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बुधवार, 28 नवंबर 2012

द्वंद

करुना ,मुझे बहुत काम है । आज कुछ और मीटिंग मत रखना ।
पर रीती , ..आज अरुण को आना है ..............
जाते जाते रुकी .....आज .......ठीक है तुम उसे उठा के भेज देना ....
रीती सुनो ...........अरे मेरी बात तो..........चली गई ..........भाग रही है अपनी ज़िन्दगी से। पता नहीं कभी किसी को बोलेगी भी या नहीं ।
द्वंद
हाँ वो भागती है अपने अस्तित्व से अपने दुखो से अपने प्यार से ...इस काम के बोझ में उसने इंतना घूम कर दिया के सब भूल जाना चाहती है हर रात सोने से पहले वो सब याद करती है .नहीं उससे याद आता ही होगा .......आज भी उसकी पूजा करती है और अपने को एक सादे रूप में रख कर दुनिया के सामने अपना दुःख आसानी से छुपा लेती है ।

आठ साल पहले वो अमरीका छोड़ के अचानक आ गई यहं। शादी को साल भर भी नहीं हुआ था उसका ....किसी से कुछ नहीं कहा नागपुर में जाके एक कॉलेज ज्वाइन कर लिया । किसी को ख़बर नहीं की वो आ गई है । निरल पैदा होंने वाला था । समझ में नहीं आता अकेले उसने यह सब किया । जब निरल २ साल का था तो अचानक हम एक कांफ्रेंस में टकरा गए । में उसे यहं देख कर हैरान थी......... वो बिल्कुल शांत स्वभाव से मिले । और मेरे बारे में सब पूछ कर चलने लगी ...२ दिन की कांफ्रेंस थी १ दिन था तो मुझे कुछ एहसास नहीं हुआ यहे क्या हुआ उसने कुछ नहीं कहाँ मैंने उसे अपनी पूरी दास्ताँ सुना दी ॥उसने हमेशा की तरह सुन ली और फिर उस दिन वो मुझे नहीं मिले में रिसेप्शन से पूछ कर उसके कमरे में गई रात के ११ बाजे थे मुझे देख कर उसने आराम से बुलया और वो मेरे लिए चाय और परले जी बना कर बेठी थी .................मुझे लगा जसे कुछ बदल ही नहीं है बस उसका इरंदा और मजबूत और पक्का हो गया है ।

मुझे देख कर बोली मुझे पता था तुम ज़रूर आओगी ..
.मैंने बोला तुझे तो हमेशा सब पता रहता है ......एक प्यारी से मुस्कान दे दी मैंने बोला तू तू बहुत सुंदर हो गई है एकदम मस्त बहुत रूप चदा है तुझे अमेरिका का इतनी फीकी हसी देख कर में डर गई समझ में आ गया कुछ टूट गया है कुछ छुट गया है ...............हिम्मत ही नहीं हो रही थी कुछ पूछु आगे .........बात आगे बदने के लिए मैंने पुछा यहे तेरा बेटा है ....उसने फिर सँभालते हुए कहाँ हाँ यहे मेरे निरल है ........बहुत क्यूट है एक दम अमेरिकन बच्चा ..............फिर प्यारी हसी ......अरुण कसा है ? यह चहरे के भाव बहुत अलग थे ...........पर वो संभल गई
 बहुत अच्छा है ...
 तुम लोग यहं कब आए .........
...२ साल पहले .......
क्या? मेरे चौकने के बारी थी मैंने झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोला ..और मुझे बतया तक नहीं ...तू तो बोलती थी शादी के एक साल तक सब भूल जाते है फिर सब याद आता है ............ पर तुने तो मुझे याद नहीं किया ..मुझ से सब ने मुह मोडा लिया ...............तुने भी क्योंकि मैंने अंकित को छोड़ दिया था ।

 तुने क्यों छोड़ अंकित को ...?
क्यों क्या मर्द के नाम पर धब्बा था ...न उठाना बैठाना न खाना पीना किसी चीजे की तमीज़ नहीं थी ...........और कोई सुख नहीं बस पैसा इतना था की बस .........उसके माँ पिता की सारे दिन देखभाल करो उनकी सुनो ५-६ नौकरों को संभालो और रात को १० बाजे पति के दर्शन । यहे भी कोई जीवन था । मैंने पैसे से शादी नहीं की थी । चलो अगर वो.... नहीं तो कोई बात नहीं पर उसके अलवा तो मेरी परवाह करो ...में नहीं कहती दिन रात पीछे रहो पर .....मेरे ज़रूरत का ख्याल तो रखो .....कुछ नहीं १००० रूपये की मगज़िने ले आयेंगे पर कोई २० रूपये की सहेली फेमिना नहीं कए जाती .....इसे इतनी बातें थी की ...एक किताब लिख दू .............झट से बोली ..
..लिख दे न रोयल्टी में ले लुंगी अगर तुझे नहीं चाहहिये तो ..........
.....दोनों इतनी ज़ोर से हस्से .....पुराने दिन याद आ गए कितने अच्छे दिन थे
कोई फिकर नहीं ...खुले आकाश की तरफ़ देख कर झूम उठते थे । खूब घूमते थे ..हर नया रेस्त्तारेंट हर नई जगह मन्दिर से ले कर पार्क में जाना किसे भी छुट्टी वाले दिन घर पर नहीं रहते थे । सब अपनी अपनी गाड़ियों पर बेठ कर उड़ते थे रहते थे ......एकदम आजाद पंछी की तरह ............किसी का भी मजाक उड़ते थी और फिर जंगली की तरह हस्ते थे ................सब की मम्मी  बोलती थी कोई तो लड़की वाली आदत रखो पता नहीं ससुराल में जाके क्या करोगी । हम बड़े मज़े से बोलते थे उससे तंग करंगे .....................हस्ते हस्ते अचानक दोनों की आंखे भीग गई .................और एक खामोशी ..डरने वाली खामोशी ने जनम ले लिया .........इतनी मासूम है यहे रीती ..............में उसकी तरफ़ इसे देख रही थी मुझे लग रहा था चटान पिघल रही है लावा फूट सकता है ..................इतनी मासूमियत से पूछ एसा क्यों हुआ करुना ............?मैंने कहाँ क्या ? हमरे वो दिन कह चले गए .......हम हमेशा ऐसे क्यों नहीं रह सकते ? हमे किसी बात की चिंता नहीं थी बस माँ बाप को हमारी चिंता थी हमारी शादी की ..................वरना वो ज़िन्दगी भी क्या बुरी थी ...........
बुरी नहीं बहुत अच्छी थी .............पर कोई माँ बाप बच्चो की खुशी नहीं देख सकता ........पता था रीती को अच्छा नहीं लगेगा वो कभी माँ बाप की बुराई पसंद नहीं करती ...वो बोली क्यों ? मुझे लगा नहीं बदली है यह ..................क्यों का मेरे अलग होंने से खुश नहीं थे ........उन्हें लग रहा था में ग़लत कर रही हु । मेंउन्हें छोड़ दिया .......तो जीत गई ...........?में केसे ?
रीती ने आश्चर्य से पुछा तुने कहा था न की ...तू अलग होने का निर्णय यह सोच कर लेना की तू अकेले है कोई तेरे साथ नहीं बिल्कुल सच था में अकेलेरह गई पर मुझे लगा में सही बात पर थी पर तुने कहाँ तह माँ - बाप भी नहीं ......वो सही में नहीं थे मेरे साथ .में कसे रहती ? फिर नागपुर में आगयी ..आज तेरे ज़ोर देकर किया गया पीएचडी काम आगया ......रीती क्या हुआ ......?कहाँ खो गई ?
पता नहीं करुना में सब भूल गई केसे ................?
कोई नहीं रीती बहुत टाइम हो गया ....?आंटी अंकल कह है ?
वही होंगे अपनी जगह .........तू मिलते नहीं वो मझसे बात नहीं करना ..........उनके हिसाब से उनकी नाक कटा दी .मैंने .....?
क्या ......?
हाँ,शोभा कहाँ है ?अपने पति के साथ आस्ट्रेलियन में सही है ? सब मतलब की दुनिया है ......
...मैंने घर के लिए सब किया अपना प्यार छोड़ दिया अपनी पढाई अपना जॉब में सब को सब दिया आज मेरे पास क्या है ...............करुना ................रीती हा कंधे पर हाथ आते ही में छोटे बच्चे की तरह रोंने लगा गई पता नहीं कितने दिन का गम था जो बह रहा था....हमेशा तेरे हाथ की गर्माहट ने मुझे सहारा दिया है रीती ...तू सोच में कसे बिन बच्चे के रह पाती ........बता मैंने क्या ग़लत किया ? मैंने हु जो मैंने सगाई तोडी वो ग़लत थी पर ...यहे भी मानती हु की मुझे 3-4 लड़के पसंद थे मेरा अफ्फैर रहा है ..पर में अपनी मर्यादा जानती थी ...में कोई भूखी ...........रीती ने मेरे मुह पर हाथ रख दिया ...जानती थी वो ऐसे बात पसंद नहीं करती मुझे अच्छा लगा आज कुछ ग़लत नहीं है
आज फिर हम एक साथ मुश्किल मोड़ पर मिल गए ........
आज भी नहीं जानती एसा क्यों हुआ ......क्या हुआ रीती (इतनी तड़प थी )मैंने प्यार नहीं अपनाया छुटने के डर  से लेकिन शादी भी मुझे बांध नहीं पाई ..
पर रीती वो बहुत अच्छे थे
मैंने कब कहा बुरे थे पति एक बेरहम बाप और पति थे .....
क्या ...?
हाँ , आज भी सब मुझे ही दोषी मानते है ....लेकिन में नहीं मानती ......
पर क्यों .....?
तुझे पता है मुझे अपने रिश्ते बिंदास और प्यार से परिपूर्ण पसंद थे पर तुझे यहे  जान कर हैरानी होगी उन्हें नहीं मेरे मुह से गलियां निकलती थी इन बीते साल में बेहद गुस्से वाली,निर्बल और निस्तेज हो गयी थी मेरी उमंग मर गयी थी  मुझे वो हेवन लगते थे ..सच ....एक बहरूपिया  जो सब के सामने अच्छा है वो अच्छे भी थे लेकिन दुनियां के लिए ...उन्हें परिवार नहीं चाहिए था ...जिम्मेदारी नहीं साम्राज्य चाहिय्र था।। में नहीं देना चाहती थी ... वो सब इसलिए मैंने थोडा बर्दाश्त किया फिर छोड़ दिया ...अपनी बीवी को जूते  की नोक पे रखो दूसरो की बीवी बच्चो को सब कुछ दो .....मुझे लगा उनका जीवन कभी परिवार को नहीं समझ पायेगा ...वो दुनिया के  लिए पैदा हुए है। .....बच्चे को घुमाना,पढना ,सुनना,चाहत को पूरा करना उनकी ज़रूरत नहीं थी  .....अपनी प्रेग्नेंट बीवी पर गुस्सा दिखना हर जवाब गुस्से से देना कभी प्यार से कुछ नहीं पूछना ,हमेशा अपना खाना,पीना,सोना में और मेरे बच्चे क्या कर रहे है कोई मतलब नहीं .......जितना प्यार सब के लिए उतनी ही बेदर्दी बेरुखी हम सब के  लिए ........मुझे यह महसूस होता था अगर में कुछ बोलती तो में गलत हो जाती किसी भी बात को बात नहीं करते ..बस फालतू के तर्क वितर्क ......... मेरे दम घुटता था .....मुझे नीचा  दीखने के लिए हमेशा मेरी बात काटना ...जन बुझ कर मेरे और घर वालो के बीच मतभेद   करना ..फिर मुझे दोष देना ...सब अच्छे के साथ पर लगते थे ..... सब लूटते थे पर बुरी सिर्फ में थी क्योंकि में उनके कहने पर नहीं करती थी ..... नहीं करके आइना दीखती थी .....मेरे बच्चा हर बात चार बार बोलता तब सुनानते मुझे मंज़ूर नहीं था .......उनका जीवन ही अनाथ बच्चे और गरीब महिला का जीवन पर लगने के लिए हुआ था ...फिर वो उनके घर की हो या बहार की .......जब मुझे घर वाले पसंद करने लगे तो मुझ से क्या बेर ...उन्ह खुश होंना चाहिए था पर वो नहीं थे ...बेवजह चिलना रोज़ लड़ना ,हर छुट्टी पे बच्ची के सामने बकवास क्या था एसा जीवन में ..........वो पुरुष नहीं मह्पुरुष थे उनका जनम एक परिवार नहीं दस परिवार के उदार के लिए हुआ था 
इसलिए उन्हें उनकी रहा पर छोड़  दिया।
क्या तलाक ...?
नहीं ,मुझे शादी नहीं करनी और वो करे उनकी मर्ज़ी ......
रिश्ते के दायरे भूल गए मुझे अबला नारी  समझ लिया और बना दिया
अमरीका में रखा लेकिन न गाड़ी चलना न कभी पढाई की बात करना न ही मैंने जसी घर संभाला उसके बारे में बात करना ...बस मेरी बुराइया  ढूँढना  और दूसरो में तारीफ
तुझ में बुराइयाँ .........
हाँ ..बहुत थी मेरे अन्दर ...........
मुझे बोलते तुम ढंग  से बात नहीं करती .........
क्या ..........?....
मैंने  अपना 200% दिया इस रिश्ते को प्यार से लड़ाई से बच्चा करके लेकिन सब बेकार ...........
ऑफिस से आके  कुछ पूछना नहीं अपने घर बात करना ...न बच्चा न बीवी कोई मतलब नहीं किससे मिले या कभी नहीं सुना मुझे ....मुझमे कमियों का भंडार  बना दिया आज मुझे बेहद तनहा कर दिया ...........वासे तो मुझे पता था न साथ खाना न घूमना न प्यार कुछ नहीं सब एक दिखवा था में अन्दर थे निरल के बाद टूट गयी थी ...पर उसके लिए जीना था ............इसलिए जी रही थी ...पर जिस प्यार के लिए मैंने बरसो इतेंज़र किया वो बेहद तकलीफदेह था
.....................
आज भी आंसू निकलते है ...............सबसे बद्दी बात जब इन्सान सब की नज़रों में अच्छा होता है तो गलती मेरी हो दिखती पर मेरे और मेरे बच्चो को अच्छा भविष्य के लिए यहे ज़रूरी था ........हर छुट्टी वाले दिन लड़ना, चिलना, चीखना ,तंग करना  मैं उब गयी थी या तोह बिना बात  की दिवार ...........जो आशियाँ टूटता है तो बहुत दर्द होता है ........इतनी तकलीफ है पर मुझे पर पछतावा बिलकुल नहीं अपने बच्चो पे इसे बाप का साया न पड़े कुछ नहीं होता .......
इसे बाप हो या नहीं कुछ नहीं फर्क पड़ता ............
मेरा दर्द मेरा है ......पर मुझे कुछ ख़ुशी तो है ही .......जीने जनम दिया उन्हें एक अच्छा इन्सान बनाउंगी चाहे बाप ख़राब ही क्यों न हो .........
एसा नहीं की गलती मेरी नहीं थी मेरी भी गलतियाँ थी ....मुझसे बर्दास्त नहीं होत्ता हर  बात मैंने प्यार से और लड़ के बतायी पर कोई असर नहीं ...मेरे बच्चे होंने में जो मेरे साथ व्यवहार था वो कभी नौकरानी की साथ भी नहीं करेगा अरुण .......... मेरा सामान और विश्वास उठ गया ...जसी सोच मेरे लिए थी और दूसरो की बीवी बच्चो को दस सलाह देते थे .......अपने लिए कुछ नहीं बेहद छोटी सोच का घटिया आदमी ............पहले मुझे लगता था आज बस और नहीं लेकिन नहीं उसकी हरकत बढती हा रही थी ...जब मेरे बच्चो को लेन लेजाने में आनाकानी की अपने आनंद के लिए तब मेरा सब्र का बांध टूट गया।।मैंने  छोड़ दिया .......जब निरल कुछ कहता और वो नहीं सुनते  मेरे तन बदन में आग लग जाती .........उसको किसी क्लास में डाले पर कंगाल हो जाता ...रहे अब उस मकान  में कभी घर नहीं बना सकते अरुण ओछा चोट्टा और घटिया .....सोच लगती थी .......
रीती तू ठीक है ..........
मैंने हर रोज़ एक कमरे में बेठ  कर पूरी रात छत से सिर्फ यह पूछती हु मेरी क्या गलती थी ..?मैंने क्या बड़ा चाह ..?सब छोड़ने से पहले सोचती थी अनसु के साथ सोचती थी क्या करू की कभी तो एक छुट्टी अच्छे से निकले ..........?पर में असफल थी  .....और असफल हु .. बहुत विश्वास था की मेरा प्यार कभी  इतना कमज़ोर नहीं होगा ........ पर मैं गलत थी।
बस पहले भी यही सोचती थी छत देखते देखते क्या हो गया ?
मेरी गलती थी की मैंने एक समाजसेवक  में घरेलू पारिवारिक इन्सान ढूंढा .............वो औरो के बच्चो और बीवी के लिए सब कर देते लेकिन मेरे और मेरे बच्चो के लिए इतनी घटिया सोच .......की निरल को बोलते बेटा लायी तो मम्मी है पर पैसा पापा  का है ............
क्या ...?
क्या तू एसा सोच सकती है ...?
रीती उसने तुझे अपनाया नहीं
नहीं कभी नहीं  ......में घर बस रही थी या जंग लड़ रही थी यह बताना मुस्किल थ मेरे लिया ............
कोई बात नहीं समझ में आती ........कैसे भी ....इतनी जिद और बदले की भावना ..कोई आमिर आदमी मिल जाता तो जल जाता किसी के अच्छे मकान  में जाता तो काम्प्लेक्स हो जाता .......किसकी की मदद करता तो सोचता वो इसकी जी हुजूरी करे अपनी तारीफ सुनना चाहता ........इतनी insecure की जॉब बदलता कहीं चैन नहीं क्योंकि मन को कभी नहीं जाना बस हवास, आग,  बदला ,जिद, मन में चोर ,बचकाने फेसले उन पर पछताना कोसना ,मरघट सा मुह बनाना। और भी न जाने क्या क्या ...?
मैंने घर नहीं तोडना चाहती थी पर इस जिद्दी इन्सान के सामने टिकन नामुमकिन था ...हर काम के लिए धमकी आया ........ रोना पीटना ज़बरदस्ती अपने को नीचा दीखना और जब लोग बोले तो चिड जाना ....कोई स्टेबिलिटी नहीं कोई परिपक्वता नहीं बेहद बेवक़ूफ़ और कमतर हरकत ...मुझे उससे गाली देना पसंद था वो असली दर्जा था ..........
वो किसी हरकत को नहीं सुधरता बल्कि बोलने पर ज़यादा ज़यादा करता जाता मुझे कसे भी चलेगा लेकिन मेरे बच्चे को नहीं ............
मैंने जानती थी वो कहाँ कमतर है उससे खुद से भागने की आदत थी इसलिए सच का सामना नहीं कर पता उससे कोई भी चीज़ संभालनी नहीं आती थी ...में क्या खो रहो हु मैंने जानती थी पर मेरे बच्चो और मेरे लिए ज़रूरी था ...  रोज़ उसको मच मच करनी होत्ती थी में तंग आ गयी थी बात तो हमने कभी नहीं की बस अपनी अपनी बात ...............जब में बोलती थी मेरे मुश्किल दिन होत्ते हो मूड उखड जाता है ..वो ज़रूर मुझे ठेस पहुंचता एक बार नहीं बार बार जब मुझे उसके प्यार की ज़रूरत होती वो मेरे मजाक बना रहा होता ..............कसे रहती इसे आदमी के साथ अगर उसे इस बात का एहसास नहीं तो वो जीवित नहीं ...उसमे सिर्फ फालतू विचारो का पुलिंदा है .............उसमे जीने की कोई चाहत नहीं है न वो तंदुरुस्त रहने कहते है न सेहत न अपने दिखने के लिए कुछ करते है बस चिलना लड़ना और अपनी तारीफ करना बड़ी अच्छी तरह करते है ..............

बस जीवन चल रहा है ...............
हम दोनों एक ही रास्ते पर थे ...लेकिन  वजह अलग अलग है ..........
सोचती  हु एक संसथान खोल लू  .....
मैं उस अन्दर के द्वन्द को इतनी गहरायी तक महसूस की है ........किसी को संभालना बहुत ज़रूरी है ...


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