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मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

गठबंधन


साथ साथ एक तुम्हारे साथ चलते कहते नहीं पता लगा 
कदम के डगमगते भी ना चल पड़ी 
कभी  हम संभल  गए कभी तुम 
कुछ कुछ गलती 
थोड़ी थोड़ी समझदारी से चल रही है गाडी 
 उलटे पुल्टे होते भी हम है एक बंधन में 
मीठी मीठी तकरार में भी मज़ा है 
कभी आशा निराशा में भी एक सहारा है 
नाराज़गी  के बाद भी मनाने की एक आस है 
ज़रा छु दो बस अन्दर तक भीग जायेंगे 
लड़ते लड़ते हँस जायेगे 
बैठे बैठे  रूठ  जायेंगे 
कुछ उम्मीद की नज़र से देख कर अलग बीतों पे लड़ जायेंगे 
कही के गुस्से को कह उतर देंगे 
सब समझते हुए भी नासमझ बन जायेंगे 
कही जलन की जगह को अलग ढंग से बताएँगे 
इसी लुका छिपी में एक उम्र बीत देंगे 
दो अलग अलग परिवारों के पंछी एक घोसला बना देंगे 
कभी सबसे अच्छा और बुरा दोनों को यही बता देंगे 
जाने कौन सा है यह गठबंधन 
वैसे  हम इसे शादी के नाम से जानते है .................


शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

प्रिय बिटिया

प्रिय बिटिया अनुष्का,
तुम्हें जानकर  हर्ष होगा ,तुम्हारी उस आख़री  पुचकार  और अलिगन से सहारे में ज़िंदा हूँ ।   हर लम्हा उस ईश्वर का धन्यवाद करती हूँ की मुझे तुम्हारी जैसी बेटी की माँ बनाया।
  आज भी याद है, जब तुम्हेँ  नर्स ने मुझे दिया था, तुम्हें  देखते ही मैंने अपने आपको पूरा मान  लिया था। यक़ीन  मानों, आज भी कल  बात लगती है। .".. समय की पंख होते है, दादी सही कहती थी ".
अपने सारे सिटिच भूलकर तुम्हारी छठी  और बाराही की तैयारी कर रही थी। ...... ऐसा नहीं की भैया और तुझमें भेद था.........  खुश तब भी उतनी ही थी ........ बस तुझे पा कर पूरा महसूस करती थी ऐसा लगता था मेरा सहारा  आ गया..तू मुझे हमेशा पूरा करती थी। .
एक पल मुझे नहीं छोड़ती थी। कभी कभी तुझे गोद  में ले कर खाना बनाती  थी। कभी तंग नहीं करती थी खाने का तो तुझे कितना शौक था। मुझे खाना बनाने में तेरी वजह से ही मज़ा आता था। अच्छा ! सुन वो डोनट और चॉक्लेट जो तुम दोनों केलिए बनती थी उसकी इतनी डिमांड हो गयी  ..... सब जगह खूब स्टाल लगयी कॉलोनी में। ...... एक तो तेरे ही सामने लगायी थी।  फिर बिंदिया आंटी ने चॉकलेट क्लास खोलने के लिए तैयार ही कर लिया मुझे वो भी हर महीने ले लेती हूँ  मैं ।  पूरा करा  न मुझे तूने, बिटिया !
.तेरे पापा ने भी बहुत खिलाया तुझे। पापा और मेरी तरफ की हर एक रिस्तेदार से तू मिली है और खूब गोद में खेली है। सबको तेरी खूब याद है।
भाई तो तुझ पर जान छिड़कता ही है। आज भी भाईदूज पर तेरी दी राखी रोली चावल  लागाता है
पापा भी याद करते है बहुत वही छोटा सा मुँह बना लेतेहै।  तेरी याद आती है सोफे का कवर सही कर देते है। आजकल कभी कभी काम भी करा देते है।  नेलपॉलिश और लिपस्टिक लगते वक़्त तेरी याद आ ही जाती है। सरिता भी तुझे याद करती है। मौसी की शादी में सब तेरी ही बातें कर रहे थे। मामा तेरा फ़ोन पे बात करना बहुत मिस करता है ।  नानी नाना ठीक है बस, और धीरे काम करने लग गए है।

पुरानी और नयी दोनों कॉलोनी में कंचके पर तुझे सब बहुत याद करते है तेरा लहँगा बिंदी चूड़ी पूरी देसी गुड़िया सी सबको बहुत याद आती  है।

कभी कोई हमे बेचारे माँ बाप बता कर तरस खाता है कभी कुछ...... पर हमे पता है मेरी गुड़िया  हमें  पूरा कर दिया। .........  भाई की कलाई ,भरने पिता की लक्ष्मी  बन कर आयी थी तू। ........ देवी ने दिया और देवी ने ही लिया।  जहाँ रहना खुश रहना स्वस्थ रहना। ...
जितनी थी हमारी थी. जब तक हम है तू हमारी ही  रहेगी।
 ढेर ढेर प्यार और आशीर्वाद
 एक पूरी माँ. ....


रविवार, 20 सितंबर 2020

चाह

इस भीड़ में अपना अक्स  टटोलता  है
कहीं  खो गया मेरा साया
मेरी छोटी सी  ख्वाशियों  की फेरिस्त
पूरी नहीं हो पाई
जब कोई साया पूछता है तुम कहाँ
में अपनी परछायी  और आत्मा से जुदा हु
उस पल ख़ामोशी  पुकार रही  है
तुम खुद नहीं कोई और हो
एक चोला लपेट कर जी रहे हो
खुली सास में तकलीफ है
यहं सपन्दन की अभिव्यक्ति है
एक तड़प है पंख न पसारने की
बेचनी है ऊँचा उठने  की
जज़बात की कद्र की चाहत

बुधवार, 5 अगस्त 2020

तक्लुफ़



















थोडा सा तक्लुफ़ है जीने में
हसरतो की फेहरिस्त लम्बी है 
चंद कागज़ की कमी है 
एक मुकाम के लिए बड़ी दौड़ धुप की है
आज फिर सब रुका सा लगता है 
बहुत कुछ सोचा है पर कुछ दम नहीं 
हर शान के लिए बहुत पिछड़े से लगते है 
खुद  को छोटा ही पाते है 
बहुत सी कोशिश के साथ थोडा का मुकदर दे देते 
आज किसे दोष दू ?
जब ऊपर वाले ने मुह मोड़ लिया है 

सोमवार, 20 जुलाई 2020

यु भी












जब यु भी  चलते थे तो  रास्ते मिलते थे
 आज जब रुके  है तो चौराहा  आ गया
 कभी मन यहं जाता है कभी वह
अपनी बर्बादी का तमाशा भी कोई देखता है
हमने तो खुद को तमाशा  बना दिया
बहुत चाहते थी सब को  मिटा दिया
अब तो सब खाक करने का मन होत्ता है
सब सपने बुनने  एक झूठ लगता
इतनी बेमानी होती है ज़िन्दगी
किसी पडावा पे आके  यह लगता है
आगे के जीवन बोझिल और कठिन
पीछे की यादें  खुबसूरत और फ़िल्मी लागती है
खोये खोये से विचार लगते है

गुरुवार, 18 जून 2020

मेरे पापा

आपने  अपना नाम दिया
जीने का हौंसला  दिया
नयी सोच और दिशा के साथ बढना सिखाया
जीवन के कठिन ताल मेल को असं बाना कर जीना सिखाया
सहज सुन्दर सुदूर सोच के धनी मेरे पापा ने
कभी नहीं कोई भेद भाव दिखाया
इतना प्यार दुलार दिया
कभी नहीं कोई हुकुम चलाया
एक अच्छा इन्सान बनाया
यह मेरी खुशनसीबी है आपको मेरा पापा बनाया

बुधवार, 10 जून 2020

यह सिर्फ एक मज़बूरी है

इंसानियत की सीमा छोड़ कर जानवर से बतर हालत के शिकार है 
कोई हमसे पूछे तेरे दर्द क्या है ? 
इतने बेचारे हो गए है दर्द शकल से झलकने लगा है
छुप छुप कर करह रहे है लेकिन वजह नहीं बता पा  रहे है
दिखावे का जीवन है जाने क्यों हम जी रहें है
मुखोटा है यह जो सब देख रहे है
कभी बधन से आज़ादी के बात लगती है
कभी कोई बेचारी नज़र से देख तो बड़ी आग लगती  है
बड़े इन्सान और रिश्ते की चाह   बांध गए थे आज सब खोखले लग रहे है
नारी के रूप में बेटी और माँ को अलग बिठा रख है
बीवी तो आज भी बोली लगती है
कभी अग्नि परीक्षा कभी कुछ और
बस अब और सह नहीं जाता
क्या कल में भी ऐसी ही सास बनुगी ..?
इस सोच से भी डर  लगता है   .......
क्यों शादी ज़रूरी है ..?यह सिर्फ एक मज़बूरी है ....





रविवार, 31 मई 2020

खूबसूरती की परिभाषा

 बहुत देखी है खूबसूरती की मिसाल 
मन भी गोरा तन भी गोरा 
पर रूप  ही क्यों है इसकी परिभाषा 
नयन नक्श देखो तो  मोह लेती है मोहिनी भी 
कायदा और सलीका देख बहुत से लोगो को आबाद और बर्बाद किया है 
किसी एक - में सब कुछ एसा विरले ही होते है 
कभी खुबसूरत निराले लोग भी होते है 
दिल से छली हो जाते है हुस्न देख कर 
मन को मर उठे है अपनी सूरत देख कर 
दिल तोह मानता नहीं जाबांज बन बैठते है 
इश्क के चक्कर में ड़ाल कर उन  का दीदार भी कर ही लेते है 
कोई गम नहीं इश्क तो हर जवानी  की आबरू होता  है 
सर का ताज होता  है 
कभी लड़के की खूबसरती को दाद मिलती है - कभी  लड़की को 
दोनों को साथ हो ऐसा तो कहानियों में होता  है 
दोनों अगर हो भी बड़ा  दाग भी होता है 
....वसे तो चाँद भी कहँ साफ़ है 
प्रकृति ने सुन्दरता में दाग दिया है 
कभी वो दाग  सुन्दरता बढा  देता है कभी वो घटा देता है 
नजरिया तो हमारा ही होता है ......
कवि की कविता की शोभा है - यह सुन्दरता 
रचना की सार्थकता है - सुन्दरता 
मन को छु लेने का भाव - सुन्दरता 
और भी रूप है सुन्दरता के 
हर पडवा पे मिल ही जाती है......... 
बचपन में अठखेली के रूप में
जवानी में साथी के रूप में 
बुदापे में सादगी और के रूप में 
नज़र तो बदलती रहती ही है 
सुन्दरता के भाव नहीं बदलते 
जवानी के दोस्त बुद्पे तक उतने   ही अज़ीज़ लगते है 
तखत और ताज इस हुस्न के पीछे लूटे है 
कई द्रौपदी  भी बनी है पर मीरा और राधा भी इसी खूबसरती की मूरत थी 
बहुत सी परिभाषा  दी गयी सुन्दरता को
आगे क्या है ? कौन बताईगा ....कल का  क्या होगा  
क्या कोई सही समझ पायेगा ........
...या सिर्फ एक सबसे अच्छा सवांद का मुद्दा रहेगा .........

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

आँखों के गीले कोरे

कभी कभी जीवन में ऐसे मर्मस्पर्शी हादसे हो जाते है जो आप देख कर भूल नहीं पाते इसी कड़ी मं क कविता पेश है आशा है पसंद आएगी



बहुत कुछ खो  गया चांद सालो में
 जो कभी सिर्फ आँखों की भाषा समझ जाते थे
आज सब पराया  लगता  है जब आँखों के गीले  कोरे  भी नज़रअंदाज़  हो  जाते है
बड़ी तन्हाई से कटती ही वो रात जहाँ अनजान दो जिस्म सो रहे होते है
 कल के पन्नो में अपना अक्स ढूंढ़ते है। सपनो सा लगता है कल
बड़ी वजह माना था अपने जीवन की ,आज तो  ज़िन्दगी भी बोझ  लगती है
जिन आँखों में तुम्हारे आने का इंतज़ार था आज वो सुख गयी है
जिस दिल में तुम्हे बिठया  बिखर गया है
बेवजह की बात ,बिन बात  के  बतंगड़
एक दूसरे पर आरोप क्या अंत है इसका ?

इतनी कड़वाहट क साथ कैसे जीवन जीते है ?
 बताया इस बवाल का क्या अंत है ?
इसका क्या अर्थ है ?
 घर में कलेश  कैसे कैसे से घर  पाएगा ?
 तिनका  तिनका करके बिखर जायेगा
इस ख्याल से  भी डर लगता है
बड़े अरमान तो नहीं थे पर आज यह हालत है

क्या हम भी आज हिसा का शिकार है ?
पर खुद तमाशा  बन जाये इतनी ताकत नहीं
आज भी समाज की कथनी करनी का भेद है
छोटे बड़े निचले हर तबके की यही है कहानी
दिमाग की गन्दगी कोई नहीं हटा पाता
मालकिन और बाई साथ रोती  है एक का दिखता  है एक दिखा नहीं पाती। ....




रविवार, 8 मार्च 2020

नारी का दिन














नारी का दिन 
क्या सच में हम नारी को  वो दिन दे पाए है ?

क्या एक नारी ही नारी को सम्मान दे पाई  है ?
आज भी  क्या सास --बहु बेटी को एक मन पाई है 
क्या बेटी होके सब अपना पाते है 
क्या बेटे के खामियों को बहु की कमी बातने  से रोक पाते है 
क्या दिल से दहेज नहीं चाहते है ?
क्या जायदा पढ़ी  बीवी जायदा कमीने वाली बीवी को अपना पाते है ?
क्या बेटा बेटी को एक दर्जा दे पाते है ?
क्या बीवी को पार्लर  भेज कर बच्चा संभल सकते है ?
बीवी को खाना दे सकते बिना वजह के ?
क्या किसी लड़की को अच्छे से निकलने दे सकते है

क्यों लड़के लड़की का दिन की ज़रूरत है ...जो एक नहीं है अलग अलग है इनके परिवेश ..............


जो अच्छे थे वो हमेशा थे  ..पर मज़ा तब है जब कोई भी इनके उतर न  ढूंढे  ............
बहुत सी जगह नारी भी गलत होती है पर व्हो कही का गुस्सा किसी पे होता है 
अपना घर कोई नहीं बिगड़ना चाहता ..ताली दोनों हाथों से बजती है .........सबका प्यार पाना चाहते है 


बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

KBC

घर बेठे बेठे  भी सब खेल रहे यह खेल
हॉट सीट पे नहीं लेकिन कुछ कम भी नहीं समझ रहे
एक आम आदमी हाथ  मिलता बिग बी से हर आम आदमी ले लेता गर्माहट 
जब कोई जीतता सब जीत जाते
इतने आसान होते है जवाब  हॉट सीट के बहार लोगो के लिए
यह lifeline लेता तो अच्छा होता या फिर यह करता तो  अच्छा होता
टीवी ,नहीं घर में भी सब KBC ही खेल रहे  होते
"अबे यह बोल यह तो हो ही नहीं सकता"
कभी यह सब क्रिकेट में था आज KBC में है ............ 

रविवार, 27 जनवरी 2013

क्या क्या हु............?



कभी घर के कोने पड़ा गुलदान हु 
कभी काम की वक्त दिखने की हु
हमकदम के बहुत दूर और न जाने किसके पास हु 
अपने अक्स को देख रहे है पर परछ्यी  से दूर  हु
दुःख को देख के सुख में बदलने के सपने है
कभी अपना कभी उनके चक्र में उलझी हु
अनाड़ी  कभी छोटी कभी बिगड़ी हु
एक कसौटी पे हु हर बार की परीक्षा के लिए
कभी  अपने अस्तित्व के लिए
कभी घर के असित्व के लिए
कभी तारीफ कभी दुद्टकर की
पिता ,पति,बच्चे में पिसती एक दाना हु
कभी किरकरी कभी आटा हु
कभी सख्त कभी नरम हु
क्योंकि में हर पर्सिथी  मेंढल जाती हु 
क्या इसलिए में समझने में मुश्किल  हु ..?
नाम कभी होत्ता नहीं बदनामी में कसर नहीं
घर संभल तो लायक नहीं 
बाहर  संबल तो सुघड़ नहीं
दोनों किया तो घमंडी सही ........
सबकी मानी  तो बुद्धि नहीं
अपनी चलयी तो मगरूर
अगर चालाकी करी तो  सही .......
अच्छी बेटी ,अच्छी बहु और अच्छी माँ बनाना
बहुत ज़रूरी है सारे जनम और पाप मेरे हिस्से के .........
क्योंकि यह सब एक मर्द ने रचाया है
भवर  जाल में हम फसे है
किसी को क्या फर्क
इज्ज़त जाये तो माँ नाराज़
पति नाखुश  तो सास नाराज़  
बच्चा बिगड़े तो माँ का कसूर
सब के पीछे एक नारी
वह !! रे मर्द फुट डालो राज़ करे की नीति अपनायी
चल तेरी माया ने मुझे भी फस लिया .......:)







रविवार, 6 जनवरी 2013

बोली

यह कविता कहीं घर घर की से प्रभावित है में जानती हु कितना मुश्किल है एक मुकाम हासिल करना /आज जब सब सखी मिलती ई तोह अपने सास ससुर के साथ रहने से घबराती है (कोई माना नहीं करता ?) समंजयास मुस्किल लगता है जब रहने लगते है तो आदत हो जाती है l  हम भी कहीं न कहीं अपने कल को देख कर डरते है l सब समझ कर भी कभी नासमझ होने को जी चाहता l थोड़ी मुश्किल बस अपनाना और अपनेपन तक होत्ती है उसके बाद आनंद है l


उन मता  पिता को याद कर रहे हो जब बच्चे तुम पे चीख  रहे है
कल कहाँ थे जब वो तुम्हे  बुला रहे थे
 अपने परिवार का हिस्सा नहीं मन रहे थे
आज क्यों बेदखली पर उदास हो
आज बहुत याद आई होगी उनकी
पहले तो बस दिए पैसे का हिसाब मागने के लिए याद करते थे
उन्होंने कभी तुम्हे दिए पैसे का हिसाब नहीं माँगा
 तुम उनकी एक पैसे उनके ऊपर खर्च को फिसुल खर्च था
आज अपनी ज़रूरत के लिए पैसा मांगते हो तब शर्म कहाँ चली गयी ?
एक दुसरे भाई पे खर्च  टालते हो
काश !! आज हर माता  पिता अपने बच्चो से वो बदला ले सके
उन्हें उनके किये की सजा दे सके
बड़े विरले भी मिलते है इस रहा में
जो बीमारी और उनको बोझ समझते है
आज में अमीर -कल के डर  से होना चाहती हु
पर उस अमीरी की सीमा कौन तय करेगा ?
क्या मेरे सस्कर इतने खोखले होंगे ?
अपनी बोली लगे देखना अजब होगा
बोली का तो जमाना है
कभी हम खुद लगते है कभी कोई और ........
हमारे कल के शब्द  हमारे आज में आते है
मुझे मेरे कल पे इतना भी विश्वास  नहीं है ...
बयार का कसूर है या मेरा कहना कठिन होगा ......









बुधवार, 28 नवंबर 2012

Rose गुलाब

गुलाब की खुशबू में इतना खो गए भूल गए की कांटे भी  है 
खुशबू में इतना गुम  थे की कांटे का एहसास ही नहीं था 
जब हुआ तो खून सुख चूका था आंसू  बहते बहते सुख गये थे 
ज़रा सा झटका लगा तब कांटे का एहसास हुआ ..
में बहुत आगे जाना चाहतो थी पर अकेली ही थी 
सोच था एशिया होगा खुशबू  सा लेकिन खुशख था 
में जी रही थी मरने के लिए मेरी आस जा चुकी  थी 
पावन  गुलाब कभी भगवन को दिया है 
कभी किताब में छुपा कर रखा अपने अनदेखे प्यार के लिए 
पर अपने प्रेम का प्रतिक नहीं बना पाया 
आज उसकी सुखी पट्टी मुझे चिदाती है 
मेरे प्यार का मजाक  बनती है 
 कभी आखिरी पाती में प्यार ढूँढना 
गुलाब मेरे साथी था कभी टीचर को देने का 
कभी राजीव  गाँधी से मिलने पर देना 
मेरे बाग का राजा  मैंने मुस्कुराना सीखा था 
कभी उसके खिलने पर मेरा मन नाच उठता था 
आज उसके कांटे अपने से लगते है 
 



गुरुवार, 15 नवंबर 2012

अभी

रितिका  ..अभी का फ़ोन है 
इस वक्त  ..?
हेल्लो अभी ........क्या ..
हेल्लो
क्या कॉलेज  नहीं गए ...अभी तक 
..नहीं ....गया था ......आ गया
आवाज़ इतनी बुझी बुझी क्यों है.......की परेशानी टी नहीं
हां रीती , में पागल हो गया हु 
क्यों इसमें नयी बात क्या है...?
में पढाई  पे नहीं ध्यान नहीं दे पा रहा हु
पर क्यों ? देखो तुम्हारा MBA का आखिरी साल है परसेंट कम  नहीं होनी चाहिए है 
जानता  हु ?
फिर भी .........में तुमसे मिलना चाहती हु
अभी फिर वही बात होगी ..मेरा जवाब वोही होगा तुम क्यों अपने आप को परेशां करते हो.........
रीती प्लीस  एक बार ......
ठीक है... शाम को घर आ जाओ 
बाय 
बाय
क्या हुआ रीती...?वोही नाटक  ...................सब दौराहेयिंगे 
पर हाँ कह दे .............
पर  मीता  मेरा रिसर्च  आधा रह जायेगा 
क्यों ..?उसको एतराज़  है
नहीं
फिर.......?
पता  नहीं...
पसंद करती है न 
सारी दुनिया को पसंद करती हु.............
अच्छा प्यार करती है..............
शायद ....अच्छा लगता है टाइम बीतना ......................पर वो वैसा तो नहीं होगा..............जैसा अभी है............
वो तो किसी  के लिए एसा ही  होगा ..........................
मुझे  अभी से सुरुचि ने मिलवाया था..................
वो पहले सुरुचि सुरुचि करता था अब ..................
इसमें तेरी कोई गलती नहीं है
क्या पता  कल कोई मिले और .............
इसलिए रिसर्च  ख़तम हो जाये ...फिर जायदा .............
बात तो सही है.................४-५ महीने में फ्री हो जाएगी ...फिर असं होगा.................हम काफी समझदार हो गयी हो
में कोई एसा फैसला नहीं कर सकती .....वो मेरी रिश्तेदार है ...और एक उम्र  के तो आपस में कोमप्रिसों तो
होगा ही...............वसे भी हम साथ नहीं रही तो वो बुरा मान गयी है..................ढाई साल की बात थी ...कसे हाँ करती.............
हे कसे गुजर गए यह साल पाता ही नहीं चला .......
कितना कुछ  सिखा रीती थे कोउन्सेल्लोर से............क्या कैसे कितनी बात करनी है...................पैसा का हिसाब  मुनीम रही होगी .................
अरे .....लड़की और पैसा लड़ाई के दो ही कारण  होते है
कमाल है आप रीती जी .....................
अच्छा इतना  मक्कन क्यों.................?
 पूरे घर छिप कर अपना खर्चा  उठाना कोई असं काम नहीं है..................जो जीवन में सफल होते है ज़रूरी नहीं वो गृहस्थी ..में भी 
पर आप होगी....
अच्छा जी.................वो तो................
अभी जी ..........आ गए खोलिए ..............
अभी ...तुम एक घंटा पहेले आ गए
हां बठो में काफी बना कर लाती हु.......................
हाँ लो भाई ..........काफी... अच्छा में रूम से बाहर
नहीं मीता... एसा नहीं वसे भी रीती तुम्हे बता देगी सब 
तुम बातें करो में अपना presentation पूरा करने जा रही .हु.............
काफी तो पी लो 
वही  पी लुंगी .
हाँ अभी बोलो ............
देखो रीती में सब समझ रहा हु .....पर तुम नहीं समझ रही .............
अच्छा ठीक है में सब समझ रही ही बस समय की नजाकत को समझो
नहीं में अब हर तरह से तैयार हु और तुम भी बस .........
अच्छा ठीक है ......





शनिवार, 10 नवंबर 2012

मुझसे हर पेड़ अपना सा लगता है


मुझसे हर पेड़ अपना सा लगता है
कभी मेरे पास कभी मुझसे दूर लगता है
 कभी आसपास  कानाफुस्सी 
मुझसे  गले लगता कभी मुझसे  दूर जाता
हर पेड़ कुछ कहता है !!!

कभी मेरी चुगली कान लगा के सुनता कभी दोस्तों के ठहाकों में साथ सा
कभी  मिलता सा कभी उनकी उदासी में साथ
कभी क़तर में कभी तनहा  सा मासूम सी  
अंगड़ाई  लेते बेहद मासूम  कभी बच्चा   कभी बड़ा धुप छाव  से लुकाछिप्पी
बड़ा अपना सा लगता है हर पेड़ कुछ कहता है

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

निशब्द

निशब्द सा   होता  जीवन
रिश्तों में आत्ती  खटास 
मुश्किल में पड़ते बंधन 
नासमझी की दीवार
तारतार होती मर्यादा
जाने कौन सी है वो सोच
प्यार के बदलते  मायने 
 अकलेपन सी आफत
दुनिया को दीखने के रिश्ते
कुछ हसी के पीछे बहुत से गम
किसी की निगाह में  काली  बदली
प्यार में बेरुखी है
नज़र में बेदर्दी  है
जाने किस दिशा में बन रहे या रिश्ते
पराये अपने है अपने पराये है
सिकुड़ते जीवन में लम्बी ख्वाइशे

जाने किसी दिशा के रिश्ते है
टूटने और दरकने का एज्सस है
कोई प्यार का साहारा  नहीं
बड़े बदनसीब थे
बेआबरू हो कर ज़िन्दगी चलते रहे है
आज लुटने पर गुनहगार बने  कटघरे में है



  

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

बड़े फ़िल्मी है तुम्हारे सनम --शुभ करवाचौथ !!


अपने उनके साथ  जीवन निकलते निकलते इतनी  आदत हो जाती है जब पीछे मुड  कर देखो तो प्यारी सी मुस्कराहट हर शिकवा गिला धो देती है।हर बड़ी बात छोटी ख़ुशी में बदल जाती है। आ एक और दिन युही साथ चलते चलते निकल गया प्यारी सी याद बन कर ..........




हमे तुमसे प्यार कितना हम नहीं जानते
पर तुम्हे परेशा बहुत करते है ,अधिकार  है
तुम्हारे प्यार को हमारी बकवास से मात देने का हक़ है 
तुम्हारे दिए फूल को फिसूल भी करार देने का हक़ है 
हम तुमसे बहुत प्रेम करते है इसलिए  यह हक़  है ।।

कभी देर से आने पे ,कभी तेरे रूठने मानाने पे
कभी मुझे रुसवा करने पे, कभी अपनी जान न समझने  पे
कभी मेरी बात की हाँ-न कहने  पे
कभी मेरी तारीफ न करने पे
हम गुस्सा होत्ते रहंगे , जब तक है जान।।

तुम्हे पे अपना हुकुम चलने पे
हमारे अच्छे आईडिया पे इतराने  में
हमारे बिना कारण  रोने  पे
कही का गुस्सा कही उतरने पे
माँ की याद आने पे
तुम्हारा शर्ट गिला करेंगे क्योंकि मैंने प्यार किया।।

तुहे मानाने के लिए अच्छा खाना बनाने के लिए
अपनी  पसंद के कपडे पहनाने के लिए
अपने दिल की बात खुल के बताने में
दिवस को मानाने में
 मज़ा तुम्हारे कपडे धोने  और प्रेस करने में
क्योंकि तुम्ही हो बंधू सखा तुम्ही हो।।

तुमरे लिए व्रत रखने में
तुम्हे अच्छे से खाना खाने  के लिए
बच्चो के बातें सुनाने में
घर की बातें सुलझाने में
 तुम्हारी आँखों  में अपनी तारीफ देख कर
कुछ कुछ होत्ता है।।

हम युही रेह्नेग सदा
बहुत कुछ बहुत ज़यादा
दर और दंबंग बनके
ख़ुशी और दुःख मे
क्योंकि तेरा मेरा साथ अमर।।

शुभ करवाचौथ !!






मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

क्योंकि ............

क्योंकि  तुम आदमी हो
   आज मैंने एक बड़ा निर्णय ले लिया ..तुम से अलग  होने का ...हम श्याद साथ नहीं चल सकते .क्योंकि एक बहुत गहरी खायी है दोनों के बीच में ...जो कभी नहीं भर  सकती  इतना लम्बा है फैसला है ...हम कभी भी एक दुसरे  के साथ सुखी नहीं रह सकते /मैंने बहुत कोशिश की तुम्हे साथ तुम्हे हिसाब से कभी मेरे हिसाब ...आज मैंने हर मन ले और तुमसे दूर रहने का फैसला कर लिया।..
मैंने उतनी सही नहीं हु ..जसा की तुमने सोचा था। पर  क्या तुमने कभी सोचा, तुम तो बिलकुल भी वसे न थे जसा मैंने सोचा था। लेकिन एसा कभी नहीं होता की किसी को   मनचाह वर या वधु मिली हो।
लेकिन क्या वो कभी साथ मिलने का नहीं सोच सकते ? सिर्फ इसलिए क्योंकि में एक नारी हु और मुझे तुम्हारी हर बात मनानी चाहिए।लेकिन आज में हार गयी हु.......
 केसे तुम्हे अपने मन की बात बोलू कसे अपना दर्द, अपनी ख़ुशी  तुम्हे बताऊ।मेरी तकलीफ तुम्हे पसंद है मुझे दुखी देखना तम्हारी आत्मा तुम्हारी अहम्  की विजय होती है।तम्हे परिवार नहीं तुम्हे अपना साम्राज्य बनाने के लिए दासी चाहिए ..जो में नहीं बनाना चाहती।
 तुम्हे लगता है तुम मुझे रख  कर मेरे साथ रह कर ...मुझ पर एहसान किया है लेकिन एसा नहीं होता में तुम्हारे लिए काम करती हु क्योंकि में तुमसे प्यार करती हु।लेकिन तुम्हारे इस अहम से भरे तुम्हारे मन के सामने मेरा प्यार छोटा पड़  जाता है ..
मेरी पसंद मेरी चाहत तुम्हारे लिए मानना मतलब तुम्हारे  अहम पे सीधा वार है। में परिवार चाहती हु।रोज़ की लड़ायी नहीं।चिलना चीख़ के बातें करना तुम्हारी आदत है एक पानी  का गिलास शायद तुम बाई से ज़याद्दा तमीज से मांगते होगे। मैंने अपनी चाहत तुम पे कभी थोपनी नहीं चाहिए  थी हमेशा बताना चाहती  थी।
यह सब मैंने कभी  नहीं देखा कभी समंज्यास  के आभाव में आज यह रास्ता मझे इख़्तियार करना पड़ा आज नहीं लेकिन आज जब मेरा बच्चा अपने पेरो  पे खड़ा  हो गया तो लगा सही वक़्त है।
और मुझे तम्हारे बिना जीने के आदत हो गयी अब तुम्हारे साथ पूरे दिन तुम्हारे अहेम से टकराने का दम नहीं है न ही इम्तेहान देनें की ताकत ....
आज भी तुम्हे मुझ पर  उतना यकीन  नहीं जब तब मझे इम्तेहान देना पड़ते  है।
आज भी तुम  "में"  के पुजारी हो हम के नहीं  आज भी में यह कहना चाहता ह जाना चाहत हु मेरा घर ...एसा कौन  सा मोड़ था जब तुम्हे लगा मैंने तुम्हारे घर वालो  को अपना नहीं माना ..?उन्होंने मझे पर हमेशा शक शुभ रहा कुछ भी बोल फिर मैंने जवाब देना शरू किया ..लेकिन अपने कर्म  से कभी मुह नहीं मोड़ा उन्होंने भेद भाव किया मैंने नही।
मेरी यह चिठ्टी तुम्हे शायद समझ न आये लेकिन ..मेरा पास कुछ और नहीं था ....तुम मुझसे बहुत दूर  रहे  आज तुम्हे मैंने दूर कर दिया।
एसा नहीं मैंने सिर्फ एक मुस्किल समय बिताया तुम्हारे साथ .........काफी अच्छा समय भी बिता है हर जगह घूमना फिरना नयी जगह रहना तुम्हारी इतनी बड़े रुतबा की धौस रुपया पैसा और सब कुछ .....सब लोग मेरे जसी मामूली  लड़की की तुमसे शादी होने से बड़े परेशां थे।आज वो सुकून महसूस  करेंगे और में भी .........





बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

कितने रावण है

 
कितने रावण है जो न तोह जले है न मरे है
क्या  एक रावन जला देने से दशहरा  हो जाता है
अपने मन के रावण को कब हम जलाएंगे
कब बुरे और बुरा करने से हम बाज़ आयेंगे
हमेशा हमने किसी का दिल को  दुख देते है
कभी किसी की अच्छाई   नहीं देख  पाते
आगे बड़ते  कदम को रोक देते है किसी का दिल दुखते है
छोटी छोटी खुशियों को अपनी अहेम  और जिद में पिछे  छोड़ देते
 कभी कुछ खट्टी  मिट्ठी यादिएँ याद करके हमने हमेशा मुस्कुराना चाहिए
हमेशा एक जसा समय नहीं रहता दुःख ख़ुशी  एक चक्र होता है
पंचतत्व  में विलीन होंना ही अतिम पड़ाव है


 शुभ दशहरा!!