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शनिवार, 4 जनवरी 2014

कुछ दर्द

जीवन हमेशा एक सा नहीं  रहता। ......उतर .  चढ़ाव आते है,जल्दी ही हमारे जीवन  का हिस्सा बन जाते है। हम अपने जीने के अंदाज़ को कब बदल लेते है पता ही नहीं चलता।एक प्रिय सहेली के मन कि पीड़ा को बीन करती यह कविता।


बहुत ही कशमश   है
मेरे इतने छोटे ख्वाब  कि बहुत बड़ी कीमत मांग ली  है!! भगवन ने
मेरे सब कर्म इतने बुरे थे
 आज मुझे मेरे साथी ने ही अपाहिज बना दिया
क्या मैंने इतनी खुशियां मांग ली?
आज मुझे मेरे अपनों से ही बहुत दूर कर दिया
न घर का छोड़ा न घाट का
तन्हाइयां में सिर्फ दो आंसू बहा लेती हु
अपनों के आडम्बर से घिर गयी हु
कभी मेरी खोखली हसी पे तरस  नहीं आता ?
आज भी अपनों के पास रहकर  भटक जाती हु
अपने कौन होते है भगवन?
बहुत ही नए अनुभव है
कभी अकेले कभी साथ चलने के
क्या कीमत होती है ख़ुशी कि ?
एक ख़ुशी के मायने कितने  होते
किस अपनेपन केलिए में
इतना कमजोर भी कोई नहीं होता पर बन जाते है
क्यों इतना मुश्किल  है छोटी खुशियों  को जीना
कितना आसान है दुसरो के समर्पण को प्र्श्न करना ?
क्यों यह बहरूपिये दुर्गा माँ के सामने जा पाते  है
क्यों सब जानके  भी एक समय आ जाते है
क्यों अपने दर को नहीं जीत पाते  है

उहुपोह  निकलना बड़ी चुनौती है
 क्या क्यों कब ?हमेशा ही सवाल है जब भी  पूछे जायेंगे
हम खुद पे ही उँगुली उठ देंगे।

नज़रअंदाज़ तो सदियों  से हुए
 जिसने  चुनौती दी  वो स्वय ही भस्म हो गया
चाहिए सीता हो या द्रौपदी।

यह न्याय अन्याय कि लड़ई नहीं ,मान  कि बात हो
नारी ही नारी कि दुश्मन है इससे नहीं इंकार है
पर पुरुषत्व कि ही चाल इसके पीछे  है।

इस सुन्दर सुशील  नारी के मन में भी झाका होता
तो नारी का कुछ और ही खांचा होता











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