बुधवार, 19 अगस्त 2009

महकते घर

पुराने घरो की दीवारों में ज़िन्दगी बसती थी
एक अपनेपन की गंध जो सदा बंधे रखती थी
jhdhte प्लास्टर में मनुहारों की खुशबू थी
अलमारी को खोलते ही शरू होते यादो के गलियारे
झरोखों से आती हवा में अपनेपन का एहसास
उन कमरों से आती बचपन की महक
गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा
सारे bhai बहनों का मिलना
बिच के आंगन में धमाचौकडी मचना
दादी नानी के कहानियाँ , दादा नाना के प्यार से लबरेज़
ताप ,शीत ,बरसात से बेखबर वो बचपन का खेल
पूर्वजो की कहानी कहता yh घर
आज के यहे आलीशान महल
न वो कशिश न वो प्यार न आशीष
आधुनिकता की चकाचौंध में खो गया वो घर ,वो अपनापन वो प्यार ।
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