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सोमवार, 31 मार्च 2014

प्रश्न

शुभ नवरात्र !! नारी कि आज उपसना होगी पर जो जीवित  साक्षात् नारी ही उसके संभल का उत्तराधिकारी कौन होगा? पिता ,पति या बच्चे।  इस सवाल ने मेरे जीवन मे हल हमेश माँगा है। आज भी यह मर्द निरुत्तर है। …………………। उन नारियों कि लिए जिन्होंने जीवन कि कठिन परिस्थिति  के बवाजूद अपना मुकाम हासिल किया। … नारी का देवी स्वरुप कैसे कोई स्वीकारेगा जब उसके सतीत्व का मान नहीं  है।

नारी कि साख सुधर जयेगी
नारी कि राख संभल जायेगी
शयद नारी का अस्तित्व
एक कविता कि पंक्ति बन कि रह  जायेगी
क्यों यह शोषण क्यों यह पीढ़ा भाग है नारी के लिखी ?

किस्से कहानी बहुत है जो सुना दिए जाते नारी के नाम पर
क्या कोई मर्द अपनी नारी कि पीढ़ा कभी पूछत  है करीब आ कर ?
उसकी हर पीढ़ क सबब  बन जाता है इठलात है

विरली नारी वही हुई जिसने मर्द कि बहुत मार  या प्यार सहा है
बाकी तो बस उनकी कहानी में अपना अक्स ढूंढती रहती है
कभी आँखों क नाम कोने में झांके दीवार  को आईना समझ लेती है
कभी इतना लीप -पूत  जाती ही कि आईना में अपना अस्तित्व खो देती है
कभी यह सीख खुद ले लेती है कभी  ज़माना सीखा ही देता है


शिकव का तो काम नहीं
अपनी चाहत कि पोटली
 कभी खुलती नहीं कभी खोली नहीं जाती
अनजान पतंग सी उड़ती फिरती
जिसकी हाथ आती अपनी समझ ली जाती


पता नहीं शांति का लेकिन
इस शांति कि कयास में चुप रह जाती
कभी चुप कर  दी जाती
पर उसके अलावा शन्ति सब को मिल जाती

नारी कि सब रूप को ताने  देते \
क्या कभी उसके मन को कोई पढ़ पाता
तर्क़ कुतर्क़ छननी करदेते
नोचने कि आदत में नहीं ही कोई पीछे

आज सब करेंगे हवन
नये बीज बोएंगे
बच्ची के पैर धो कर कल उससे अपाहिज कर देंगे
क्या सच में यह माँ कि सच्ची भक्ति है ?
की सच में आप यह स्वीकारेंगी ?

मेरे नहीं यह सबके प्रश्न है। …
जवाब कि तलाश में भटक रहे है
इस कवयत्री से उसकी तक
बस अंकित होते  ही मन पर लगते है। ................







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