रविवार, 30 जनवरी 2011

यु तो













मज़िलो को कई  बार पुकारते देखा है ,करीब  से जब पुकार वो बहुत दूर निकल गई
बड़े अरमानो के महल खड़े  किये ,एक ईंट भी नहीं रख पाए
कदम को उत्सह से बढाया , एक  निशान ही नहीं छोड़ पाए
खुद को उड़ने  के लिए तैयार  किया है , हवा से रुख ही नहीं मिला पाए
कभी पिंजरे में बंद किया , कभी कोई दरवाज़ ही नहीं खोल पाया
छटपटाय पंखो को झड दिया है ,हवा के काम तो आएगा
आंख खोल नहीं पाए ,बंद आंख से सब अच्छा लगा रहा था
थोड़े थोड़े  में बहुत किया है बहुत  में नहीं कर पाए
समझदार से तोह निभा गए ,नासमझ के सामने टिक नहीं पाए
मुर्ख समझा तोह कमाल  दिखा गए ,होशियार होकर  दब गए
आज विपरीत शब्द के मतलब सही माये में समझ पाए ..................
Aakhiri Manzil (Novel in HINDI)

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