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सोमवार, 31 अगस्त 2009

जीवन की उड़ान

आकांशा की ऊँची उड़न ने कहा
मत जगाओ मुझे सुप्त ज्वालामुखी हु में
लावा रिस्ता है गरम है
नुकसान न पहुँचा रहा किसी को
सिर्फ़ पुकार रहा निकल जाने मुझे
आकंशाओ की ऊँची उड़ान ने रास्ता दिया
रहा दूर थी जब उमंगो ने जनम लिया
समय की धारा के साथ मिलाप हो गया
टूटी डोर से नाता बरसो का हो गया
बन गई नई राहें जिनसे कोई वास्ता न था
इस उड़ान को कलम ने सहारा दिया
किताबो ने बनाये नींव अभिलाशाओ की झड़ी लग गई
जिन्दा लाश में ज़िन्दगी बस गई
आंसू खुशी बनके छलक गए
गम के साये मंदिरा में डूब गए
वक्त की रफ्तार बदल गई
धरती ने अंचल दिया
अस्मा ने समेत लिया
कहाँ मत छोड़ो इन आकंशाओ को
यही जीवन की सबसे ऊँची उड़ान है ।

1 टिप्पणी:

श्यामल सुमन ने कहा…

कहाँ मत छोड़ो इन आकंक्षाओं को
यही जीवन की सबसे ऊँची उड़ान है।

बहुत खूब ऋतु जी। सचमुच जीवन की सच्चाई और मकसद भी यही है।

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