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रविवार, 18 मार्च 2018

तरतीब

मंजरी चाय नहीं दोगी क्या आज ?
बस ,ला रही हूँ। ....  आप भी न अब उम्र हो गयी है इतनी जल्दी काम नही कर पाती अब
अच्छा ,लाओ में मदद करवा देता हु नाराज़ मत हो
हाँ ,आप ही तो है मेरा सहारा और मैं आपका
सही कह रही हो हो। .....
चाहो तो साहिल के पास चलते हैकुछ दिन। ....... आने जाने दोनों का टिकट करवा लेते है
नहीं !
अरे, तुम भी न बस ऐसा कुछ नहीं कहाँ था बहु ने की तुम ज़िन्दगी भर मन से लगा लो
आप ने कभी मेरा साथ नहीं दिया
फिर वही  बात --- अच्छा !ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचना कभी --क्या गलती थी उसकी ?या तुम्हारी साजा दोनों भुगत रहे हो , आज तो  बच्चे  बुला भी रहे है ज़यादा माना किया तो वो भी नहीं बोलेंगे
हाँ ,तो नबोले हमने कौन सी उनकी ज़रूरत है
ज़रूरत तो है ....
हमारे खुश रहने से वो खुश रहेंगे उनको पूरा लगेगा और  हमे भी
हाँ, बस बहुत हो गयी बच्चो की तरफदारी
अच्छा चलो मैं  घूमने जा रहा हूँ  सोच लेना। .........

सलिल, सही  तो नही कह रहे .......
वैसे बहु ने बस कहाँ था --थोड़ा तरतीब से काम करा करू। ......
साल भर में सिख गयी मैं ध्यान से काम करना जगह पर सामान रखना
मुझे बुरा क्यों लगा ?
शायद ,बहु थी न
उसने  ध्यान रखा न सलिल न न साहिल अकेले में बोला
अम्मा ,को तो हँसा हंस कर बहुत कुछ बोल देती थी में कभी कभी सबके सामने
चलो मिटटी डालो अच्छी आदत सिख गयी में उसके कारण --सुधा भी तो यही बोली

सलिल ,आप टिकट करवा  लिजीये हम चलते है
अच्छा, परसो का है सामान बांध लो
अच्छा आपको पता था
हाँ भाई इतने साल झक थोड़ी मारी है इतने साल
बच्चो को बता दिया ?
हाँ ,अच्छा एक और बात उन्हें यह नहीं पता की तुम नाराज़ थी उन्हें में अच्छा बहाना बना कर टाल  रहा था
आप ने सही किया में अभी जवान हूँ न इसलिए बाडेबूढ़ो की तरह नहीं सोच पाती
वह वह चलिए आप  सही।





शनिवार, 30 दिसंबर 2017

कभी थोड़ा कभी ज़यादा

कभी थोड़ा कभी ज़यादा
कभी आगे कभी पीछे
कभी इनके कभी उनके
थोड़े थोड़े कदमो में सिमटी खुशियां
बड़ी छोटी बातें है पर मन को गेरी लगती है
तोलो या मोल पर समझ के बोलो
नहीं तो गोली सी लगती है सीने में
कभी पानी  की धरा आंखौं से
बड़े बेज़ुबान ै यही ज़ज़्बात पर
जब दिख जाते है तो रिश्ता बन जाता है
न दिखे तो कसक छोड़ जाता है
कसक की टीस आह ! निकल ही जाती है
छुपने छुपाने  की एक कोशिश है
बड़े आराम से कुछ बहाने बना दिए जाते है
मोहबात  की शरुवात है
आँखों से शरू होकर मन में चली गयी

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

सिमटा लो

कुछ सवाल वक़्त के साथ बड़े हो जाते
कुछ रंज वक़्त के साथ नासूर बन जाते है
कुछ खुशियों के पल सिमट जाते है
कुछ वजह वक़्त के साथ बेवजह हो जाती है
वक़्त और कुछ में पूरा जीवन सिमट जाताहै
तोल मोल से आगे है जीवन है
धरम करम से आगे है बहुत कुछ
ऐसा है ये जीवन कभी-कभी
कुछ कुछ के आगे पीछे निकलता जीवन
 सिमटा लो खुशियों को पल भर की है 

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

रूठ

रूठी हुई है किस्मत, मेरी रूठे हुआ है यार 
रूठा है प्यार मेरा  ,  रूठा यह संसार 
रूठ  रूठ कर  कर ,खुद से रूठ जाती हु  मैं 
कभी कभी यह दिल मुझसे ,कभी में दिमाग में उलझ जाती मैं 
बहुत  सी छोटी छोटी बातें भूल कर काम में लग जाती हु 
बुझा चेहरा देख खुद पे झुंझलाती मैं 
मना मना कर रूठ जाते है लोग 
एक बार छोड़ दो कभी सुधर जाते है लोग 
कभी टीस बाना  कर समय समय पर घाव दे  जाते लोग 
रूठा रूठा मन देख कर बुझ जाते लोग 
माना माना कर खूब खुश हो जाते लोग ज़रा पलट कर देखना 

यह रूठ बस मन की निशानी है 
एक बार रूठ  से रूठ  जाओ ज़िन्दगी भर खुद और सबकी आज़ादी है। 




सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

यूँ ही

रास्ते पे चलते यूँ ही कुछ गलियां  मिल गयी
बाहर बहुत से अरमान कुचले पड़े थे।
गम थे उससे पहले बहुत से आज सब बेमानी लगते है
थोड़ी सी ज़िन्दगी में वक़्त बहुत कम है
शिकायत बहुत है लेकिन गौर करने का वक़्त नहीं है
आज बस आज है कल से बहुत दूर है
न आने वाले कल के पास था न जाने वाले कल के पास था 

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

प्रश्नचिह्न

थोड़ा थोड़ा छोटा छोटा मेरा सपना था
आज बिखरा हुआ  एक  पन्ना है
बड़ी उम्मीद से घर में आये थे
आज तिनका तिनका बिखरा है
थोड़ा थोड़ा गम तो बर्दाश्त  भी था
पर यह गम तोन पी सकते है जी सकते है
ज़रा सोचा होता मेरे बारे में
क्यों इतना बेकार बना दिया ?

जीवन का कोई मतलब होता तो अच्छा होता
आज हर मोड़ पर पलटवार कर देते हो
क्या कर क्या सोचु क्या बनु
शायद ,एक प्रश्न चिन्ह है मेरा जीवन
जिसमे जब मोड़ पर रुकने लगती हु
 आगे खाई आ जाती है
 में फिर धकेल दी जाती हु
इतनी कठिन डगर  होगी सोचा था
 जीवन प्रश्नचिह्न  माँगा न था

मेरे हर निर्णय पर कभी में  प्रश्नचिह्न बन गयी
जब जवाब माँगा  तो  उत्तर में  प्रश्नचिह्न बना दी गयी
न्याय है या अन्याय ऊपर वाले से पूछो
में तो एक निर्णय हु जो  प्रश्नचिह्न की तरह घूमता है

तेरे आने  की ख़ुशी  का ठिकाना था
मुश्किल तेरा जाना था
सोचा तो बहुत था तेरे लिए
पर लिखा कुछ और पर लिखा कुछ और था
 कितना सीखा गयी इतनी सी उम्र में
मेरे करीब है तू, मुझे रास्ता दिखती
मेरी प्रेरणा है तू मेरी अनुष्का
मुझे पूर्ण करती मुझे समझती समझती
मेरी प्यारी बेटियाँ 





अनुष्का

जितने मन से तुझे पाया था
चद पल ने तुझे दूर कर दिया
कभी दिन ऐसा भी था आज बस.
एक अधिकार जो पाया था
तुझे आँचल  में थमाया  था
एक परी  को सपनो में देख तेरी आस लगायी थी
ख्वाब बन कर आयी थी
मातारानी के साथ आयी और चली गयी
भाई की कलाई का इंतज़ाम कर
पापा की परछाईयी को धुंधला कर
माँ की प्रेरणा बन चलती बानी
इतनी सी उम्र में अपने कदमो से रोशन कर घर
जहाँ रहना सुखी रहना स्वस्थ रहना
हमारी प्रेरणा ,हमारी आस ,तू जीवन के हर पल में खास तू
जीवन का खूबसूरत एहसास तू ..... अनुष्का
यही भी एक इत्तेफाक है
हमेशा तुझ पे नाज़ है 
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