सोमवार, 31 अगस्त 2009

जीवन भगवन

मन की गुथी खोल रे भगवन
कसा है यह मन
यहे चंचल मन कभी अटके कभी भटके
कभी सवाल करे कभी जवाब दे
कभी हसाए कभी रुलाये
कभी भलाई कर पछताए कभी कपट
कभी जलन दिखाए तो कभी प्यार ।

क्या है यह मन ,गुथी खोल रे भगवन
कभी ऊँचे सपने दिखाए
कभी धरातल दिखाए
अपनों को करे पराया
परयो को अपना
कभी मरने को चाहए
कभी जीवन जीने की चाह जगाये।

महके सारा जीवन
में रोऊँ टीओ सब हसे
कसे है यहे जीवन
सब फसे मोह माया में
मन तो चंचल है
इसकी गुथी खोल रे भगवन ॥
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