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बुधवार, 28 नवंबर 2012

Rose गुलाब

गुलाब की खुशबू में इतना खो गए भूल गए की कांटे भी  है 
खुशबू में इतना गुम  थे की कांटे का एहसास ही नहीं था 
जब हुआ तो खून सुख चूका था आंसू  बहते बहते सुख गये थे 
ज़रा सा झटका लगा तब कांटे का एहसास हुआ ..
में बहुत आगे जाना चाहतो थी पर अकेली ही थी 
सोच था एशिया होगा खुशबू  सा लेकिन खुशख था 
में जी रही थी मरने के लिए मेरी आस जा चुकी  थी 
पावन  गुलाब कभी भगवन को दिया है 
कभी किताब में छुपा कर रखा अपने अनदेखे प्यार के लिए 
पर अपने प्रेम का प्रतिक नहीं बना पाया 
आज उसकी सुखी पट्टी मुझे चिदाती है 
मेरे प्यार का मजाक  बनती है 
 कभी आखिरी पाती में प्यार ढूँढना 
गुलाब मेरे साथी था कभी टीचर को देने का 
कभी राजीव  गाँधी से मिलने पर देना 
मेरे बाग का राजा  मैंने मुस्कुराना सीखा था 
कभी उसके खिलने पर मेरा मन नाच उठता था 
आज उसके कांटे अपने से लगते है 
 



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