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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

Tanhai

 यह तन्हाई  परिभाषा बदल  जाती है है
 आज सब  कुछ है कोना तंग सा खड़ा है
 कभी बच्चे सा मचल जाता है  
कभी बड़ो सा कहीं  गुम  हो जाता है 
  बड़ी बार रोक के पुछा किसका पता पूछ रहे हो 
डरा सहम जाता है या अपनी धुन में निकल जाता है 
परछाई बन सहमा सा  रहता है 
कभी धुप  लुकाछिपी कहलाता
 कभी ओस की बून्द सा 
कभी ख़ुशी के आंसू में 
कभी दुःख की हँसी में
कभी छोटी छोटी ख़ुशी में
कभी भीड़ भाड़ में
यह बस सहम जाता है
बड़ा सोचा  तन्हाई के लिए
आज अकेले छोड़ जाता है
 साथ तोह आते नहीं
 तनहा छोड़ जाता

इस भीड़ भाड़ 
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