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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

इंसानियत

इंसानियत की सीमा छोड़ कर जानवर से बतर हालत के शिकार है 
कोई हमसे पूछे तेरे दर्द क्या है ? 
इतने बेचारे हो गए है दर्द शकल से झलकने लगा है
छुप छुप कर करह रहे है लेकिन वजह नहीं बता पा  रहे है
दिखावे का जीवन है जाने क्यों हम जी रहें है
मुखोटा है यह जो सब देख रहे है
कभी बधन से आज़ादी के बात लगती है
कभी कोई बेचारी नज़र से देख तो बड़ी आग लगती  है
बड़े इन्सान और रिश्ते की चाह   बांध गए थे आज सब खोखले लग रहे है
नारी के रूप में बेटी और माँ को अलग बिठा रख है
बीवी तो आज भी बोली लगती है
कभी अग्नि परीक्षा कभी कुछ और
बस अब और सह नहीं जाता
क्या कल में भी ऐसी ही सास बनुगी ..?
इस सोच से भी डर  लगता है   .......
क्यों शादी ज़रूरी है ..?यह सिर्फ एक मज़बूरी है ....





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