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बुधवार, 24 जुलाई 2013

तेरे दर


एक लड़की औरत बनके अपने गहर को सजाती है सवरती है बदले में थोडा सा प्यार चाहती है खुश रहना और रखना चाहती है सम्मान चाहती है ।अपना अस्तित्व छोड़ के नए माहोल में ढलती है ……। लेकिन कभी कभी सब होते हुए भी उसके अस्तित्व को पीछे छोड़ दिया जाता है उसके बलिदान को उसका फ़र्ज़ बना कर शोषण होता है । यहे लड़ाई  औरत मर्द की नहीं सोच की सोच से है । बहुत सी बातें नज़रंदाज़ भी कर दी जाये लेकिन एक दर से दुसरे दर का फासला नापन इतना असं नहीं होता कभी ज़मी अपनी नहीं कभी असम पराया लगता है 

कुछ बहुत से अरमान लेकर आये थे तेरे दर पे आये थे
कहीं नहीं तुम को छु पाए
कुछ इलज़ाम लिए आज चले जा रहे है
एक और औरत की कहानी जोड़ कर
उन आसू का सेलाब लेकर
जिनका हिसाब कभी तुम से नहीं माँगा
पर तुमने हर उस लम्हा का हिसाब खुद ही लगा  लिया 
इतने कठोर ह्रदय के द्वार  नहीं खुल पाएंगे कभी
एक कदम तुम भी न भी बढ़ाते तो क्या
मेरे कदम तो न खिचे होते
आज खुद को एक  रास्ते पे अकेले महसूस कर रही हु
जह पलट के भी न देख पा रहे हो 
इतने कठोर हो तुम आये न होते तो भी ठीक है 
पर अपने से अलग तो न किया होता 
उन लम्हों को भूलना असं है तुम्हारे लिया 
क्या कभी एक लम्हा न याद आया मेरे साथ का 
इतने कठोर  बन गए कभी कबर भी नहीं ली 
वसे मन मुटाव के बाद रिश्तो में गर्माहट कहीं खो गयी  थी
डोली तो उठी पर अर्थी नहीं 
न यह दर में है न वो अब तो दर दर की ठोकर है 
मोहताज तो नहीं हुए लेकिन प्यार से विश्वास उठ गया 
थोड़ी सी इज्ज़त के लिए पूरी इज्ज़त नहीं गवाने की चाहत रह गयी 
दर दर पे जी ही लेंगे हम एक और

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