संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

शनिवार, 2 अगस्त 2014

ईमारत

जब मैंने देखा एक मंज़र -- वो आँख और वो  अनकही बातें एक सी होती है।   


कभी हसरत जागती है उन आँखों में अपना भी घर का सपना होता है 
अपनी भी छत हो अपने भी लोग हो 
जिन हाथों से घर बनाते है वो बेघर रह जाते है 
उनकी आँखों में बस्ती है चिंगारियां 
जब पहली ईंट हाथ से उठती है तो परायेपन का एहसास  हो जाता है 
 मन के कोने में  उनस 
श्याद तुम मेरे हो पर कहीं से आती पुकार असलियत के धरातल पर डाल  देती है मन के गर्त में छिपा कर 
माँ बाप के लाचार आँखों को अनदेखा कर काम शरू कर देता है 
सब ऊँची ईमारत के नीव तुमने राखी 
है यह सिर्फ ईंट नहीं, वो सिर्फ दिवार नहीं 
इन ईंट में दिल बसता है यह दिवार भी कहानियां कहती है 
बस ज़रा लगा   कान  लगाके  सुनाने के देर है 
कभी आंसू कभी कभी ख़ुशी