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गुरुवार, 24 अगस्त 2017

जैसी भी है मेरी है। ..

बरसो बाद कलम ने चलने की ख्वाइश जतायी 
धुंध  खयाल उमड़े रहे थे 
पर सोच से पहले ग़ुम  हो गए 
आज तो खुद ही हाथों में आ गयी 
लय   तान का मंच नहीं 
बस कुछ खलबली हुई लिखने के लिए 
एक बार जब शरू होत्ती तो दो चार खिंच जाते 
चाय की चुस्कियों के बीच न जाने कितने किस्से लिखे जाते 
आज हो या कल,कंप्यूटर हो कलम 
सोच और जोश वही उभर आता है 
बस एक ख्याल का तहलका है 
सोच तो कला है ,ढूंढो तो बाला है 
लिखो तो तनहा है,पढ़ो  तो चाह है 
एक ख्याल के बीच में उलझा हुआ जाल है 
कभी तो इससे माल है कभी यही बेताल 
रस  से भरी , कभी गम से तर 
 अपने, अपनों के ख्याल गुनगुनाती 
मन की चाह की गुथमगुथि में गुथी 
कभी कसमसाती कविता कभी कहानी  बन उतर जाती 
यह भी एक नेमत है कभी मिल जाती है 
कभी रूत कर बेचैन कर देती 
ऐसे ही यही भी पर जैसी भी है मेरी है। .. 
 



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