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शनिवार, 22 अगस्त 2009

दायरे

अनजान अजनबी राहो में गोते लगते
अपनी किस्मत की चाल को समझने के लिए
एक छोर से दुसरे को नाप लेना चाहते है
जीवन नईया की दिशा को समझना चाहते है
इतना असं नहीं होता
भाग्य किस्मत सभी अजमाने से नहीं चलते
एक अनजान शक्ति से संचालित है
सब विधि का विधान है
मन की चंचलता का कोई ज़ोर नहीं होता
अपने दायरे ख़ुद बन जाते है कभी बना दिए जाते है
मन उसमे बाँध जाता है हम जीवन चक्र में समां जाते है
अपनी सीमाए निर्धरित कर देते है
अपनी चाहत भूल कर नया दायरा बना लेते है
अपनी पहचान खो कर नया अक्स पहन लेते है
एक भ्रम मैं पूरा जीवन गुजर कर उसके सार्थक होने के इंतज़ार करते है
जीवन दायरे से निकल जनम दायरे में प्रवेश कर खुश हो जाते है
प्रभु के इस दायरे के सार्थकता का अनुभव सामाजिकता से लगा बेठेते है ।

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