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बुधवार, 8 दिसंबर 2010

दो दिल

बहुत से साल बीत जाते है एक दुसरे के साथ
कभी दो दिल मिल कर नदी बन जाते
कभी दोनों दिल के छोर सागर से भी दूर हो जाते
साथ यह   जीवन इतना असं नहीं होता
सबका अपनी धरती और अपने असमा पे  अधिकार  होता
कभी अकेले रह कर भी साथ होते है कभी साथ होकर भी  तनहा
बहुत नाजुक डोर है दिल से  दिल की
ज़यादा  ढील दे दो तो छुट जाती
कसा पकड़ते ही दम निकल जाता
रख देने पर उलझ जाती है
छोड़ देने पर ग़ुम जाते  है
फिर से तनहा दो दिल भटक जाते है

1 टिप्पणी:

Sunil Kumar ने कहा…

sundar abhivyakti , dil ki achhi vivechna ki
kuchh typing galti ko sudhar le rachna ki utkrishta kam ho jati hai . dhanyvad

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