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बुधवार, 19 अगस्त 2009

महकते घर

पुराने घरो की दीवारों में ज़िन्दगी बसती थी
एक अपनेपन की गंध जो सदा बंधे रखती थी
jhdhte प्लास्टर में मनुहारों की खुशबू थी
अलमारी को खोलते ही शरू होते यादो के गलियारे
झरोखों से आती हवा में अपनेपन का एहसास
उन कमरों से आती बचपन की महक
गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा
सारे bhai बहनों का मिलना
बिच के आंगन में धमाचौकडी मचना
दादी नानी के कहानियाँ , दादा नाना के प्यार से लबरेज़
ताप ,शीत ,बरसात से बेखबर वो बचपन का खेल
पूर्वजो की कहानी कहता yh घर
आज के यहे आलीशान महल
न वो कशिश न वो प्यार न आशीष
आधुनिकता की चकाचौंध में खो गया वो घर ,वो अपनापन वो प्यार ।

8 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

लगता है आपकी पोस्ट सही ढंग से प्रकाशित नही हो पायी है.
इसे एडिट करे और नार्मल फोंट चुने ठीक हो जायेगा.

श्यामल सुमन ने कहा…

हाँ रितु जी - चार पंक्तियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता। कुछ सुधार की जरूरत है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

sanjay vyas ने कहा…

अलमारी खोलने से याद आई नारनिया की जादुई दुनिया. कविता अच्छी बन रही है शायद ये और बहुत कहना चाह रही है.....

Pramod Tambat ने कहा…

रितु जी ने शायद अपनी पोस्ट का प्रिव्यू नहीं देखा है और ना ही कमेन्ट्स पर ध्यान दिया है। कविता में काफी त्रृटियाँ भी हैं जिन्हें सुधारकर कमेन्ट में डाल रहा हूँ। रितु जी चाहे तो इसी को कॉपी करके अपनी पोस्ट सुधार लें।

पुराने घरो की दीवारों में ज़िन्दगी बसती थी
एक अपनेपन की गंध जो सदा बाँधे रखती थी
झड़ते प्लास्टर में मनुहारों की खुशबू थी
अलमारी को खोलते ही शुरू होते यादों के गलियारे
झरोखों से आती हवा में अपनेपन का एहसास
उन कमरों से आती बचपन की महक
गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा
सारे भाई-बहनों का मिलना
बीच के आंगन में धमाचौकड़ी मचाना
दादी नानी की कहानियाँ , दादा नाना के प्यार से लबरेज़
ताप ,शीत ,बरसात से बेखबर वो बचपन का खेल
पूर्वजों की कहानी कहता यह घर
आज का यह आलीशान महल
न वो कशिश न वो प्यार न आशीष
आधुनिकता की चकाचौंध में खो गया वो घर ,वो अपनापन वो प्यार ।


प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

M VERMA ने कहा…

सुन्दर रचना. आधुनिकता मे खोते रिश्ते और उसकी चकाचौध

Ritu ने कहा…

Asha hai app sab isse theek tarah se pada pa reh hai ....Pramod ji appka bahut bahut dhaynwad ...mein apki sahirdya se abhari hu ...
meien likhne mein itni mashgul ho jati hu ki trutiyan ko andekha kar jati hu ...........yhe meri kamjori hai .....koshish rehi hu phele kagaz par lik kar phir yhan dalu par .......

Pramod Tambat ने कहा…

रितु जी
गलतियाँ अब भी रह गई है सुधार लें तो कविता का आनंद दोगुना हो जाएगा।
प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

अनिल कान्त : ने कहा…

पुराने बेहद खूबसूरत रिश्तों की महक को आज की वीरान पड़ी चकाचोंध जिंदगी से बिलकुल भी नहीं मिलाया जा सकता...बेहतरीन रचना

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