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मंगलवार, 25 जनवरी 2011

यादें











कितनी खुबसूरत सी होती है यहे यादें
कभी दादी की यादें
कॉलेज की मस्ती की वो मीठी यादें
कभी किसी के जाने की कडवी यादें
आपस में गढ़माढ होती यादें
आज घूमते हुए जगह के सुन्दर द्रश्य की बनती यादें
 इन्ही लम्हों  को याद में पिरो कर ,कल की  बनाने  वाली  यादें बनाने के लिए
जीवन एक फ्ल्मि में कैद हो जाता
हर बार हर वक़्त के साथ  समय का परवर न होता
जीवन सी सीढ़ी चड़ना असं लगता है
उतरती उम्र में यह  यादें असं कर देती है
फर्क तो बस कभी यह रुला देती है कभी हँसा देती है
कभी धुंधला  जाती है  कभी हीरे सी चमकी रहती है
रह रह के बढ याद आती है
हर पड़वा पर किसी न किसी की ..........................................


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