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गुरुवार, 13 अगस्त 2009

औरत

कैसा अजीब शब्द है यहे औरत ...जब यही माँ ,बेटी ,पत्नी ,बहिन बनता है तो कितना सुखद एहसास होता है ,वही दूसरी ,वो , एसे शब्द सुन कर जी खट्टा हो जाता है । पर है तो सब एक ही बस मायने बदल गए ..लोगो ने अपने समझ के हिसाब से बदल दीये । हर नारी ,स्त्री , एक ही मकसद के लिए जीती है अपने प्रियजनों की खुशी पर कितने लोग इसकी परवाह करते है और उसकी भरपाई कर पाते है ? उसके जीवन के हर मोड़ पर एक हिसाब माँगा जाता है । कभी अच्छी बेटी होंने का ,कभो अच्छी बहिन का ,कभी अच्छी पत्नी और अच्छी माँ का जब इस हिसाब में गड़बड़ होत्ती है......... तो उसे उसकी खता मानी जाती है और इसकी सजा दुनिया तय कर देती है........ उसे जिंदगी भर चुकानी होती है, कही न कही उसकी सजा का हिसाब भी औरो के हिसाब से होते है... वो तो  बस एक कोने  में खाडे रहती है सजा के लिए : एकदम तन्हां जो ऐसा नहीं करती ,वो नारी का दुखद एहसास दे जाती है । सफल नारी कौन है .......यह  कौन जनता है ...इसका क्या मापदंड है ? कौन बता सकता है की सफल कौन है... जो चुप चाप सुनती है ..या जोर जोर से बोलती है कोई नहीं जानता । क्या बताएं ? यहे भाग्य की बात है ऐसा अपने बडो से सुना है..... दादी माँ सब हर बात में लड़की के भाग्य को बता देती थी ..लड़का पैदा हो  लड़की हो अच्छी शादी हो.. बेकार शादी हो अच्छा पढ़  ले या अच्छे घर में रह सब भाग्य अच्छा हो तो लड़की का बुरा तो लड़की का ....पर जो परीक्षा है उसे हर समय देनी  होता है । पर यह  सही है नारी का मन है पढ़ा पाना सही रहता है ..उसके ख़ुद के लिए ...कोई ज़यादा प्यार करे  वो बिगड़ जाती है सर चढ़ जाती है मनमानी करती है ...थोड़ा डर रहता है तो सही रहता है ।

वसे जो आज नारी की हालत है उसके लिए पुरूष ही जिम्मेदार है , अपने इसे पुरूष के सामने अच्छा दिखने के लिए नारी को कई रूप धरने पड़ते है । पिता की अच्छी बेटी , भाई की अच्छी बहिन, पति की अच्छी पत्नी ,पुत्र की अच्छी माता ,ससुराल की अच्छी बहु । अलग अलग रिश्ते... अलग अलग रूप हर रूप का अपने दायरा ......इतने बड़े दायरे में अपना अस्तित्व खो देती है । जब इस दायरे का घेरा इन् लोगो के आगे प्रियतम या कोई और संतान के नाम जाता है...... तब वो एक सामाजिक दयारा पर कर जाती है और उसमे से बेदखल हो जाती है । शायद, एक नारी दूसरी नारी के बारे में बोलने का अधिकार ले लिया जाता तो ..आज कुछ और परिस्थिति होती ...इसमे कोई दो राय नहीं-- नारी नारी की दुश्मन होती है ..बेटी बुरा करे या ससुराल में  बुरा हो तो माँ  वापस नहीं देखना  चाहती , माँ दूर भाग जाती ...है..,पत्नी बुरी हो तो पति से पहले ननद या सास भड़का देती है कितने ही ऐसा लोग है..... जिनका तलाक अलगाव ससुराल की  की नारी के कारण हुआ है । कितनी ही औरत ने दूसरो के पति पर जादू कर के अपने वश में कर लिया और एक घर उजाडा गया ।

समय एक सा नहीं रहता बदलता रहता है इसी समय के फेरे ने औरत के अस्तित्व के नित नए रूप देख .... सरे रूप धरवाए गए नर द्वारा....... पर उसका मूल अस्तित्व नारी का  खोता गया और आज कलयुग में नारी का जो जलन ,इर्षा ...अपना तेरे का रूप बहुत उन्नत हो गया ॥ आज नारी सुपर वूमेन है ...पर उसकी अस्मिता की मर्यादा की सीमा खो चुकी  है ,सब ऐसा है पर नारी की विचारधारा का करांतिकारी परिवर्तन है ...अपने अत्याचारों  का खूब बदला लिया । पर समाज के नियम इतनी आसानी से नहीं बदलते । अपने उन्नत स्वरुप के चक्कर  में वो अपने  असली अस्तित्व और कर्ताय्व्यो को नर- नारी के बहस में घूम कर गई ।

नारी का चंडी रूप समय समय पर सब ने देखा है, और सामना किया है पर हर समय एक रूप कायम नहीं रह जा सकता । आज के अस्तित्व में पैसा है , प्यार नहीं ,सुन्दरता है पर प्रेमी नहीं , पति है पर सम्मान नहीं ,घर है पर खुशाली नहीं ,मन है पर उसके द्वार नहीं,संतुस्ठी नहीं है कहीं ।
नारी को इन सब नियम  में डाल कर भगवन खुश होकर सब देखते रह । और एसे भवर में फासया की वो कभी नहीं निकल सकती ....वो स्वार्थी हो गई.. अपने लिए नहीं तो अपने बच्चो के लिया... कभी पति के लिए और इन सब को अपने बारे में बिना सोचे सब की भलई करने में अपनी और आने वाले स्त्री को मुश्किल में डाल दिया । जब बेटे की पत्नी उससे काम करने के लिए बोलती है तो उसे बुरा लगता है वोही अगर दामाद वोई काम करे तो खुशी मिलती है ,माँ बोले तो ठीक है सास बोले तो बुरा भी लगता है , मायका मायका होत्ता है ससुराल ससुराल ...सच है ।
बहुत मुश्किल होत्ता है ख़ुद से लड़ना और अपने को मानना के आप जिसके लिए हम अपनी ज़िन्दगी की खुशियाँ  बुन रह हो ...वो भी आपका  उतना ध्यान रखता हो  शायद पिता के बाद कोई ऐसा नहींं होता जो अच्छे के लिए सोचे ...पिता भी तब तक सोचता होगा जब तक बेटी सही रहा चलती रह और सही उमर में उसकी शादी हो जाए ... पति का काम चुपचाप आकर दे उसके घर वालों  का प्यार अपमान आसानी से सह ले और बेटे के लिए बहुत सा धन छोड़ दे ...भाई से किसी राखी का मोल न ले ....वो नारी सफल हो जाती है ....क्या?
नारी को हर उपन्यास के इसे किरदार में ढाला जाता है जो कभी भी हटा जाती है कभी भी अपमानित हो जाती है और जो भी कुछ होत्ता है ...उसके लिए उसे एक किरदार के तरह कभी बेवफा कभी तन्हां कभी लाचार दिखया जाता है। वो कभी न कभी अपनी ज़िन्दगी में यहे देख ही लेती है । हर नारी को यहे महसूस होत्ता है ।
जीवन में नर नारी की बहस हमेशा चलती रहगी । नारी हमेशा अच्छी बुरी रहगी । जिस दिन नारी सिर्फ़ बुरी रह गई तब दुनिया ख़तम हो जायेगी .....क्योंकि नर को जेह्लने वाल आर सारा इल्जाम अपने ऊपर लेने वाला कोई नहीं रहेगा ।

3 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

शानदार रचना । स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई।

Ritu ने कहा…

Bahut bahut dhanyawad .....mithilesh ji appko bhi swatantradiwas ki bahut bahut badai

ACHARYA RAMESH SACHDEVA ने कहा…

If you can write songs. Then please write songs on female :
birth to birth (mother) and birth of a baby
We will make a choreography about that.
You have that talent and can do so.
I will feel pleasure if you share all this and do this
Ramesh Sachdeva
hpsdabwali07@gmail.com

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