संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

क्योंकि ............

क्योंकि  तुम आदमी हो
   आज मैंने एक बड़ा निर्णय ले लिया ..तुम से अलग  होने का ...हम श्याद साथ नहीं चल सकते .क्योंकि एक बहुत गहरी खायी है दोनों के बीच में ...जो कभी नहीं भर  सकती  इतना लम्बा है फैसला है ...हम कभी भी एक दुसरे  के साथ सुखी नहीं रह सकते /मैंने बहुत कोशिश की तुम्हे साथ तुम्हे हिसाब से कभी मेरे हिसाब ...आज मैंने हर मन ले और तुमसे दूर रहने का फैसला कर लिया।..
मैंने उतनी सही नहीं हु ..जसा की तुमने सोचा था। पर  क्या तुमने कभी सोचा, तुम तो बिलकुल भी वसे न थे जसा मैंने सोचा था। लेकिन एसा कभी नहीं होता की किसी को   मनचाह वर या वधु मिली हो।
लेकिन क्या वो कभी साथ मिलने का नहीं सोच सकते ? सिर्फ इसलिए क्योंकि में एक नारी हु और मुझे तुम्हारी हर बात मनानी चाहिए।लेकिन आज में हार गयी हु.......
 केसे तुम्हे अपने मन की बात बोलू कसे अपना दर्द, अपनी ख़ुशी  तुम्हे बताऊ।मेरी तकलीफ तुम्हे पसंद है मुझे दुखी देखना तम्हारी आत्मा तुम्हारी अहम्  की विजय होती है।तम्हे परिवार नहीं तुम्हे अपना साम्राज्य बनाने के लिए दासी चाहिए ..जो में नहीं बनाना चाहती।
 तुम्हे लगता है तुम मुझे रख  कर मेरे साथ रह कर ...मुझ पर एहसान किया है लेकिन एसा नहीं होता में तुम्हारे लिए काम करती हु क्योंकि में तुमसे प्यार करती हु।लेकिन तुम्हारे इस अहम से भरे तुम्हारे मन के सामने मेरा प्यार छोटा पड़  जाता है ..
मेरी पसंद मेरी चाहत तुम्हारे लिए मानना मतलब तुम्हारे  अहम पे सीधा वार है। में परिवार चाहती हु।रोज़ की लड़ायी नहीं।चिलना चीख़ के बातें करना तुम्हारी आदत है एक पानी  का गिलास शायद तुम बाई से ज़याद्दा तमीज से मांगते होगे। मैंने अपनी चाहत तुम पे कभी थोपनी नहीं चाहिए  थी हमेशा बताना चाहती  थी।
यह सब मैंने कभी  नहीं देखा कभी समंज्यास  के आभाव में आज यह रास्ता मझे इख़्तियार करना पड़ा आज नहीं लेकिन आज जब मेरा बच्चा अपने पेरो  पे खड़ा  हो गया तो लगा सही वक़्त है।
और मुझे तम्हारे बिना जीने के आदत हो गयी अब तुम्हारे साथ पूरे दिन तुम्हारे अहेम से टकराने का दम नहीं है न ही इम्तेहान देनें की ताकत ....
आज भी तुम्हे मुझ पर  उतना यकीन  नहीं जब तब मझे इम्तेहान देना पड़ते  है।
आज भी तुम  "में"  के पुजारी हो हम के नहीं  आज भी में यह कहना चाहता ह जाना चाहत हु मेरा घर ...एसा कौन  सा मोड़ था जब तुम्हे लगा मैंने तुम्हारे घर वालो  को अपना नहीं माना ..?उन्होंने मझे पर हमेशा शक शुभ रहा कुछ भी बोल फिर मैंने जवाब देना शरू किया ..लेकिन अपने कर्म  से कभी मुह नहीं मोड़ा उन्होंने भेद भाव किया मैंने नही।
मेरी यह चिठ्टी तुम्हे शायद समझ न आये लेकिन ..मेरा पास कुछ और नहीं था ....तुम मुझसे बहुत दूर  रहे  आज तुम्हे मैंने दूर कर दिया।
एसा नहीं मैंने सिर्फ एक मुस्किल समय बिताया तुम्हारे साथ .........काफी अच्छा समय भी बिता है हर जगह घूमना फिरना नयी जगह रहना तुम्हारी इतनी बड़े रुतबा की धौस रुपया पैसा और सब कुछ .....सब लोग मेरे जसी मामूली  लड़की की तुमसे शादी होने से बड़े परेशां थे।आज वो सुकून महसूस  करेंगे और में भी .........





बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

कितने रावण है

 
कितने रावण है जो न तोह जले है न मरे है
क्या  एक रावन जला देने से दशहरा  हो जाता है
अपने मन के रावण को कब हम जलाएंगे
कब बुरे और बुरा करने से हम बाज़ आयेंगे
हमेशा हमने किसी का दिल को  दुख देते है
कभी किसी की अच्छाई   नहीं देख  पाते
आगे बड़ते  कदम को रोक देते है किसी का दिल दुखते है
छोटी छोटी खुशियों को अपनी अहेम  और जिद में पिछे  छोड़ देते
 कभी कुछ खट्टी  मिट्ठी यादिएँ याद करके हमने हमेशा मुस्कुराना चाहिए
हमेशा एक जसा समय नहीं रहता दुःख ख़ुशी  एक चक्र होता है
पंचतत्व  में विलीन होंना ही अतिम पड़ाव है


 शुभ दशहरा!!


 

नयाअवतार



ज़मी की सख्क्त  परतों ने 
एक बार फिर खोल  ही  दिया 
मुझे बोल ही दिया क्यों छिपी  हु
निकल आओ मुझे भी परिवर्तीत  होंना है
और यही समय की मांग है
बरसो से बंधी थी आज फिर बहार हु
कल फिर दबी होगी पर तुम क्यों आ गए ?
परेशां न हो अपनी ताकत को पहचानो
बच कर निकलना नहीं सामना करना सीखो
 अपनी   अंगुली को अपना सहा बना लो
 निकल फेंको अपने डर को
 फिर से नयी मंजिल बनो अपने
 मन अपने के अंध तमस में सफ़ेद लकीर खीच दो
 मिटटी में शक्ति और सोने की ताप को पिघला 
मत सुनो इस अंधी लूली लगड़ी  दुनियाँ की
 आस्था रखो अपने ऊपर प्रतिभा की कवच को
  कल कर नयाअवतार लो
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.