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बुधवार, 21 अप्रैल 2010

खुशियों के मायने

कुछ कोरी कल्पनो को पनपते देखा है
कुछ अजनबी इच्छाओ को पूरा होते देखा है
कभी रोते हुए हँस भी दिए है
कभी आसुओ  को बिन बात के लुढकाया है
कोरे पन्नो  पे रंग भी भरे है
 बारिश की बूँद को पकड़ने का नाटक किया है
सप्तरिशी माना है हर ७ तारो के समूह को
इन्द्रधनुष के रंगों को बिखरे दिया है
पेड़ पे चढ़ कर आम भी खाए है
गिल्ली और डंडे पे भी हाथ अजमा लिया है
आज बड़े मुश्किल लागती है यह डगर
सब होते हुए भी सुनी है सेहर
खालीपन आ गया जीवनरस खो गया है
मासूमियत छिप गयी है, हँसी रूठ गयी है
बेमतलब .फ़िज़ूल सी लागती है परछायी
क्या लेंगे किसीका अपना सब लुट बेठे है
खुद से बहुत प्यार है और घर का ख्याल  है
इसलिए जी रहे है मर भी गए तो कौन हमे याद करेगा
यह सोच जी नहीं दुखते
अपने कुछ कर्तव्य है  वही पुरे करते जा रहे है
कदर का तो क्या? इच्छा का तो क्या ?मन के मेल का क्या ?
सब कुछ उड़ते मन के हसीन सपने थे आज उड़ गए
हम ठगे से अपनी अर्थी का इंतज़ार करते है
तभी जीवन अपनी तरफ बुला लेता है
जब सच्चाई  का सामना करते है तो खुशियों के मायने मिल जाते है
बहुत से चीजों  के दोषी हो जात्ते है कुछ सवाल करो तो कटघरे में आ जाते है
कौन सी खुशियाँ ढूंढते है ?सब है बस कुछ बात न मानाने पर जीवन से निराश हो जाते है
एसा भी कहीं होत्ता है नादान दिल का धोखा है
जरा नार हटा के देखो यह सब कितने अपने से लगते है

4 टिप्‍पणियां:

sangeeta swarup ने कहा…

सब कुछ उड़ते मन के हसीन सपने थे आज उड़ गए
हम ठगे से अपनी अर्थी का इंतज़ार करते है
तभी जीवन अपनी तरफ बुला लेता है
जब सच्चाई का सामना करते है तो खुशियों के मायने मिल जाते है

मन के द्वन्द को बखूबी लिखा है....सुन्दर रचना

Udan Tashtari ने कहा…

सब है बस कुछ बात न मानाने पर जीवन से निराश हो जाते है-मानव स्वभाव है.

Ritu ने कहा…

Dhanywad ......nari man hai hi esa :)

Shekhar Kumawat ने कहा…

बहुत सुंदर


bahut khub


shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

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