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रविवार, 17 नवंबर 2013

वो सर्दियाँ

कलम खुद ब खुद  चल पड़ी उस समय को याद करके जब भी यह सर्दी आती है मेरा मन खुद बा खुद उन यादों के झरोके में जा सब  यादों  एक रील कि तरह मेरे सामने ला खड़ा करता है  --- मुझे मुझ से एक बार फिर मिलवाती यह यादें।




यह गुलाबी फिजा में मेरी मदमस्त सी चाल का कोई नहीं है संभल
गुलाबी ठण्ड और बचपन की याद

चाय की प्याली और गुनगुनी धुप में फुरसत के पल का इंतज़ार
घर में गप्पे के ठहाके खिलखिलाते से चहरे
तिल कि महक  और गज़क का स्वाद
पिन्नियां(अट्टे  के मेवा वाले  लाडू ) का बड़े डब्बे  में बांध जाना
गाजर के हलवे के खुशबु में डूब मन
गरम चाय के कई दौर होना
कभी मटर के कभी मूगफली  के साथ  छिलको का साथ


बाबा कि बाल्टी धुप के साथ चलती जाती
स्वेटर  बुनती दादी कि छवि…
 ऊन से खलेते भाई  बहिन कि मस्ती
सुबह जल्दी न उठना रजाई में मुह दबके सोना
पापा का दुलार से उठना
बहुत याद आता है सर्दी का फ़साना

रजाई में पढ़ना और पढ़ते पढ़ते सो जाना
नहाने के लिए सोचना और सोचते ही  रह जाना
दाल रोटी कि जगह माँ को रोज़ नयी फरमाईश करना
लाइट बंद करने के लिए कभी रोज़ नए बहाने से किसी को बुलाना
कभी नहीं सोच यह सब याद होती है

आज अपने बच्चो के साथ बनाते देख एक बार फिर जी  लेते है

पर कुछ बहुत सताता है जाने  क्यों वो वक़्त याद आता है
आज गुनगुनाती धुप गुनगुना नहीं रही
वो ठहाके पीछे छूट गए। ।
शायद यह मेरी विडंबना  है समय कब रुका है किसके लिए रुका है
 वो मेरी याद है यह किसी और कि याद बन जायेगा। ................


दिल से 
ऋतू 










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