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रविवार, 6 जनवरी 2013

बोली

यह कविता कहीं घर घर की से प्रभावित है में जानती हु कितना मुश्किल है एक मुकाम हासिल करना /आज जब सब सखी मिलती ई तोह अपने सास ससुर के साथ रहने से घबराती है (कोई माना नहीं करता ?) समंजयास मुस्किल लगता है जब रहने लगते है तो आदत हो जाती है l  हम भी कहीं न कहीं अपने कल को देख कर डरते है l सब समझ कर भी कभी नासमझ होने को जी चाहता l थोड़ी मुश्किल बस अपनाना और अपनेपन तक होत्ती है उसके बाद आनंद है l


उन मता  पिता को याद कर रहे हो जब बच्चे तुम पे चीख  रहे है
कल कहाँ थे जब वो तुम्हे  बुला रहे थे
 अपने परिवार का हिस्सा नहीं मन रहे थे
आज क्यों बेदखली पर उदास हो
आज बहुत याद आई होगी उनकी
पहले तो बस दिए पैसे का हिसाब मागने के लिए याद करते थे
उन्होंने कभी तुम्हे दिए पैसे का हिसाब नहीं माँगा
 तुम उनकी एक पैसे उनके ऊपर खर्च को फिसुल खर्च था
आज अपनी ज़रूरत के लिए पैसा मांगते हो तब शर्म कहाँ चली गयी ?
एक दुसरे भाई पे खर्च  टालते हो
काश !! आज हर माता  पिता अपने बच्चो से वो बदला ले सके
उन्हें उनके किये की सजा दे सके
बड़े विरले भी मिलते है इस रहा में
जो बीमारी और उनको बोझ समझते है
आज में अमीर -कल के डर  से होना चाहती हु
पर उस अमीरी की सीमा कौन तय करेगा ?
क्या मेरे सस्कर इतने खोखले होंगे ?
अपनी बोली लगे देखना अजब होगा
बोली का तो जमाना है
कभी हम खुद लगते है कभी कोई और ........
हमारे कल के शब्द  हमारे आज में आते है
मुझे मेरे कल पे इतना भी विश्वास  नहीं है ...
बयार का कसूर है या मेरा कहना कठिन होगा ......









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