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रविवार, 24 जनवरी 2010

अपनी ढपली अपना राग

शादी से मज़ेदार  कोई लेख  हो ही नहीं सकता इतना मसालेदार होती है यह शादी हर उम्र के लोगो के लिए सदियों तक याद रखने के लिए साथ ही उसमे शामिल लोगो के लिए भी और जिनकी शादी होती है वो तो कभी भूल ही नहीं पाते . अलग  अलग  लोग और उनी अलग अलग सोच  का दायरा और मेरा एक नजरिया .


जैसी   लड़की हो उससे उलटे ही लड़के मिलते है लम्बी लड़की हो तो नाटे , गोरी तो काले होनी ही, काली  हो तो गोरे ,सुन्दरता कुछ नहीं होती बस रंग होता है मेरी लड़की काली तो है पर उसके नाक  नक्श  अच्छे है  चहिये , आजकल प्रोफ़ेस्सिओनल और चल गया है ,नौकरी हो ,स्मार्ट हो ,खूब दहेज़  दे बिना मांगे और वि आई पि शादी करे .चाहिए लड़का सडक छाप  ही क्योंना हो देखने में कितना बुरा क्यों न हो ? हम भी तो बोल सकते है इतना  ही पैसा कमाना चाहिए और मेरी बेटी को इतना हर साल देना ही होगा तब ..........

आज कल यह  अच्छा है लव मेरिज हो तो लड़की वाले कुछ  देते ही नहीं है सब दबा जाते है ....और यदि यह  बोल दो हमे दहेज़ नहीं चाहिए तो बस, फिर तो इंतना बेकार स्वागत करते है एकदम  ..आई आई  टी   /आई आई एम् लड़के की बेकद्री कर देते है / और इन्हें लडको को भूत स्वर होता है  प्रेम का ..एकदम आड़ जाते है इसी लड़की से शादी करेंगे ..इतना पढ़ा  लिखा के मना  भी तो नहीं कर सकते.. लड़का पूरा लड़की के कब्जे में होता है और वो लडको वाला रोब ही चला जाता है इसे अच्छा तो आजकल क्लर्क की शादी होती है इतना आता है हमेशा ....हमारे लड़के तो सारी उम्र नौकरी करते है जो दोनों को छुट्टी मिलती है उसमे बहार जाते घुमने..हम ही उनके यहं जा के मिल आते है पूरा काम खुद करो बहु को तो नौकरी पे जाना है कोई फर्क नहीं ...सब लेना देना बंद  मायके से  कुछ नहीं आता ,और अकड़ते ऐसे है लड़की वाले हमारी लड़की के तो बहुत रिश्ते थे ...देख लो वो दिन दूर नहीं जब लड़का होने पे दुःख होगा

लड़की ने अगर खुद लड़का  पसंद किया तो बड़ा ही सुकून मिलता है हम माता पिता का टेंशन ख़तम हो जाता है . अगर अच्छा तो तेरा और अगर बुरा तो तेरा . नहीं तो आजकल की लड़कियां तलाक़ तो ऐसे बोलती है ..की बस ..
और हमारा दहेज़ का भी टेंशन ख़तम और बेटा तो मेरी बेटी के कब्ज़े में ही है /

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मेरे बच्चे के मुस्कान

मेरे  बच्चे के मुस्कान में मेरा जहन समाया है
 सुबह शाम की घडी को उसके हिसाब से चलाया  है
कभी यह मुस्कान मेरा दिन बना देती कभी गुस्सा काफूर कर देती
मेरी हँसी का हँस कर जवाब देता तो में गद गद हो जाती
 हमेशा खिलता रहे उसका यह  मुख प्यारा
माँ की अपार ममता का मतलब अब समझ आया
हर पल उसको खुश देखने के चाह है
हर माँ के दिल की आवाज़ एक होती है बस उसे सुनाने वाले कान चाहिए
यहे विधान है खुद माँ बन कर ही इस एहसास को जिया  जा सकता है

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सफल गृहणी

खो गयी शब्दों के धार,नहीं हो रह अच्छे वार
कोई कविता कहानी या नज़म नहीं बना  पाए
लगता है  recession की मार  मेरी लेखनी ने खायी
या इस उम्र का तकाजा है जिसमे  तजुर्ब तो बढ़ा है लव्ज़  कम हो गए
कलम उठाते ही उठ तो जाती है पर चल नहीं पाती
जब खाली  पन्ना दूर होता है तो दिमाग उम्दा सोच से  कविता बना डालता है
जसे ही पन्ना मिलता है विचार गुम हो जाता है
अजब  पहेली  बन गयी है लेखनी
अरे अब याद आया में कविता पकने रख आई  हु जल्दी ही बन जाएगी
खाने का स्वाद तो बढ़ा गया है अपनी सोच का दायरा सिमट गया है
जीवन की  उलझने इतनी है की अपनी पसंद ही भूल गयी हु
या में एक सफल गृहणी हो गयी हु .

शनिवार, 16 जनवरी 2010

अच्छी उसकी कमाई हो कोई बुरी आदत न पाई हो
घर की कोई जिम्मेवारी न हो
मौज  मस्ती की न मनाई हो
घर के खाने की लत न पाई हो
बच्चो को आया के पास रखने की न मनाई हो
किसी  पराई लड़की पे आंख न उठाई हो
 किट्टी पार्टी और घुमने की आज़ादी हो
जल्दी से आ जाओ कलयुग में ऐसे  लडको की ही सगाई हो

बुधवार, 13 जनवरी 2010

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
नोट -कोई फर्क नहीं पड़ता कोई बहुत  फर्क  पड़ता  पढ़िए .
यदि  मेरी बीवी बिंदी सिंदूर और करवाचौथ का व्रत  नहीं करती तू मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता .
यदि मेरी शादी अच्छे गुण वाली से लड़की हो जो खुबसूरत न भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता .
यदि मेरे पिताजी सारी जायदाद मुझे नाभि दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेर बीवी किसी आर से बात करती है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरे दोस्तों की तनख्वा मुझे जयादा है तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरा आई आई टी या आई आई ऍम में नहीं होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरा दोस्त मेरा भाई अगर यू एस  में है तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरा  घर और गाड़ी छोटी है तो कोई फर्क नहीं पड़ता

दस्तक

मेरे लव्जों को आवाज़ दो
मेरी आँखों  का नूर बनो
मेरे सपनो को आकार दो
मेरी ज़िन्दगी के पंख बनो
 कभी तो इस नादान दिल को समझो
एक दस्तक तो दो पलक बिछा के खड़े है
  दुःख तो बहुत दिया दुनिया ने
थोड़ी . दवा भी दे दो

रविवार, 10 जनवरी 2010

दुनिया के साथ

आजकल जो हो जाये कम है ....सुधा तेरी लड़की ने तेरे सारे किये धरे पर पानी फेर दिया ...
हाँ जीजी ...
क्या हाँ हु... कर रही है जोर की डांट पिला ...याद दिला वो दिन जब जब अगर तू यहं न लाये होती तो  देखती कैसे ३ बच्चे पालती और कैसे आज अच्छी नौकरी लगाती और .................
अरे जीजी ,है तो मेरी ही बेटी अगर ...
कहे की बेटी... अगर बेटी होती तो ऐसा  काम कभी न करती............उसको बोल अगर तेरी दोनों लड़की और लड़का कल उससे  बोले की जायदाद में हिस्सा दो वर्ना तुम्हारा मकान खाली नहीं करेंगे तो कैसा लगेगा उसको ?
जीजी अगर इतना बोल पाती  तो उसके रूखे व्यव्हार का जवाब न दे देती ..हमेशा में ही फ़ोन करती हु ....में या उसके बापू बीमार होते है तो देखने तक नहीं आती ....इस बीमार बहिन पर भी तरस नहीं आता ...उससे तो बस यहे दिखता है तीनो  भाई के पास बहुत पैसा है एक के पास नहीं हम उन्हें अगर दे भी दे तो क्या हुआ ?मेरे तीनो लडको ने मेरा पैसे से किया है कभी कभी ....पर मेरे बेटा जिसके पास पैसा नहीं उसने शरीर से किया .शायद  आज यहे न होत्ता तो हम इतने बड़े पोस्ट वाले लडको पर बोझ होते  उनके रुतबे के साथ अच्छे नहीं लगते ..और अब तू उसके बच्चे इतना  कमाते  है की  इनसबको देख ले और हमे तो देख ही रहे है सब के लिए इतने मेहेंगे महंगे तोहफे लेट है पर इनका लिहाज़ करते है जबकि यहे अपनी पार्टी में बुलने पर छोटा समझते है आज भी सब का काम करते है पर काम कमाता था बेटा पर पोता ने सर्री कसार पूरी कर दी मुझे और इनका सारा इलाज करता है कोई और थोड़ी पैसा देता है खेर छोड़ो चाँद दिन कट  जाये .........
हाँ सुधा सही बात है सब दुनियादारी जानती है तो  .....बोल दे न अगर दम था तो आती तेरी  बीमारी में देती उतना पैसा जितना बाकि ने दिया ..तब क्यों नहीं दिया हिस्सा महीने के खर्च का हिस्सा दे कहाँ गया .......आज उसे तीनो बच्चे कमा  रहे है लेकिन एक ने तुझे कुछ दिया क्या ?
नहीं जीजी गरीब नानी के लिए थोड़ी कुछ है ...
कहे की  गरीब मत दे एक फूटी कौड़ी उनको कुछ नहीं कर सकते तेरा और कुछ बोले तो कह देना  इतने दिने से  मेरे मकान में रह रहे हो किराया दो .........
अरे जीजी तुम भी इस दुनिया की रीत में रंग गयी हो ..मैं अपने कोख जाने के साथ ऐसा नहीं कर सकती
आरी सुधा तू कुछ नहीं कर सकती चाहेये वो तेरा गला ही क्यों न काट  दे....... तेरी बेटी की मति ही मारी  गयी है सब भुला दिया माँ का किया हुआ ........अच्छा होत्ता २० साल  पहले गाँव में ही सड़ने देती  आज कहीं की न होत्ती वहीँ ससुराल में रहती तो
..अरे जीजी ऐसा न बोलो ...आज दुनिया  के साथ चल रही है मेरी बेटी रिश्तो से ज़यादा पैसे को समझा जाता है वर्ना मेरी तरह हार जाती .... 
भगवान करे उसके बच्चे भी माँ की तरह ही सोचे  तब शायद वो मेरी बहना का दुःख समझे
छोड़ो जीजी उसकी  उसके  साथ ............मेरा तो यही फ़र्ज़  था  हमेशा खुश रह वो ............

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

लेखन का नया फैशन

आजकल लेखन में नया फैशन है अपने जीवन की कहानियों और किस्से  को संसस्मरण के बजाये नोवेल बोलना . अपने जीवन की अन्तरंग बातें और उनसे सीख को एक धागे में रोचक ,मसालेदार तरह से पेश करना . वसे में तो एक बहुत ही गुमनाम लेखिका हु ,पता नहीं अच्छी हु या बुरी ....बस आपने आस पास की गतिविधियों को शब्द दे देती हु जो कभी कुछ   पत्रिका गलती से छाप  देती है  . अब सोच रही हु क्यों न में भी अपना संसस्मरण निकाल दू . बचपन से आने वाले बुढ़ापे  तक का ........यहे अब लगा की लेखन में भी बहुत पैसा है ..थोडा सा प्रोफ़ेस्सिओनल हो जाये तो बस ......किताब ..फिर फिल्म और न जाने क्या क्या ?पर अपना दिल काम और दिमाग ज़यादा इस्तेमाल करना होगा और मार्केटिंग अच्छी करनी होगी ..पूरी  तैयारी  के साथ उतरना होगा जल्दी से जल्दी इससे पहले की ऐसे लेखको की बाढ़ आये ........

रविवार, 3 जनवरी 2010

समझोता

 रामा क्या सोच रही है ?
कुछ नहीं सुनीता ..
बताना ...कुछ दिन से परेशां दिख रही है अरविन्द  से  झगडा हुआ क्या ?
नहीं ..........
नहीं ..फिर क्या हुआ .......
कुछ नहीं समझ नहीं आता ......
क्या ..?
यही की क्या हर पति पत्नी एक दुसरे के पूरक होते है
हाँ होते है
अच्छा तू और वरुण हो ?
हाँ ..
फिर लड़ाई
वो तो सबकी होत्ती है
अच्छा ..
रामा जो पूछना चाहती है वो साफ़ साफ़ पूछ
कुछ नहीं .........
अरे .......वसे पी पत्नी का रिश्ता ही कुछ एसा होता है ..
कैसा..................?
 पल में तोष पल में माशा ...
मतलब............
मतलब यही की दोनों एक दुसरे के साथ सबसे अच्छे और सबसे बुरे होते है ...वो सिर्फ इसलिए क्योंकि २४ घंटे १२ महीन साथ रहते है दोनों एकदूसरे को इतना समझते है की यहे भी पता होता है क्या अच्छा लगता है क्या बुरा ....और जब जैसा  पल आता  है वसे हो जाते है ....
फिर लोग अलग क्यों होते है?
इसलिए ..क्योंकि बहुत बार हर रिश्ते में ऐसे मोड़ आते है जहाँ थोडा चुप रहन होता है या बात को टालना होता है नहीं तो बतंगड़  बन जाता ..........वसे भी यहे बात जगजाहिर है की  पति की इज्ज़त  आप  से और आप की पति से..अलग होने पर सिर्फ इनको फर्क पड़ता है और किसको नहीं न माँ बाप न बही बहिन अगर बच्चे छोटे है तो उन्हें पड़ता है वर्ना किसे को नहीं
सही बात है .......
क्या हाँ में हाँ मिला रही है फिलोस्पेर सी .....कोई प्रॉब्लम हो तो बोल
नहीं कुछ नहीं
वसे भी यहे रिश्ता बहुत नाजुक  होता है ....और पूर्ण तो कोई भी नहीं होता हर जाने का रहने खाने का तरीका अलग होता है ...और फिर दोनों एकदम अलग माहौल से आते है एकदूसरे को समझे में समय तो लगेगा ....
सुनी अरविन्द थोड़े अलग है ...
मतलब ..
वो हमेशा दोस्तों घरवालो इन सब के बारे में सोचते रहते है इनको तवाजो देते है ...........में जो भी बोलती हु वो सुनते ही नहीं है बल्कि उस पर मुझसे बहस करते है ........और वोही काम दूसरा जना  करे तो उसकी बड़ाई करते है ....तू जानती है मैंने शादी से पहेले कभी खाना नहीं बनाया अब मैंने सब बनाती हु और .......
अच्छा भी रामा
पता नहीं कभी तारीफ के दो बोल नहीं फूटे और सब के सामने तो कभी नहीं .........जब हम कहीं और जाते है तो इतनी तारीफ करते है चाहे  कैसा  भी खाना बना हो......जो इन्सान जो काम नहीं कर सकता वो कभी नहीं कर सकता ........पर हमेशा मेरा और मेरे घर वालो  से सम्बंधित  बात पर तो हम लड़ाई से ही  करते है
वो तो सबकी होती है..रामा
 हर बात पर ........
नहीं पर ...अगर दोनों परिवार का स्तर अलग है तो पक्का बड़ी लड़ाई होगी
हाँ सुनी यहे सही है ...
पर रामा अरविन्द बहुत अच्छे है
हाँ बहुत अच्छे है ..पर मेरे साथ उनका व्यव्हार समझ नहीं पाती
क्यों .....?
वो   कभी मुझे मदद नहीं करते जब ज़रूरत होती है ........जसे कोई आने वाल है या आ गया है तो इतना मशगुल  हो जाते है की ..............मैंने बीमार होते हुए भी सारा काम खुद किया है अरविन्द  हाथ तक नहीं लगते यहं तक की खुद खुद के बर्तन तक नहीं रखते जबकि अरविन्द के सारे दोस्त मदद करते है और दूसरो के यहं जाके मदद करवाते है ....कुछ बोलने पर बोलते है में जोरू का गुलाम  नहीं......अगर
 मेरे हाथ का बना सामान रखु तो मजाक बनाते है सब के सामने ...खुद की कोई पसंद नहीं न ही मेरा नोवेल पड़ना ,पेंटिंग करना का कुछ और पसंद है बल्कि हमेशा कमियां निकलते  है...मैंने अरव के होने पर सारा काम किया के अगले दिन से खुद किया सब को दिखने के  लिए छुटी तो  ली पर अगर पानी मांग तो आहा उह करने लगते थे    अरे .......
वोई न वसे मुझे कोई मदद नहीं चाहिए लेकिन ...जब में बीमार हु तो न खुद खाना खाते है न मुझे पूछते है .......कोई टोइलेट साफ़ नहीं कोई वचूम नहीं अपना टेबल तक साफ़ नहीं करते शवे करके इतना गन्दा करते है वाशबेसिन कितनी बार बोला पर इतने जिद है की बस .............साफ़ नहीं करके देते ......दिन भर नाक में हाथ .........छी
हर आदमी ऐसे गंदे  ही होते है
पता नहीं........
नहीं हम लू को सफाई का ज़यादा ख्याल होता है
पर सुनी में यहे नहीं बोलती की यही करो पर समय के साथ बदला ज़रूरत है आर आपके लिए ठीक है तो उसमे अहम्  दिखने की क्या ज़रूरत है .....अप्प सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहते की वो आपकी पत्नी बोल रही है तो यहे गलत है
हाँ तू ठीक  है रामा ........पर शादी एक समझोता होता है यहे माना ले ...तो तेरे लिए काफी असं हो जायेगा सब ....इसमें अगर हर बात को एहमियत देगी तो दिकात तुझे ही होगी .......आज भी हमारा समाज इतना नहीं बड़ा है की यहे सवाल जवाब सेहन कर पाए .....और सबसे बड़ी बात अल होके हम भी खश नहीं रह पते आखिर पति पत्नी का रिश्ता इतना कच्चा भी नहीं होता .....समझोता तो हम माता पिता के घर भी करते ही है .........नहीं तो हर जाना बिल गयेस का बच्चा बनाना चाहता है ........तू एक दिन भी अरविन्द के बिना नहीं रह सकती
हाँ में नहीं रह सकती क्योंकि वो बहुत अच्छा इन्सान है .........
और हो सकता है की अरविन्द को लगता हो तू उसकी आज़ादी में एक रोड़ा है
हाँ होगा ही ................पर करीने से रहने में क्या दिक्कत है क्या गलत है
सब प्यार से करवा और वक़्त के साथ सब होगा ................और अच्छा ही होता है .........वर्ना आज शादी की इतनी ज़रूरत नहीं होती वसे भी अगर आदमी में खाने पीने और आवारा गुण न हो और इस कलयुग में क्या चहिये
सही है सुनी किसी भी बात की परते खोल दो और निष्पक्ष हो जाओ तो कितनी आसान   हो जाती है वर्ना एसा लगता है कितना मुश्किल है  साथ निभाना
फिर तो कोई भी दोस्त सहेली और बहिन कोई नहीं होता सब अलग  अलग होते ...

कोई फर्क नहीं होत्ता

एक नहीं है
खाना पीना जीना एक नहीं
काया,बल  एक नहीं है
उपरवाले ने अलग  बनाया
 अधिकार की सीमा बनाये है
नहीं भेज सकते रात को  बहार
 क्यों यहे काम की दीवार बनाये
जिसे जो काम सधे वो करते जाये
जो काम मन भये  क्यों न सब वो ही अपनाये
मर्द भी शेफ कहलाते ,नारी भी कंपनी चलती
नहीं कोई सीमा है काम की
बस काम की चाहत होंनी चाहिए
सब असं हो जाता है
आलस को त्याग दो अपनी पसंद के काम पूरे दिल से करो
लड़की हो या लड़का कोई फर्क नहीं होत्ता .
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.