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गुरुवार, 20 अगस्त 2009

आदर्श महिला

yh कविता मेरी अपनी, माँ,नानी, दादी, तई,दीदी,..........इन सब लोगो के सफल गृहस्थी चलने के आधार पर कहा है । इनका नजरिया ,दूर की सोच ,घर का बंधन ,प्यार और खुशी की परिभाषा और भी बहुत कुछ ........मुझे बताता है यहे आदर्श है और महिला है ... आज का समाज और स्त्री की सोच ही उसके इस अस्तित्व के पतन का कारण बनेगी ।शायद ,मेरे इस विचार से बहुत लोग सहमत नहीं होंगे .. बदलवा है पर फिर भी अच्छी लड़कियों की कमी नहीं है ,मेरा मन यही कहता है

मैंने कभी आदर्श महिला को नहीं देखा
सोचती हु ऐसी मूरत है वो
पूजा में सजी एक तस्वीर है वो
सब मानते सब जानते है
सबके मन की अभिलाषा वो
भारतीय नारी वो
सारे दुःख सह लेती वो
हर मोड़ पर बदल देती वो
नारी की पहचान वो जननी,बहिन,बेटी,भार्या वो
मत ढालो उससे पाश्चत्य संस्कृति में
बनी वो भारतीयता के लिए
मत पुकारो कल के प्रलय को आज
भसम कर देगा पूजा की देवी के स्वरुप को
चाह नहीं तुम पूजो उसे
बस इतना सम्मान दो ,
न झुके वो स्वय की नजरो से
चाहत है उसे उठने की ,
पर इतनी नहीं की मखोल बन जाए
समझो उसकी आत्मा की भाषा को
वो आन हमारी वो शान हमारी

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