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मंगलवार, 30 नवंबर 2010

बहु










बहु को कोई कभी  अपना न पाया
जो बात करे वो किसको न भयी (पसंद आये )
अजब रीत है हर सास बहु होती फिर भी अपना वक्त भूल जाती
घाट घाट का पानी पे कर भी वही पस्त हो जाती है
बहु का कोई सुख नहीं अच्छा लगता
इतनी उम्मीद करते है पर उसकी इच्छा का कोई मान नहीं
बहु को कभी बेटी न बना पाते
अपने अस्तित्त्व को घुलता देख पिगलती बहु एक दिन फिर सास रूप में आ जाती है
कल में भी वही  सास होंगी ...................
बहु बेटे का खर्चा करती पर बचत की भागीदार भी तो होती
यही कम खर्चा  करना होत्ता क्यों बेटे को घोड़ी चदते?
बहु घर के सब का करे ,सब का सम्मान करे
हर सदस्य के फर्मयिएश पूरी करे
पर उसकी छोटी सी चाहत नहीं पूरी  कर पाते
न बुरी नज़र डालो उसके गहने पर कपडे पर
उसके माता पिता का आशीर्वाद है उसमे
नया घर नया रूप है नारी उसका सम्मान करे
अपेक्षा इतनी न हो की उसका दम घुट   जाये
न इतना भेद भाव की दिल को चुभ  जाये
इतना असं नहीं पर इतना मुश्किल भी नहीं
वो भी सास होगी...... इसका एहसास  है उसे भी
 बेटा नहीं बदलती घर को संभालती है
अपने पंख को समाज के बंधन के कारन  नहीं खोल  पाई थी वो खोलना चाहती है
ज़रा प्यार और सम्मान देके देखो
अपेक्षा  के स्तर को कम करके देखो
परिवार का अंग बनके देखो
खुद  बा खुद परिवार में घुल जायगी ...

शनिवार, 20 नवंबर 2010

तुम्हारा साथ खलने लगता है

आज पैसा ,कल का आराम
कितना  पैसा , कैसा  आराम
हर एक मुकाम के बाद सब कम पड़ जाता है
छोटी छोटी खुश्यिओं पे रोक लगाके बड़े आराम की चीज़ तो आ जाती है
पर वो आराम का मुकाम निकल जाता जाता है
बच्चो के साथ बिताये वो पल जो उनके ज़ेहन में सदियों तक रहते है
वो खोके  चंद  पैसे भी किस काम के
अपने जीवन में  बच्चे  को जायदाद न दे कर अपना समय दे दो
बार बार भीख  मांग रही हु  साथ घुमने और थोड़ी से बात करने का समय दे दो
बुदापे तो ओल्ड age होम में भी निकल  जाता है
क्या पाता कितना वक्त हो उस पड़ाव पर इतने बड़े महलो में एक दीपक भी नहीं जल पाता है
बचत अपनी जगह है और पैसे का जूनून अलग है
कितने ही तनहा लोगो का जीवन चार कंधे के लिए  तरस  जाता है
 जवानी में अपने शौक दबा कर बुदापे में समय का इंतज़ार करते है
जब अकेले रहने की आदत हो जाती है फिर एक साथ मिलता है
तब तक तन्हायी बहुत अपनी  सी लागती है
अलग शौक पल जाते है उस  समय के तुम्हारा साथ खलने  लगता है

बुधवार, 17 नवंबर 2010

सिर्फ

गुप चुप निकलते हुए कई  बार बहुत कुछ देखा  है
अपने खयालो  को बादलो में घुलते  देखा है
पानी  में अक्स को डुबाया है
हसरतो  को असमा में उड़ाया है
जीवन  को नयी दिशा देने का एक प्रयास किया है
फिर एक बदली आती है मन को भिगो  के
अरमानो के पंख लगा कभी इन्द्रधनुष  तो कभी
आंसू की झड़ी दे जाती है
एक पल में अपना बनाके छोड़ जाती है
इन्द्रधनुष तो भूल जाती हु सिर्फ झड़ी रह जाती है

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010









 


दिवाली के इस अवसर पर
हार्दिक शुभकामनाये
 दिवाली मंगलमय हो !!

कुछ चिराग यु जले की धुआ भी न हुआ
आज कुछ घर ऐसे भी रोशन हुए की चाँद फीका पड़ गया
कही पैसा कही प्यार की अलग है यह ख़ुशी
अपने अपने मायने और दायरे है
ज़रा पंख  पसरो और दुनिया देख लो
दुनिया के मायने खुद ही बना लो
एक मुठी भी है और पूरा आकाश भी
हमेशा जहाँ का पूरा साथ बना रहे

थोड़ी जगह हमे भी दे दो
दिवाली के इस अवसर पर
हार्दिक शुभकामनाये

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

असफलता का एहसास क्या होता है  मुझसे पूछो
जब हमेशा न सुनना होता है
जब हमेशा रुसवायी होती है
हमेशा कोई रूठा रहता है
आंसू आना चाहते है  पर हँसी आती  है अपनी किस्मत पर
जब एक कन्धा चाहिए होता है रोने के लिए पर लोग  चार लाना चाहते है
आप अपना दर्द बया करते है लोग पागलपन समझ बैठते  है 
हमारे प्यार का अपमान  कर अपने दायरे बना लेते है
झुक तो बहुत गए है पर प्यार  न मिल सका
एक इज्ज़त थी वो भी दाव पर लगी है
एक घरोंदा  का सपना था आज वो भी जाता दीखता है
चंद लोगो को अपना मान बेठे थे, आज  अपने भी गवा बेठे \\
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