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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

गमगीन

कुछ सिसकियाँ सुन लेने से गम  का अंदाज़ा  नहीं होता
किसी की हँसी से रूह तक नहीं पहुंचा  जा सकता
दिल के राज़ पकड़ना इतना असं नहीं होता
थोड़ी ठोकर से संभालना लाजमी होता है
गमो की गठरी छिपना असं नहीं होत्ता
गमगारो से दिल्लगी न करो
चिंगारी को आग बनाने में देर नहीं लागती
हर कोई गम के समंदर से निकल पाए यह मुमकिन नहीं
गम से साये में छिपे चहरे  के अल्फाज़ पढना इतना असं नहीं होता
हर कोई दिल्लगी करे यह बर्दाश्त नहीं होता
ज़बा  में कडवाहट हो यह ज़रूरी नहीं
 मन का रास्ता साफ़ होंना चाहिए /

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

ज़मी का टुकड़ा

एक ज़मी  के टुकड़े ने किया सब से पराया
माँ -बेटे को दीवार बनाया
भाई भाई का दुश्मन बनाया
अपने अड़े वक़्त के लिए ज़मी का टुकड़ा लिया ,
 आज सारे  रिश्तो के अड़े आ गया .
  सिर्फ ज़रूरत के रह गए रिश्ते
अपने गड़े पसीने की कमाई  से खरीदा टुकड़ा
आज अपने खून को  पसीना करने को तैयार  हो गया
तिनका तिनका करके जोड़ा
आज सब बराबर करने पे अमादा हो गया
अपने बचपन की धुप  छाव को भूल कर
आज जवानी का  रोब दिखाके बोला
कल उसका भी बुढ़ापा  है यह न जाना
किसके पास क्या टिका है यह किसने जाना
कल यह हमारा था आज तुम्हारा है परसों किसी और का
ज़रा मरने का इंतज़ार तो करते हम नहीं अपने साथ लिए जाते
बस अपने साथी की यादें  थी तुम्हारे बचपन के मीठी अठखेलियाँ थी
पास पड़ोस था वर्ना इट,पत्थर से प्यार होता तो क्या बात थी
अपना कीमती  समय तुम्हे देने के बजाये कुछ और कमा लेते या घूम लेते
 यह मकान और पैसा तो मरने के बाद भी मिल जाता
अभी न बोलते तो शायद मेरे जीवन के दो चार साल हँसी  ख़ुशी निभ  जाते
अपने जीवन की सार्थक होने पे खुश रहते
आज एक टीस के  साथ जायेंगे परवरिश में कहीं तो कमी रह गयी
भगवन !! यह कमी तुम्हारी परवरिश से हटा दे  .
एक टुकड़े के ही बात थी अपने जिगर के टुकड़े की इच्छा  से कुछ जायदा  नहीं है .

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

श्रृद्धांजलि

रेनू आनंद ,मेरी सहेली हम नवी क्लास से सहेली थी /बहुत ही शांत ,गंभीर और होशियार/  ३० साल की छोटी से उम्र में उसे जाना पड़ा  किसको को कभी यह नहीं बताया की उससे दिल की कोई बीमारी थी /मुझे भी नहीं ,में अपनी  को उसकी अच्छी सहेली मानती थी /डॉक्टर थी वो  हम आखिर बार एक शादी में मिले थे काफी कमजोर लग रही थी पर यह एहसास नहींथा इतना दुःख रखा है उसने अपने अन्दर /उसे पाता था उससे जाना है इसलिए कितने ही  अच्छे रिश्ते छोड़ दिए / आज उसके घर  में मुझे कौन जनता है कौन नहीं यह तो नहीं पाता पर मेरी सच्ची  श्रृद्धांजलि  है तुझे / में उससे फणीश्वर नाथ के नाम से चिढाती  थी / उसकी मासूम हँसी और मुझे मैथ में मदद करना नहीं भूलूंगी /हम ११ में अलग अलग क्लास में चले गए, पर अस्सेम्ब्ली  में मेरे पास वाली लाइन में खड़ी होती थी ...और भी बहुत कुछ सब कल की ही बात लागती  है  ..और भी बहुत कुछ है बोलने के लिए पर सुने वाले तेरे कान  नहीं ......भगवान !आप  को भी अच्छे लोग चाहिए ,मेरी सहेली का ख्याल  रखियेगा /

हम बहुत बड़ी कवियत्री है

हमने  बहुत बड़ी कवियत्री बनाने के ख्वाब में बड़े  जतन
टूटी मेज़ कुर्सी  का आर्डर दे दिया
घर में सिर्फ धोती पहनाने लग गए हाथ में घडी
 खूब बड़ी अलमारी में ढेर  सी किताबें
एक किताब को भी हाथ न लगाया पर करीने से रखी
गपे मरने के शौक से पीछा छुटे तो कुछ पढते
पति हमारे हम पर बहुत  से फिकरे कसते
जिस महफ़िल में जाते अपने सपनो के नोवेल के प्लाट के चर्चा करते
कुछ समय बाद हम ही चर्चा का विषय हो जाते
बड़े बड़े लोगो की जीवनी पढ़  कर किसी का किस्सा किसी को सुना डालते
कुछ कुछ दबी दबी जबान से  कटाक्ष का हिस्सा बन जाते
जोर की एक फटकार दी सहेली ने
सच्चाई से अवगत कराया
नहीं ज़रूरी इतने नाटक बस करो जग हसाई
अपने को पहचान कर सही जगह इस्तेमाल करो
पूरे पसीने से तरबतर  भगवन!ऐसा  सपना किसको न दिखाए /

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

खुशियों के मायने

कुछ कोरी कल्पनो को पनपते देखा है
कुछ अजनबी इच्छाओ को पूरा होते देखा है
कभी रोते हुए हँस भी दिए है
कभी आसुओ  को बिन बात के लुढकाया है
कोरे पन्नो  पे रंग भी भरे है
 बारिश की बूँद को पकड़ने का नाटक किया है
सप्तरिशी माना है हर ७ तारो के समूह को
इन्द्रधनुष के रंगों को बिखरे दिया है
पेड़ पे चढ़ कर आम भी खाए है
गिल्ली और डंडे पे भी हाथ अजमा लिया है
आज बड़े मुश्किल लागती है यह डगर
सब होते हुए भी सुनी है सेहर
खालीपन आ गया जीवनरस खो गया है
मासूमियत छिप गयी है, हँसी रूठ गयी है
बेमतलब .फ़िज़ूल सी लागती है परछायी
क्या लेंगे किसीका अपना सब लुट बेठे है
खुद से बहुत प्यार है और घर का ख्याल  है
इसलिए जी रहे है मर भी गए तो कौन हमे याद करेगा
यह सोच जी नहीं दुखते
अपने कुछ कर्तव्य है  वही पुरे करते जा रहे है
कदर का तो क्या? इच्छा का तो क्या ?मन के मेल का क्या ?
सब कुछ उड़ते मन के हसीन सपने थे आज उड़ गए
हम ठगे से अपनी अर्थी का इंतज़ार करते है
तभी जीवन अपनी तरफ बुला लेता है
जब सच्चाई  का सामना करते है तो खुशियों के मायने मिल जाते है
बहुत से चीजों  के दोषी हो जात्ते है कुछ सवाल करो तो कटघरे में आ जाते है
कौन सी खुशियाँ ढूंढते है ?सब है बस कुछ बात न मानाने पर जीवन से निराश हो जाते है
एसा भी कहीं होत्ता है नादान दिल का धोखा है
जरा नार हटा के देखो यह सब कितने अपने से लगते है

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

वर्ण का वर्णन

मुझे हर जगह से सलाह मिल रही थी की ,काली दाल,चाय,चना सब बंद कर दो/बस  गिरी (सुखा नारियल ), दूध ,केसर,पनीर,दही  बस यहे ही खाना बाकि सब तुम्हारे और आने वाले बच्चे के लिए ख़राब है बहुत ख़राब है / में तो ख़ुशी के कारण पागल थी मेरी ससुराल वाले इतनी परवाह करते है मेरे जसे खुश किस्मत कोई नहीं / जो बोलते सब में ख़ुशी से पालन किये जा रही थी /सोचती थी , क्या हुआ कोई मेरे पास नहीं पर सब मेरा ध्यान तो रखते ही है /
अचानक एक दिन मेरी ननद ने फ़ोन किया कहाँ कोई काली चीज़ मत खाना वर्ना बच्चा काला होगा .....
तब मेरे दिमाग की घंटी बजी ,,अच्छा!! मेरी माँ, मेरी सासु माँ का यह सलाह  क्या थी.. मेरी सबसे पसंदीदा  काली दाल क्यों नहीं खाऊ .......
चलो मान  लो नहीं खायी दाल पर फिर भी काला हुआ तो ,,और होना भी चाहिए माता पिता का रंग नहीं आएगा तो किसका आएगा /वसे भी कौन से एशियन बच्चे गोरे चिटे होत्ते है बाहर पैदा होने से गोरे  का क्या मतलब..यह दुनिया भी न मेरा दिमाग खाली करके रहेगी ..दिल का रंग कोई भी हो पर चमड़ी  से गोरा होना चाहिए अजीब सोच है /
खेर दुनिया वाले मुझे बोलते थे तुम्हारा रंग दबा है (मैंने जान बुझ कर दबाया  है )लड़का देखने में तुम्हारी माँ को ..वसे तुम्हारे भाई बहिन तो गोरे ............अब इसमें भी दिक्कत .....पर मुझे जो एसा नहीं बोलता था उस पर आश्चर्य होता था ..आजकल पार्लर जाओ सब ठीक हो जाता है ..जिस दिन से मेरा रिश्ता हुआ उस दिन के बाद से में सबसे गुणवान सुन्दर सुशील लड़की हो गयी
खेर मैंने आज तक यह सब बात्तें सुनी ही है ...सब  मानी नहीं (कर्म ,भगवान की देना और किस्मत का कोई तोड़ नहीं  है ) मैंने सब खाया जो मन ने चाह जब चाह बस गैस नहीं होंनी चाहिए ../
मेरा बेटा हुआ ..सब खुश थे शायद बहुत खुश थे ...वो मेरे पति के जसा था उनका रंग दबा था ..जो पूछता कैसा   है मेरा जवाब होता-- बिलकुल अपने पापा पे गया है  इनकी कॉपी है जी ..बस फिर तो आवाज़ और शब्द निकलने बंद हो जाते :लोगो के कैसे  पूछे क्या रंग भी इन्ही पे गया है!!(मेरे तो हँसी से बल पड़ जाते )जब लोगो को फोटो भेजी तो जान में जान आई की गोरा है ...मुझे लगा हर बच्चा एसा ही होत्ता है इतना ही पिंक इतना ही मासूम इतना ही प्यारा ,चार दिन के बच्चे  को देख  यह बताना की माँ जैसा  या पिता हम दोनों के लिए बहुत मुश्किल था ..और मैंने  इतनी मेहनत की तो  में यही बोलती मेरे जैसा  है .
एक दिन मेरी माँ से रहा नहीं गया पूछ ही लिया क्या मौसी पे रंग गया है मैंने  कहाँ सब घर वालो के झलक मिलती है मैंने जान बुझ  कर किसी को बताया  ही नहीं..की असल रंग क्या है मैंने देखना चाहती थी कितना फर्क पड़ता है रंग का और कोई ऐसा  जाना नहीं था जिसने किसी न किसी तरह मुझसे यह पुछा  न हो  /
मेरी कोई दुश्मनी या जिद नहीं है रंग या ऐसा पूछने  वालो से, पर सब को सच मानाने का दम रखना चाहिए .
अगर आप बेटा कहते है  तो बोलो बेटा होगा मुझे ख़ुशी होगा क्यों भगवान बनाने की कोशिश करते हो !
 बोलो मनो की गोरा बच्चा होगा तो मेरी शान ज़यादा होगी! पर कोई यह नहीं मानेगा अच्छा तो अच्छा होता ही है ..पर एक बच्चा बुरा हो सकता ही या भद्दा हो सकता यह कसे कोई सोच सकता है मुझे नहीं लगता कोई सोचता है पर शायद सब एहसास करा देते है की तुम  काले हो लेकिन गोरे को भी वो एहसास करते है क्या वो बुरा मानता है !यह एहसास की तुम काले हो साथ में यह भी जोड़ देते है की वसे रंग से फर्क नहीं पड़ता (अच्छा अगर नहीं पड़ता तो आप इतना क्यों बता रहे है रंग के बारे  में ) गुण होंने चाहिए मन साफ़ होना चाहिए (गोरे लोग चलो काले हो जाओ वर्ना तुम्हारा मन काला है ) सोचिये अगर एसा होता तो क्या कभी negro लोग धरती पे होते सब जगह गोरे ही लोगो को रखना चाहिए /
यह एक मानसिकता है जो सोच के खोखले पन का एहसास कराती है  सुन्दर क पाता है वो सुन्दर है, काले को पाता ही वो काला है,  अंधे को पाता है वो अँधा है ,लूले को पाता है वो लूला है, गरीब को पाता है वो गरीब है  सब को सब पाता है किसी को तरह की नहीं अपनाने की ज़रूरत  है
 वसे अब मेरे बेटा का रंग माता पिता से मिलता जुलता है जिसकी मुझे खुशी है सच / मेरे लिए उसके कर्म का गोरा होना ज़यादा ज़रूरी है /
मज़ेदार बात यह की क्या में अपने पोते के लिए ऐसा  ही सोचुगी ? यह तो वक़्त बताएगा अगर में बदली तो अपनी पोस्ट में ज़रूर बताउंगी /

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

जब मेरे पति ने इच्छा जताई

मेरा पति ने एक दिन इच्छा जताई उन्हें एक गाव की लड़की से शादी करनी थी ,यही सोच  कर मुझसे शादी की (में एक पास के कॉलेज में  पढ़ती थी छोटी  सी जगह से थी .)  पर तुम बड़ी जगह भी देख चुकी थी और तुम्हारा रहन सहन  भी शहर जैसा  था तुम्हारी माँ भी काम करती थी इसलिए वो तुम्हे अपडेट रखती थी .....
यह सुन के मेरा दिल थोडा सा टुटा पर ,फिर मुझे लगा ज़रा अपने पति की गाँव की गोरी बनके दिखाया जाये ---
मैंने बोला वसे आज भी आपकी कही हुए कोई बात नहीं टालती ...
जिसने कुछ देखा नहीं होता यहं US  आके ,वो सब भूल जाती ..इतनी बड़ी दुकाने  इतने अच्छे कपडे ...दिमाग ख़राब हो जाता ........... मुझे तो इतनी अक्ल थी की जितनी  बड़ी उतनी महंगी होगी  तुम्हारा बजट गड़बड़ा जाता ......
न वो मेरी तरह पूजा करती न किसी रिवाज़ को मानती , उसको बहाना मिल जाता यहं कुछ नहीं मिलता ; जबकि अब तो  सब कुछ मिलता है .
(में जलन के बाद भी अच्छी तरह से बोल रही थी )
जब किसी दिन तुम आफिस  से आते तो बिकिनी पहने स्व्मिंग पूल में मिलती ..या किसी गोरे के साथ घुमती दिखती ..
किसी दिन आते तो स्विमिंग पूल में कपडे धो कर भर गार्डेन में सुखा देती और तुम्हे पेनाल्टी भरनी पड़ती ./ लकड़ियाँ इकठा करके चूल्हा बनके रोटी बनाती तो पुलिस ले जाती/ घुघट करके भर जाती कभी नहीं हॉस्पिटल या काम से नहीं जा पाती मेरी तरह (जरा तन के बोला ,मैंने ) और हमेशा तुम्हे छुटटी लेनी पड़ती /

यह बोले अरे तुम तो नाराज़ हो गयी में तो मजाक  कर रहा था ..
अरे तो में कहाँ serious  हु  ..में तो बस यही बता रही थी की आजकल गाँव गाँव में टीवी है किसी से कुछ नहीं छिपता  शहर का चस्का  आसानी से लग जाता है और फिर यह तो विदेश है जहाँ लोगो को बस यही लगता है की घुमो-फिरो और मज़े  करो ,किसी को यह नहीं पता की हर चीज़ का यहं दस गुण पैसा देना होता है पढ़े लिखे गवार है ..में भी एसा ही सोचती थी कभी नहीं पता था की बाथरूम भी  साफ़ करना पड़ता है यह  खुद से बाकि घर  के काम भी सब के लिए मशीन खरीदो  चाहे  पैसा हो या न हो/पास के पार्क में जाने पे भी पैसा लगता है /
बेचारे मेरे पति वो मुझसे बस मजाक कर रहे थे मैंने तो रामायण ही खोल डाली पूरी /
यह सब मिलता है पर नाम अलग है उसे समझ ही नहीं आता  क्या लें ?
देखा !!में कितनी समझदार हु (अपने मुह .......)
अच्छा हुआ फ़ोन बज गया वर्ना सच में पता नहीं कितने विचार मेरे मुह और इनके दिमाग को चोट पहुंचाते /

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

महबूब के एक तड़प और इंतज़ार
बहुत तनहा है एक प्यार की हर किसी को आस है
प्यार  तो  मिल  तो  जाता  संभल नहीं पाता
प्यार के नजाकत न पूछिए  पलक से भी महकने वाला 
और फाये सा मनचला मनमाफिक  
बड़ा बड़े महल नहीं  प्यार के मीठी मीठी  थपकी चाहिए 
एक दिन की नहीं बरसो की आस का परिणाम है 
उम्मीद की डोर  है 
मतलबी और जलन का सुरूर 
कभी कभी  तकरार है फिर मनुहार है 
नज़रो की लुकाछिपी है 
गुस्सा होते होते हसी की फुहार है 
जीवन में झंकार  है  प्यार 
प्रिय की फरमाइश पूरी करने की अदा है 
और क्या कहू 
भगवन  का आशीष है प्यार ...................:)




इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.