँ नहीं बस बयां नहीं कर पता
जादुई एहसास ने हमारे भी दिल पर दस्तक दी है
युहि कोई कलम और कागज़ को हमराज़ नहीं बनता

बड़े बड़े शेर और बड़ी बड़ी जंग
उन एहसास की तस्वीर बनती है
ऐसे ही कोई दाद  नहीं पाता







रविवार, 9 सितंबर 2018

बहुत बरस

आशा ,तू क्यों नहीं कर रही दूसरा बच्चा ?बस रोये जा रही है..... क्या, किसी ने कुछ कहाँ ?
आरि ,बोल न...
मेरी  तो किस्मत ही ख़राब है पति चला गया ?लड़के  ने छोड़ दिया
सोचा था, बुढ़ापा यह सोच के काट लुंगी सब बच्चे अपने अपने घर में  है सुखी है सोच कर
तो महरानी आशा जी, अपने पति और घर छोड़ कर आ गयी।
 बस रोये जा रही है --एक बार भी माँ के लिए नहीं सोचा कैसे पला पोसा बड़ा किया ?
चाय तीसरी बार गरम कर रही हूँ  ---जवानी काम करते करते निकल गई .. बुढ़ापा तू निगल जाना
अरी ,बोल भी कुछ।  करु.....  अंकुश को फ़ोन  --मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा
नहीं, माँ उन्हें  फ़ोन मत करना
अच्छा ,चलजा नहा ले मैं खाना लगाती हूँ......
ठीक है....  माँ
चलो, किसी बात पर तो राज़ी  हुई
 लगता है। .... ज़यादा बात है ,नहीं तो आशा इतनी मूर्ख नहीं है
आजा ,बेटा खाना खा ले
हाँ ,माँ
माँ ,  मुझे कुछ वक़्त दो में सब बताती हूँ .....
हाँ ,तू खा ले आराम से कोईजल्दी नहीं।  तो  जानती  है मुझे बड़बड़ने की आदत है फालतू
कोई बात नहीं ,माँ मुझे पता है....
क्या हुआ था गुड़िया ?
माँ ,तुम्हेअजीब लगेगा शायद दुनिया में लोग तुम्हे पूछे तो तुम बोल भी नहीं पाओगी
कोई बात नहीं ...... दुनिया की परवाह मैंने कब की है
माँ, बात अजीब है -- अंकुश रोज़ लड़ते है और तुम बात सुनोगी तो किस  बात पर तो मुझे समझाना क्या बात है और मैं क्या जवाब  दू ?
अरे ,ये तो कोई बात नही ......  हर मिया बीवी ऐसे ही होते है
आप सुनोगी या बोलोगी
नहीं लाडो  ,तू सुना।
 माँ ,सब देख कर शादी की थी पर आज भी लड़ते है तो ---मेरे रंग रूप पर
मैं  सब काम करती हूँ--  प्रेस ,झाड़ू पोछा ,बर्तन ,सभी समाना  तरतीब से रखती हूँ--  बच्चो को टाइम पे सब देती हूँ--- खाना रोज़ इतने मन से बनाकर देती हूँ --नाश्ता इतने प्यार से लगाती हूँ -- बच्चो को भी बहुत डेग से रखती हूँ
खुद भी ढंग  से रहती हूँ
सारा सामान राशन पानी खुद ही कर लेती हूँ .....  पर ये हमेशा गुस्सा रहते है
आज तक पंद्रह साल में एक बार ये नहीं कहाँ की कुछ किया इनके दोस्तों के आने पर सबसे अच्छा नाश्ता --खाना इनसे पूछ कर बनती हूँ  पर इतनी तल्खी रहती है .......
मैं कभी अपने लिए कुछ खरीदती नहीं अपनी मर्ज़ी से
घर लिया इनकी मर्ज़ी
लड़ेंगे और बोलेंगे ---तुमने क्या किया आज तक ?आधी अधूरी हर चीज़ करी ?तुम घर में क्या करती हो ?
मेरी मति मारी गयी जो तुम्हारे जैसी औरत से शादी करी ?मेरे घर वाले सब मन कर रहे थे पर फिर भी मैंने तुमसे शादी  कर ली  एहसान मनो मेरा ?हर चीज़ तुम्हारे घर से बेहतर दी ?दुनिया घुमा रहा हूँ ?इतने महंगे कपडे और सामान कभी नहीं देखा होगा तुमने।
 मेरे बच्चो की चिंता मत करो ,तुम्हारे जैसी हज़ारो  माँ मिल जाएँगी।  आज तक क्या दिया है तुमने उनको

माँ, ये सब मैं पिछले पंद्रह सालो से रोज़ सुन रही हूँ। इस आस में की ये सब दिल से नहीं बोल रहे है
तू जवाब नहीं देती
देती थी माँ,  पर कब तक दू  और क्या दू?
जहाँ तक घर में क्या करती हो ?--मैंने कहाँ जो तुम्हारी माँ और बहन  करते है
बस ,फिर घर वालो पे लड़ना शरू कर दिया
मेरा जवाब इनकी ईगो पर बहुत भारी पड़ते थे सुन नहीं पाते और में जितना बोलती यह अगले पांच दिन तक सोच सोच कर मुझसे उसी बात पर चोट पहुंचते .....मैं रात-रात भर रोती पर कोई फ़र्क़ नहीं
में बुखार में थी तो भी दवा तक नहीं दी
बच्चो, के सामने मुझे ये औरत ये औरत कहते रहते ........
मैंने सबसे बहुत दुरी बना राखी थी --इनके दोस्तों घर वालो --सबके सामने मेरी बेजजती से भी बाज़ नहीं आते
मैंने  हंस कर टालना शरू किया तब थोड़ा कम हुआ
फिर मैंने सबसे बात करने ही बंद कर दिया
क्योंकि बात करती तो लड़ाई----क्या बोलती हो कुछ अक़्ल नहीं है
यदि नहीं करती तो --तुम तो चाहती हो मैं सबसे अलग हो जाऊ और तुम्हारे पैरो  में पड़ा रहू।
माँ,मुझे कुछ समझ नहीं आता
रोना आता  तो बोलते मनहूसियत फैलती हो ---अगर हंसती तो-- तुम्हे क्या फ़र्क़ पड़ता है
माँ मुझे यही समझ नहीं आता की -क्या करू ?कैसे जवाब दू ?या न दू ?
बच्चे सुन रहे है अच्छा होगा या नहीं। इसी उधेडबुन में में खो जाती हुँ सब सुन कर फिर चुप हो जाती हूँ
हमेशा सोचती थी सबकी  लाइफ ऐसी हि होती है
पर माँ मेरी कुछ ज़यादा बिखर गयी मैंने दोनों तरह से काम किया बोल के बिना बोले इसी उधेड़बुन  में मेरे इतने साल निकल गए पर कुछ नहीं हाथ नहीं लगा   ....... मैं अपनी लाश लेके एक ख़ुशी  की लकीर को ढूंढ़ती रहती गयी मेरा स्वाभिमान मेरा विश्वास सब चकनाचूर हो गया।  बच्चो को देख कर संभल जाती  थी खुद को उठा कर फिर जीती  थी ,पर आज वो भी नहीं कर पायी फिर पता चाल गया अब जाने  वक़्त आ गया और मैं  आ गयी।  ..... माँ मैंने आज मरने की कोशिश की
माँ ,क्या हुआ ?
कुछ नहीं सोच रही थी तेरी समस्या बहुत जटिल है इसका कोई समाधान नज़र नहीं आ रहा।
 हाँ माँ, बहुत सोचा  सुझा ही नहीं
जब भी किसी सहेली से बात करने की कोशिश की उसने अपनी समस्या गिना दी और मुफ्त की सलाह  दे दी की हर कोई  ऐसे ही जी रहा है
माँ आपको याद है मेरे सपने छोटे छोटे सपने अंकुश के  साथ हर दिन आपने सपनो की अर्थी उठते देखा है
अब सपनो से डर  लगता है
जब भी सपने बताये --लगा दुनिया की हर शक्ति उन्हें न पूरा करने की कसम खा  ली है
हम्म्म ,तू कोई काम शरू कर दे
कौन , काम देगा मुझे  ?
बेटा ,माना तुझे बहुत टाइम हो गया पर सोच कोई तो मिल जायेगा
अच्छा ,माँ सोचती हूँ......
सोच मत अपना पेट तो पलना ही पड़ेगा पढ़ी लिखी तो है ही
 हाँ ,माँ तू पढ़ाने का काम शरू कर दे ,या खाना बनाने की क्लास शरू कर दे
सब ठीक हो जायेगा
बहुत बरसो से औरत के साथ यही होता रहा है आगे भी होगा /तुझे यहाँ रहना है रह ले ले आने दे हज़ार माँ






























बहुत थोड़ा थोड़ा करके जमा  है
नज़र के सामने नज़र से दूर किया है 
दिल पे पत्थर रख कर जी रहे है 
कभी किसी ने ऐसा नहीं किया है 
होताहै क्या ?
हुआ क्या है मन है छोटा सा तनहा सा 
बहुत अरमानो को दिल में संजोया
  एक सूखे  पत्ते की तरह उड़  गया 
नाराज़ थी ,हर छोटी बड़ी से आज फिर तन्हां हुँ 
रश्क  था अपनी ताकत पे आज सब कोने में पड़ा है 
याद  है सबकी इधर उधर सब बिखरा  पड़ा है 
चाह  बहुत थी मिलजाए सब  पर नज़र न आया 
एक  बार फिर सपनो के संसार में खुद को अकेला पाया 
काश !मिल जाता कोई मुझे भी 
उस एक नज़र का इंतज़ार मरते दम तक रह है  
धीरे धीरे  दिल के कोने में एक खवाब फिर पनप  
पर फिर उसे बुनने की हिम्मत कोई न  दे पाया
उस ख्वाब को घुट कर मरने केलिए मैंने छोड़ा है
आज फिर होशियारों की बस्ती में सीखो का मेला है
अपनी द्यौस  और मगज़ मरी में हर कोई लगा है
जाने इन फ़लसफ़ों ने कितने को बर्बाद किया
आबाद तो कोई है नहीं इन गलियों में
बहुत से ख्वाबो को फांसी चढ़ते देखा है


मन के द्वार

बेचैन मन के द्वार खोल, एक ख्याल घुस गया
बार बार निकल निकल कर 
मेरे जज्बात  बन कर मुस्कुरा कर 
कभी आंसू बन कर निकल जाता 
मुझसे ही लुकाछिप्पी  खेलता 
जब फुर्सत में बुलाती तो ठेंगा दिखा के पलट लेता 
आज भी कसमसाती सी , उन यादो में खुद को तन्हां पाते है
कभी छोटी छोटी खुशियों में भरपूर थे
आज फिर वही रुमानियत की तरजीह याद आती है
कभी तो मेरे मन के अंदर घुसकर सोचा होत्ता
आज में वही नज़र आती हूँ
कभी तो मेरे बीच में आ जाते आज फिर
मुझे तनहा कर निकल गए हो उन थोड़ी थोडी
नोकझोक में मज़्ज़ा नहीं बस तन्हाई का एहसास है
ज़रा थोड़ी देर मेरे पास आ जाते पर न मन  आ पाया न तुम
उन बंद दरवाज़ों केपीछे के सच को न जानो
बड़े हो घिनोने होते है
सबको एक तराज़ू में न तोलो बड़ी बेखबर है ज़िन्दगी उन तन्हाईऐ से
अकेले चलना आसान है पर साथ चलना बहुत मुश्किल है
कभीकभी थोड़े थोड़े अंतर से मन बीत जाता है
पर ऐसे कुछ न देखना बहुत से लोगो के मन में संशय आ जाता है
बहुत दिन बहुत साल यही निकल जाते है
एक दूसरे की कमियों में कभी याद किया होता हम भी अकेले ही थे
आज फिर याद आता है यह दिन हम वही बांध कर रह जाते है
पुराने दिन बहुत याद आते है

शनिवार, 8 सितंबर 2018

भ्रम जाल


मिषा  ने जो कहाँ क्या सच में  वो ऐसा कर सकती है ?
मेरी समझ में नहीं आया --बचपन से हम साथ खेलते थे आज क्या बोल दिया ?
मुझसे ५ साल बड़ी है --मेरा मन दो हिस्सों में बाँट  चूका था-- एक बोल रह था चल जा --दूसरा कह रहा था नहीं
मैं बेचैन था, उससे मिलने के लिए --अच्छी तो  हमेशा लगती थी पर यहाँ। नहीं सोचा था
अब क्या करू?
कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है मेरी यही तो ---उनहोंने आराम से बोला  --मुझे बना ले --घुमनेगे फिरेंगे और भुल जायेंगे
मुझे ठीक ही लग रहा था
किसी को शक भी नहीं होगा
और एक सिलसिला बन गया।
शायद ,किसी उम्मीद से न बना रिश्ता  सबसे अच्छा होत्ता है
उन्हें मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी न मुझे उनसे जो फ़िक्र थी वो तो हमेशा एक गहरे पडोसी की नाते थी
कोई  हमारे रिश्ते पे शक  नहीं कर सकता
उन्होंने बहुत अच्छी बात कही सिर्फ एक दूसरे के समझने की बात है
गर्लकॉलेज फ्रेंड चाहिए या साथी ?--साथी ही गर्लफ्रेंड बन जाते  है
पूरी उम्र हमें एक साथी चाहिए होता है --जिससे हमअपने मन की बात कर सके --इस उम्र में हम भटकते है क्योंकि हमारे माता पिता हमे जवाब नहीं दे सकते
हम पार्क जाते रेस्टरेंट जाते बस यूही जाते रहते
बहुत सी बाते करते
एक महीने तक हम ऐसे दोस्त रहे
मेरे बर्थडे पर सोने का मेरेनाम पेन्डेन्ट दिया
और हमेशा के लिए चली गयी
मैं कॉलेज आ गया
वो ठंडी बयार का झोका बनके शादी में बांध गयी
अगर हर लड़के लड़की को उस उम्र में सही साथी मिल जाए तो लाइफ बन जाती
 सीमा तो नहीं लाँघी  न ही ऐसी कभी  जागी
कुछ हवा के झोके खुशबू बन कर आते है और युही   जीवन महका जाते है
भ्रम था पर बहुत मीठी  उसकी


गुरुवार, 30 अगस्त 2018

मन की परीक्षा

कभो कभी कुछ पल जुदा  होके भी अपने लगते है
कभी कुछ लोग पराये  होकर भी अपने लगते है
सफर एक न हो  फिर भी मंज़िल तक पंहुचा देते है
कभी कच्चे रास्ते  पक्की नीव बनदेते है
कभो पक्के रास्ते  नीव कच्ची कर देते है
छोटे छोटे कदम कब बड़े बन जाते
ऊँचे ख्वाब कभी रह रह  दिवार बन जाते
सफलता की कुंजी नहीं, सफलता कोई दवा नहीं
सफल होना किस्मत नहीं
थोड़ा सी मेहनत  सा ख्वाब की तमिल है

बस यु ही खड़े  थे अरमानो के समंदर में
न जाने कब तूफान आया हम बह चले। .

मन की परतों को न छूना
बहुत से राज दबे है
ज्वालामुखी सोया  रहे तो ही अच्छा है
लावा प्रेरणा बने तो बहुत अच्छा है।

मेरे प्रेम की गहरायी न पूछो
मेरे  मन की परीक्षा न लो
सच्चाई  मेरी आँखों में है
अपने सवाल का जवाब मेरी ख़ामोशी में ढूंढो
तुम्हारे हर लफ्ज़ में बेवफ़ाई  है
मेरी मोहर का इंतज़ार न करो।


परेशां रहने की आदत हो गयी  है
सब कुछ  पहले से ज़यादा है अपनों के सिवा
 लेकिन  रुख में रूखापन है अपनो के बिना
याद भी आती है साथ नहीं रह पाते है
एक इधर दूसरा मुँह उधर कर चले जाते है
कभी प्रतियोगिता कभी जलन में पड़कर
दूरियां बना लेते है नाज़ुक डोर है
थोड़ी मेहनत कर पक्का करना तो होगा ही