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मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

थोड़ा बद तो है मेरा नसीब

बहुत बार दुःख और सुख से चक्र में लोग टकरा जाते है कुछ लोगो के विचार दुःख के समय में दिल को चु जाते है उनकी मनोदशा को समझना आसान नहीं होता। न वो दया चाहते है न दवा न नफरत न पैरा न बोल न चल बस एक प्यार  की थपकी। . 

थोड़ा बद तो है मेरा नसीब 
जिस चीज़ पे हाथ रखो दूर हो जाती है 
बड़ी हो दुश्मनी है उस भगवन को मुझे 
बड़ी ही बुरी संतान हु में उसकी 
न मेरी ख़ुशी में न मेरे गम कोई था मेरे पास 
जो पास हथे उन्हें भी शिकायत थी की में दूर हु 
कौन कहता आप  जी नहीं सकते 
मन को बहलाने के हज़ार कारण 
बस वही दुसरो की नाकामी का कारण बन जाती में 
चलो इसी बहने काम तो आ जाती 
उस सुखी डाल पे भी लोग बैठ जाते 
यह तोह अपने ही मुह मोड़ के खड़े हो जाते है 
कितनी नफरत होगी  उस  मुझसे 
न जाने क्यों मुझे जीने के लिए छोड़ दिया  है 

पलट कर लोग बहुत आते है हिम्मत कभी ले जाते है 
जाने क्यों इतनी बेरुखी है 
चार दिन हंस लेती हु तो चार सौ दिन रुला देता है 
कभी सोचती थी क्या इतनी बुरी थी में 
न जाने कौन से कर्मा थे मेरे 
शायद लोगो को सरे आम मर होगा 
इतना मुश्किल जीना होगा 
उससे भी मुश्किल मेरा हसना होगा 
इतना हिंम्मत से रहना इतनी कर्म से रहना 
आज मुझे  खोखला कर दिया 
लोग कहते है नज़र लग गयी पर मेरी आँखों पे चश्मा है 
बड़ी बेदर्दी से तूने भगवन मेरे विश्वास को हिला दिया है 
जब अकेला ही भेजना था तो क्यों इतने लोगो को  जोड़ दिया 
इस तीस के अंदरन दर्द है कभी तोह किसने जाना होता 
पत्थर मर कर निकल जाते है 
कहते है इतनी हिम्मत कहाँ से आती है 
इन पत्थरों  से सर मरते मरते आ गयी 
बस अब तो जान जाने का इंतज़ार है 

 

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