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शनिवार, 24 सितंबर 2016

फिर में दीये की बाती बन जल कर रह जाती

औरत को मदद करने के लिए बहुत से हाथ उठते ,बहुत हाथ भी उस पर 
उठते है। पर औरत ने किस पर हाथ उठाया है? 
कौन कौन हाथ उठते है?पर हमेशा नाकामी का सेहरा औरत के 
हाथ होता है। 


फिर में  दीये की बाती बन जल कर रह जाती। 

ज़रा थोड़ा ठहर कर मेरी तरफ भी देख लिया होता 
मेरी निरिहि आँखें  एक आस से तुम्हे देख रहे थे 
दिमाग ने बार बार कहाँ नहीं होगा 
पर मजबूर दिल तुम्हारे तरफ चलता जाता। 

क्या माँगा था ?क्या  चाह  था ? 
तुम समझ नहीं पाए ?

या जानभूझ कर मुझे नज़रअंदाज़ कर गए?
कुछ है नहीं इस जीवन में 
बस उस दिन का इंतज़ार है जब में भी तुहारी इन बातों को नज़रअंदाज़ कर पाऊँगी 
नहीं ह तुम्हारा हिस्सा नहीं तुम मुझे में हो 
क्यों  बंधे है ?कैसे बंधे है? 
काश सब छोड़ के चल दू 
नहीं कर पाती। 

फिर में  दीये की बाती बन जल कर रह जाती। 

माँ से बतलाया ,उसने अपना दुखड़ा  सुना दिया 
अपनी जीवन के पलों को गिना दिया। 
सखी ,से की मन की  बात 
उसकी परतों ने मुझे हिला दिया। 

हर औरत ने यह देखा है किसी रूप में 
क्यों अपनी बेटी को कोई रोक नहीं  पाया ?
 
एक जीवन में अपना धर्म सिर्फ  औरत  ने ही किया 
बस बेटी के लिए अपना धर्म भूल गयी 
उससे अपना दुखड़े की मिस्साल सुनाइए और चुप करा दिया 
बस यही और कुछ नहीं.... 

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