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शनिवार, 22 अगस्त 2009

लक्ष्मी रूपा

दादी के आमो के बीजो में हर क़र्ज़ चुका दिया या उधार उठा लिया
नारी देह की प्रथम किलकारी से महकती बगिया प्यारी
या कर्जो की शरुआत का सिलसिला मान लिया
पिता जोड़ तोड़ से घबराए ,माता बुजुर्गो से कतराए
दादा दादी मायूस नज़र आए
शायद लक्ष्मी रूप समझ न पाए
सिर्फ़ बेटे के चाह में तड़पते नज़र आए
ऐसे द्वार सात जनम तक लक्ष्मी न आए
कौन जाने इस लक्ष्मी रूप के लिए कल कतार लग जाए ।

1 टिप्पणी:

Pramod Tambat ने कहा…

Bahut achchi abhivyakti hai. keep it up.

Pramod Tambat
Bhopal
www.vyangya.blog.co.in

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