संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

I cook with love that give i a taste
I clean to give a good atmosphere
I bond each member by communicating
I am piller and balance the home
I dominate to keep all in place
I listen to make them smile
I spread love to get some
I shout to maintain discipline
 I am doing it because I love to do it
I forget my career, I left my independence
I leave my sleep .I give break
I did it as I am mother
But I get most the most importnt ting
I am satisfied
The life I gave to my child
I support I gave my patner 
The way I handle my family
The way I balance my life
I thank God fo the life he has given to me

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

प्यार की परिभाषा

१४ फरवरी के लिए

प्रेम के रस में डूबा यह संसार है
सिर्फ नज़र चार नहीं
दिल का रास्ता भी साफ़ हो तभी इकरार है /

सिर्फ हमेशा तोहफे देना या लेना ही नहीं
कभी एक प्यार का हाथ
कुछ बातें सुनते हुए कान भी चाहिए /

भरोसा और हर बुराई अच्छाई अपनाई  जाती है
एक दिन का रिश्ता नहीं जनम का होता है
आज तुम कल की और का फंडा नहीं होता /

काम,बच्चो और परिवार पे भी अधिकार होता है
 कभी वक़्त नहीं दे पाते /

ताजमहल नहीं एक शांति और सुकून की जगह 
 दोनों  को समझने की चाह कुछ दिल से करने का जज्बा
कहने से पहले  समझ जाना /

हमेशा सोना चाँदी, हीरा नहीं
साथ में खाना ,घूमना ,खुश  रहना
एक दुसरे के लिए सम्मान
कुछ एसा करने की चाहत /

 जो कभी न किया
हर घटिया से लेकर  बढ़िया चीज़ के मज़े
एक दुसरे से लड़ने नोक झोक से प्यार तक के मज़े /

प्यार एक दिन का नहीं हर दिन का होता है
अगर उस  दिन इज़हार हो जाये तो
दिल बाग बाग हो उठता है /

बंधन और आज़ादी का एक समावेश होता है
घुटन और आवेश का समंदर नहीं  /

माना प्यार की कोई भाषा नहीं होती
एक दुसरे से उम्मीद होती है
कुछ काम कर देना  से प्यार काम नहीं होता
प्यार, प्यार नहीं कर्म होता है /

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

भक्ति में शक्ति

श्रद्धा और आस्था  का साथ 
शांति से किया हुआ पाठ
बिना राग द्वेष के उपवास
आस्था के साथ
पुजन की राह पर
पूजनीय भगवान कभी नहीं निराश करंगे
हर चहा पूरी होगी ,अगर भक्ति में शक्ति होगी
नहीं चाह है भगवान को  चढावा  की, नहीं चहा  फूल की
मंदिर के आंगन में बिखरे फूल की
किसी का चढ़ावा किसी के पाव के धूल
यह है भगवान के मन में शूल
हर चीज़ उसकी बनाई हुई  है
हर कण कण में है व्याप्त है
क्यों किसी ढोंग  या पैसे से टोला  जाता है
जबकि इस जीवन क ढंग से जी लो
ईमानदारी से रिश्ते और जीवन निभालो
बिना लालच और बुराई ,न गरीब न आमिर के
 सिर्फ एक दिन सोच के दिखा दो 
कौन कहता है दुआ ,प्रार्थना काबुल नहीं होती
सच्चे मन से भक्ति की शक्ति तो निभा के देखो /

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

आत्मग्लानी

आज पिताजी की हालत देख कर मेरा मन रो राह है .......कभी  पापा को इतना रोते हुए नहीं देखा .आज इस पड़ाव पर वो अपने आप को रोक नहीं पा रहे है  ..वो अपने आप से लड़ रहे थे किसी बात को मुझे बताना चाहते है ..हालाँकि में उनकी बहुत प्यारी बेटी नहीं हु...... न  ही  उनके बहुत करीब रही पर ......वो मुझ पर बहुत  भरोसा  करते है ..मेरे प्यार को उनके लिए समझने के लिए शब्द की ज़रूरत नहीं है . आज पूरा दिन इंतज़ार कर रही थी....... शायद मुझे बुलाएँगे . और रात को मेरा इतंजार ख़तम हुआ  ...मुझे अपने कमरे में बुलाया और थोड़ी देर अपने आप से अपने विचारो से  लड़ते रहे.. मैंने पिताजी के कंधे पर हाथ रखा और वो एक छोटे बच्चे की तरह बिलख  पड़े ......मैंने  पापा को हमेशा एक बहुत ही मजबूत थोडा गुस्सेल और अपने मन की करने वाले इन्सान की तरह देखा है ..वो कभी अपने आप को कमज़ोर और साधारण नहीं  दिखा पाते थे .......उनके रहने का अंदाज़ किसी महाराजा  की तरह था .पर उनका चिलना और बिना बात के माँ पर हमेशा गुस्सा करना ........मुझे समझ नहीं आता  था..शायद माँ उनको समझ नहीं पाए या वो माँ को या दादा दादी उनके रिश्ते की कड़ी थे या रुकावट यह  में कभी नहीं समझ पाई  ...पिताजी की नौकरी न करने की जिद और हम भाई बहनों का लगातार बढना ....दादाजी की ज़िम्मेदारी बढा राह था पिताजी ने आज तक कभी हम भाई बहनों के सर पे हाथ नहीं रखा न कभी प्यार से देखा हम उनके लिए कुछ नहीं थे / पिताजी  की इतनी दहशत  थी की उनका कोई सामान नहीं छूता  था........ अगर छू दे उनके गुस्से का शिकार होता था ...उनको हमारी पढाई  की कोई चिंता नहीं थी.......... सिर्फ दादाजी के कारण हम लोग पढ़ा  पाए वर्ना आज कहीं गली में घूम रहे होते पर पिताजी बहुत किस्मत वाले थे /उनके पिताजी ने उनकी उनके बच्चे यानि हम लोगो की पूरी जिम्मेदारी  उठा रखी थी / दादाजी के बाद बड़े  भाई  ने बहुत जिमेदारी से सारे  काम किये पिताजी बस अपने  नए  बिसनेस के साथ एक लोन
का बोझ बन गए थे / किसी  बहिन की शादी की चिंता नहीं थी ..पर हम सब बहने सुन्दर थी और पढ़ी  लिखी थी इसलिए हमारी शादी में कोई दिकत नहीं आये ..बस  बड़ी दीदी की देर से हुए बाकि सब की जल्दी जल्दी करवा दी दीदी और भैया ने सब संभल लिया/ पिताजी ने न तो जिम्मेदारी समझी न कुछ  किया बस भरी  महफ़िल में माँ पर चिल्ला  दिए  और हमारे घर को एक बार फिर नीचा दिखना पड़ा ...... वसे हम सब भैये बहनों की नौकरी लगने के बाद .......लोग हमे कुछ पूछते थे वर्ना  कुछ नहीं समझते थे सब डरते  थे.. हम गए तो  उनका कुछ ले न ले .......पर गरीबी के साथ हम सब को बहुत सम्मान दिया था..... भगवान ने कभी किसी की चीज़ पर बुरी नज़र नहीं डाली न ही चाहत तो होती थी/ की पहला चीज़ हमारे पास हो पर कभी उसकी तरफ चुराने  या मागने के बात दिमाग में नहीं आई.......पर एक अजीब से नज़र का सामना करता पड़ता था हमे और यह गलत नहीं पिताजी की वजह से ...पिताजी के करना जो था वो माँ को भी झेलना  पड़ता था वो हमेशा  माँ पर गुस्सा करते रहते थे अगर वो दादी के संरक्षण में नहीं होती तो शायद ...पर माँ इतनी मजबूत नहीं थी उन्होंने  भी उतना प्यार नहीं दिया  बस दादी के प्यार से हम आगे बढे.......... हमेशा कोई न कोई किसे के लिए होता है यह सच है /
शायद इन्सान जाते समय अपने आप अपना लेखा जोखा का हिसाब लगता है आज पिताजी भी लगते है
पिछले १० साल में पिताजी में बहुत बदलाव  आया है  भाभी का आना और खुद किसी के लिए कुछ न कर पाना ..हालाँकि मुझे ऐसा नहीं  लगता की पापा को इस बात का कोई दुःख हो पर अब लग राह है ..वो अपने बच्चो को प्यार करते थे उनको पैदा करके छोड़ दिया ऐसा नहीं था /
मेरे हाथ पकड़ कर बोले "बेटा मैंने कभी किसी  के लिए  कुछ नहीं किया बस अपने लिए जिया और अब मर जाऊंगा........... बिना किसी का भला किये कभी तुम लोगो के  सर पे हाथ नहीं रख...... कभी तुम्हारी पीठ नहीं थप थापयिए ...बाउजी और तुम सब को बहुत दुःख दिया /तुमने मुझे फिर भी एक पिता का दर्ज दिया इसकेलिए मैंने ज़िन्दगी भर तुम्हारा आभार मानुगा हो सके तो मुझे माफ़ करना/ मैंने बहुत खुश किस्मत हु की मुझे तुम्हारे जसे बच्चे मिले और पिता मिले   " मैंने जितना उन्हें शांत करने की कोशिश करी उतने ही बैचेन हो जाते
पर आज उनकी आत्मग्लानी की मायने कुछ नहीं थे... वो अपना दर्द न ले जाये यहे उनके लिए ठीक है ......इसलिए  आज में प्रार्थना  कर रही थी उनका दर्द आंसू और शब्द  में बह जाये और आत्मग्लानी से मुक्त हो /

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

प्यार आता है .

आसान  नहीं है तुमसे दूर रहना
कहीं यह मन लग नहीं पाता
कोई लुभा नहीं पाता
एक लम्हा  सदी  सा  लगता है
 हर जगह तुम्हारी  महक है
हर काम तुम्हारी पसंद का होता है
तुम पर  गर्व होता है
अपनी पसंद पर रोब आता है
बिजली सी सिरहन दोड़ जाती है
एक अनोखा एहसास होता है
तुम पर बहुत प्यार आता है .
जालिम नौकरी ने दूर कर दिया
तुम्हारी   बाहों   में छिपने  को जी चाहता है /

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

मन के दंश

थक गयी हु अपनी तन्हायी से,उब गयी हु अपनी परछायी  से
कभी किसी से शिकवा न किया,आज  उसका खामियाजा मिला
कोई  नहीं है कहने को मेरा
मेरी ख़ामोशी, सब को खुश रखने की कोशिश
पे सवाल उठ खड़ा हुआ
खो गयी हु भीड़ में ज़िन्दगी की आपा  धापी में
अपने निशान छोड़ने की सोच था खुद ही मिट गयी हु
अपने अस्तित्व की तलाश में राह भटक गयी
सब को खुश करने में अपनी साख मिट गयी
आज कुछ हाथ नहीं बस एक बोल सुनाने को मिलता है
तू नहीं तो कोई और होता जो किया सब करते है
सिर्फ मन मसोस कर रह जाती हु
कभी नहीं किया जो चाह था
माँ बाप की  शादी तक की पाबन्दी ,
पति का काबिलियत पे सवाल
मेरी दिल की गहरायी तक हिल गयी इन सब  से
अकेले में सिर्फ आंसू बहा सकती हु किसी को मन के दंश के बारे  में नहीं बता सकती हु
कितनी तनहा हु इस जीवन में
अब सोचती हु बेटा क्या बोलेगा आगे चल कर
एक औरत के भाग्य और विधाता के न्याय के बीच में  हु
कभी अपनी परीक्षा तो कभी अपनी काबिलियत की परीक्षा दे रही हु
सोचती हु जो काबिलियत  की परीक्षा अच्छी होती है वो कौन से दंभ से आगे चलती है
कभी आसमा को चुने का जस्बा रखने वाली में आज ज़मी की सच्ची से दूर भागना चाहती हु
अपनी परछायी को पति  के अक्स में देखने की चाहत अधूरी लिया चली जाना ही होगा .
कुछ कर्त्तव्य के लिए खुद को मिटना ही होगा
सब  और अधुरा है इस दुनिया में अब मेरे लिए बहुत नहीं है यहे गुलिस्ता
शायद मुझे ही अपना पक्ष रखना न आया
इसलिए इस जहन  ने ठुकराया
लड़ा रही हु तन्हायी से एक साथ के लिया
आज उस साथ के बाद भी तनहा हु
कुछ बहुत नहीं माँगा था बस मेरे लिए वक़्त और  थोडा सा प्यार माँगा था
मेरी तमन्ना का सहारा   माँगा था आज मजबूर लाचार की  कतार में खड़ी हु .

हुकूमत

एक जानवर ने भी पलट के देखा , एहसास करा दिया की में खास हु
आज हम सफ़र ने यु  रुसवा किया की जार जार हो गए
महफ़िल की शान से तन्हायी की खान तक का सफ़र बन गए
हर बात को प्यार समझ के निभाते रहे
आज इल्म हुआ यह तो हुकूमत थी
एक चाह रख दी और फरमान जारी हो गया
बिन गुस्ताखी  के गुनहगार हो गए
ता उम्र सजायाफ्ता हो गए
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.