संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

Tanhai

 यह तन्हाई  परिभाषा बदल  जाती है है
 आज सब  कुछ है कोना तंग सा खड़ा है
 कभी बच्चे सा मचल जाता है  
कभी बड़ो सा कहीं  गुम  हो जाता है 
  बड़ी बार रोक के पुछा किसका पता पूछ रहे हो 
डरा सहम जाता है या अपनी धुन में निकल जाता है 
परछाई बन सहमा सा  रहता है 
कभी धुप  लुकाछिपी कहलाता
 कभी ओस की बून्द सा 
कभी ख़ुशी के आंसू में 
कभी दुःख की हँसी में
कभी छोटी छोटी ख़ुशी में
कभी भीड़ भाड़ में
यह बस सहम जाता है
बड़ा सोचा  तन्हाई के लिए
आज अकेले छोड़ जाता है
 साथ तोह आते नहीं
 तनहा छोड़ जाता

इस भीड़ भाड़ 

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

मैं

छिप छिप के में जीती हु
कभी घूम हो जाती हु कभी फिर जी उठती हु
कुछ बिखरे  पन्नो सी  खुद में गुम  सी
बदहवास इस हालत को समझते अपने अंश को खो कर
जीने के कोशिश में हु

अपने को भूल कर नयी खोज में
बहुत से नयी उम्मीद पर फिर जीने को हु
किस दुर्भाग्य की छाया  के तले  हु
अपने अक्ष को भूल कर
जीने की कोशिश में हु

बहुत समझया पर समझ न आया
आज फिर एक बार ऊपर वाले पर बहुत गुस्सा आया
दीवार  पे सर मर कर कुछ हुआ है कभी
हम कठपुतली थे कल आज भी
कलयुग में सब उल्टा पलट गया  उसके हाथ में डोर दे
जीने की कोशिश में लग गया

छिप छिप  कर जीना चाहती हु
कोई देख न पाए
कोई छू न पाए उस जगह जाना चाहती हु
बस बहुत हो गया
फिर से नयी जगह छिप जाना चाहती हु मैं
बड़े अरमानो से लिखे थे गीत कुछ पन्नो पर
बेहरहमी से कुचल डाला  है उनको
किसी की आस में इतनी मजबूती नहीं
फिर भी अपने अक्स को नहीं पहचान चाहती  हु मैं
कोशिश  जीने की कारण चाहती हु मैं

तोडा तो बहुत है दुनिया में
खुद को जोड़ना चाहती हु मैं
कभी मेरे लिए जो दरवाजे ढूंढ  
आज किसी का रास्ता बनाना चाहती हु मैं
जीने की कोशिश करना चाहती हु मैं
बुनने तो बहुत कुछ सपने
आज उन सपनो पर गाज बनाना चाहती हु मैं
फिर जीने की कोशिश करना चाहती हु में

हर बार उठ कर चली तो हु
आज बिखर  गयी हु मैं
छोटी सी उम्मीद से कुचल  दी गयी हु  मैं
थोड़ा थोड़ा तिनका तिनका जोड़ा था
फिर तूफान से घिर गयी हु मैं
कोशिश छोड़ कर सां गिनाने लग गयी मैं



इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.