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सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

लुका छिपी विचारो की

बिखरे हुए विचारो  के उमड़ते घुमड़ते सागर में बहुत कु
कभी कुछ लड़ी याद आती है पर वो बात  नहीं बन पाती
कभी बिस्तर पर पड़े कभी गाड़ी को चलते हुए
कभी  खुले आसमा  के तले, कभी करची के परे
कहाँ कहाँ  कागज़ पेन चिपकाऊ पर..? इन विचारो को न पकड़ पाऊ
यह  लुका छिपी आज की नहीं बरसो की है
कभी बच्चो  की मासूमियत कभी बड़ो का प्यार
कभी सैया के तकरार कभी ढेर  सा प्यार
त्योहार का खुमार या हार की याद
दिमाग की तह से निकलते धुध  में खो जाते
जल्द  अक्स न तो अपनी अपना साया भी न छोड़ आते
बड़े  अपने से लगते है यह विचार
एक सार निकलते जाते है अपनी जगह बनाने को
विचारो का भी अस्तित्व है कितनी अद्भुत एहसास है
बड़ा आनंद आता है इनको सजाने  के बाद
अपने  अक्स की झलक तो दिख ही जाती है
 हर विचार के साथ एक बार मेरी भी शुद्धि हो जाती है
अपने को जानने के लिए बहुत है चंद अल्फाज़
उनके गहरे होने के मायने है लम्बाई के नहीं
उच्च विचार या तुछ विचार नहीं
विचार के विकार है मन का अविष्कार है
एक बार स्वछंद कर को विचरो को
कभी कलम से कभी अल्फाज़ से
जीवन को नया मोड़ मिल जायेगा बहुत से जवाब दुंद लाओगे
कहने को जीवन असं हो जायेगा
बड़े मस्त मस्त है उड़ते रखते चलते फिरते यह विचार  
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