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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

बाबुल

छूता बाबुल का आगन चल दी परदेश
छुट गई वो सखी सहेली
छुट गई बचपन की बगियाँ
वो हस्सी ठठोली वो कहकहे
सब घूम हो जाएगा
दुनिया सिमट का इन्सान के वश में हो जाती है
सब खो कर कच अपना नहीं लगता
खुशियों के सपनो के मायने बदल जाते
हरचाह हर आवाज़ को उसकी चाह के साथ मिलना होता है
अपनी सोच अपनी नज़रियाँ बंद बक्से में डालना होता है
सिर्फ़ उनको खुश रखना होता है
अपनी परेशानियों अपने आंसू सिर्फ़ आपके होते है
कोई नहीं होता बाबुल के आंगन के परे
हलकी छींक से बाबुल परेशां होता
सिर्फ़ पसंद न पसंद बताई जाती है
कोई नहीं जो एक पल सुन लेता
सिर्फ़ तुम सुनो
पहनन ऊड़ना चलना फिरना सब बदल जाता
पर फिर भी एक रस है इस भाव में
एक बार जीत लो सबका मन वो ही जीत है ।


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