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सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

यह मुखोटा अपना सा लगने लगा है

सुखियाँ की आँखों से बहते आंसू  की वजह मेरी समझ आती थी  … एक कप चाय देखे मैंने उसे बिठाया
लगता है तेरे मर्द ने तुझे मारा  है 
क्या बीवीजी रोज़ की बात है यह शरीर के घाव तो भर जाते है मन के नहीं भर पाते। … 
कितनी गहरी बात बोल दी सुखियाँ। ..  
बीवी जी मेरे बाप ने मेरा नाम सुखियाँ रखा था की में सुखी देखना चाहते थे मुझे पर देखो। …… 
 क्या रि  सुखियाँ तू भी न
 . बीवी जी आप पढ़े लिखे लोग है। .पर हम लोग में आज भी मर्द बीवी को मरने वाला उसके घर वालो को गाली देने वाला सब बुरे शौक रखने वालाही है  अगर मेरी बेटी होगी तो उसको भी यह करना होगा
और अगरबेटा हुआ तो। .?
 तो वो भी अपनी औरत को ऐसे   ही रखेगा यानि किसी और की बेटी के साथ। ……।
अगर में उससे गाली नहीं दूंगी तोवो  मुझे देगी। ……यह  तो प्रथा है न जाने कब ख़तम होगी 
बीवी जी आप सुन रही न 
हाँ। .. 
आप और साहब की तरह थोड़ी जो हर बात शांति से करते है 
यह ले रूपये रख ले दवा  करा लेना। …. 
बीवी जी आपकी कहानी आज के पपेर में आई है 
अच्छा। …।
तुझे किसने कहाँ ?
तीन नंबर  वाली शर्मा बीवी जी मुह से सुना था। ।
अच्छा !!
उन्हें साहब ने बताया है उन्हें 
अच्छा!इसलिए प्रकाश रूठ के चले गए 
तू काम कर ले फिर मुझे जाना है कुछ काम है 
अच्छा। . 
मेरा काम क्या कम है मेरा पूरे तीस साल हो गए शादी को बच्चे बड़े हो गए चलये गए पर आज तक में प्रकाश को समझ नहीं पाई मेरा क्या काम है ?
कितने अजीब दिन थे एकदम अलग म्महौल में मेरी शादी हो गयी में चली गयी रोज़ प्रकाश मुझसे यही पूछते तुम्हे काम ही क्या है।घर  में बस प्र दिन आराम
बहुत अखरती थी यह बात पहेले लगा वो मजाक कर रहे है पर हर बात में यही बोलते थे फिर मुझे चुभने लगी। ……बहुत बार समझाया एसे मत बोलिए पर वो माने ही नहीं और शयद बोलते। ….वश्बेसिन से लेकर टावेल बाथरूम सब गन्दा करके जाते पोर घर फेल के जाते बच्चो के बाद भी यही बोलते। ।न जाने क्यों जब बोलते बुरा लगता फिर वो बुरा लगाना भी बंद हो गया। …। 
सही कह रही थी सुखियाँ मन के घाव नहीं मिट पाते आज भी दोनों बच्चो के जनम पे में अकेली थी प्रकाश ने एक पानी  का गिलास तक नहीं दिया अजीब सी दुरी बनती जा रही थी में कतराती  रही थी प्रकाश से आज भी बहस नहीं करती। …मेइन जो भी करू मुझे बुरा ही समझत थे 
एस क्यों में आक तक समझ नहीं पाई 
शायद उनके ज़ेहन में यह बात थी की कोई पत्नी अच्छी नहीं होती ? पता नहीं आज तक इसका जवाब नहीं ढूंढ़  पाई सिर्फ रोज़ बहस करना रोज़ लड़ना रोज़ मुझमें कमी निकलना कहीं घूमना हो तो बहन करके लड़ाई करना ताखी में बोल न सकू कितनी बचकानी सोच थी 
दुनिया को लगता कितनी समझबूझ वाल जोड़ा है पर हम जोड़ तो थे ही नहीं यदि मैंने बोल या अपनी मर्ज़ी बताई तो युद्ध इनके कहने में गयी तो सब ठीक 
मैं प्रकाश से बहुत दूर हो चुकी  थी न उसके प्यार का असर था न मर न न शब्द के वार  का आदमी बहुत अजीब होता है बीवी के लिए। ……
मुझे हर वो लव्ज़ सुनना पड़ा जो सुखियाँ ने सुना जानवर ,दिशाहीन,कुरूप ,बेहया  मेरे मत पिता को भी हर मुझे जुड़े इन्सान को में तब से चुप हु आज तक और अब मर जाउंगी एक दिन यह सब अपने साइन में लेके 
किससे कहती घर की बात माँ तक भी नहीं जानी  चाहिए  
आज सुखियाँ मुझसे जयादा सुखी थी वो अपना दर्द बाँट सख्ती है मैंने तो अपने दर्द का मुखोटा  हस्सी वाला बना दिया अगर किसमत में यही था कोई भी होता प्रकाश या अंधकार यही होता 
मेरे प्यार को धू धू  करके जलता देख  मेरी आत्मा को जल दिया मैंने पाया तो बहुत कुछ बदले में बच्ची के लिए दुनिया के लिए माता पिता के लिए सबसे अच्छी बच्ची हु में 
जितनी भी मेरी सखी थी सब को कोई न कोई दुःख था मेरी किस्मत में यह था। … 
पचीस साल से ज़यादा  हो गए मैंने अपने मन की बात नहीं बोली प्रकाश से 
हम कहीं दस दिन की छुट्टियों  के लिए भी नहीं गए 
इतना मुश्किल था यह सब शायद बिलकुल नहीं क्योंकि अब यह मुखोटा अपना सा  लगने लगा है 
पचीस साल हो गए मैंने बहस नहीं की बात नहीं की और अब जरुरत भी नहीं 
सुखियाँ ने हमे बात करते देखा था ? शयद कोई एक बोलता था। 







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