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बुधवार, 30 नवंबर 2016

प्रश्नचिह्न

कुछ याद  से में  जुदा होती नहीं
इस तरह मुह मोड़ के चले जाओगे कभी सोच न था
हमारी  दिवार  थे हर लम्हा बहुत याद आता है
हर मुश्किल हर  आपको  साथ पाया है
हमारी बहुत सी तकलीफ में  आपको पास पाया
बड़ा  सदमा है आपके  होने का
कभी सोचा न था
इतना सा  साथ होगा
बस यह सोचा न  था

अर में फिर

थोड़ा थोड़ा छोटा छोटा मेरा सपना था
आज बिक्र हुआ एक  पन्ना है
बड़ी उम्मीद से घर में आये थे
आज तिनका तिनका बिखरा है
थोड़ा थोड़ा गम तो बदरदस्त भी था पर यह गम तो
न पी सकते है जी सकते है
ज़रा सोचा होता मेरे बारे में
क्यों इतना बेकार बना दिया

जीवन का कोई मतलब होता तो अच्छा होता
आज हर मोड़ पर पलटवार कर देते हो
क्या कर क्या सोचु क्या बनु
शायद एक प्रश्न चिन्ह है मेरा जीवन
जिसमे जब मोड़ पर रुकने लगती हु
 आगे खाई आ जाती है
 में फिर धकेल दी जाती हु
इतनी कठिन डगर  होगी सोचा था
 जीवन प्रश्नचिह्न  माँगा न था

मेरे हर निर्णय पर कभी में  प्रश्नचिह्न बन गयी
जब जवाब माँगा  तो  उत्तर में  प्रश्नचिह्न बना दी गयी
न्याय है या अन्याय ऊपर वाले से पूछो
में तो एक निर्णय हु जो  प्रश्नचिह्न की तरह घूमता है





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