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गुरुवार, 28 नवंबर 2013

मेरा जीवन का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण  संसस्मरण जितना रोचक इसका शीर्षक है उतना ही दर्दनाक प्रेरणादायक है यह.....
 कैसा हो अगर जीवन के कुछ पल हमारी ज़िन्दगी से गायब ही जाये या हम उन्हें कटवा सकते  हटवा सकते ......काफी बचकानी सोच है पर यह सच है ..मै  एसा दिल से चाहती थी उस पल को हटना ,तो  नहीं पर वैसा जैसा पहले जैसा  सब कुछ ...दोबारा वैसा .........उस के लिए बहुत मन्नत मांगी ............पूरी भी हुई --पर आधी ........मैंने चाह की १८ जून २००४ की सुबह के ६:०० से ६:०५ का समय मेरे परिवार के  जीवनचक्र से हट जाये ...... क्योंकि इस समय पापा का एक्सिडेंट हुआ और हमारी दुनियाबदल गयी.. आज अगर यहे पल न हो तो हमारा जीवन कैसा  होता ..इसका ख्याल आते ही जीवन की मायने और अंधकार का डर सामने आ जाता है शरीर में सिरहन हो जाती है मन बेचैन हो उठता है ...............पापा  को घर से जाना था सुबह उनकी पोस्टिंग असम   में थी  ..वो सुबह ६ बजे निकले घर से निकलते ही ६.०५ पर भाई का फ़ोन आगया पापा हॉस्पिटल में है आ जाओ .में माँ को लेके गयी और रास्ते भर उन्हें समझा रही थी  कही दूर दूर तक विचार था की फ्राक्टरे और दर्द होगा .........अब पापा को जाने मत देना ..हॉस्पिटल जाके देखा तो पापा बेहोश से थे वो कोमा  में जा रहे थे .........हम कुछ नहीं कर पा रहे थे आज भी वो पल में आँखों के सामने है........ कभी नहीं भूल सकती ..मेरे भाई ने पूरा किस्सा बताया की कैसे यहे सब हुआ ..पापा को ऑटो तक छोड़ने के बजाये वो लोग आगे चले गए...... पापा ने घर से ही भाई को बोला में चलाता हु ,तू पीछे बेठ सड़क पर लोहा और वो सब था पापा का बैलेंस बिगड़ गया वो गिर गए और सर वहां बन रही नाली में पास गया पास के लोगो की मदद  से निकला सर निकल भी गया पर पापा की हालत बहुत नाजुक थी डॉक्टर थोड़ी देर बाद आया और बोला सिर्फ एक परसेंट चांस है...... हम सब ठन्डे हो गए सारी  दुआ   मांग ली उस ...२० मिनट में ५० से ज़यादा लोग थे हमारे साथ ...पास वाले अंकल तो हमारे साथ ही गए थे........ मेरी माँ अपनी सुध बुध खो बेठी थी ......इतनी बेबस इतनी लाचार हो गयी थी ...मुझे एसा सुनते ही लगा में गिर जाउंगी---एक मिनट के लिए सब गम -- पर नहीं मुझे भगवान ने हिम्मत दी और दिमाग को शुन्य में पहुंचा  दिया ताकि में जीवित रहू-- मुझे पता था अगर पापा को कुछ हुआ तो हम भी कोई  नहीं बच पाएंगे ..
तईजी  ताउजी चाचा मामा अगले दिन सब आ गए . ..पापा की हालत पूरे २ वीक गिरती गयी रोज़ डॉक्टर को आस की नज़र से देखते पर कुछ नहीं हांसिल होत्ता ...पापा को बुखार हो गया जो उनके लिए बहुत घातक था चाचा और उनके दोस्तों ने बर्फ के पट्टी रखते रह और फिर ठीक किया पापा को बड़े ताउजी पापा की रिपोर्ट लेकर जयपुर गए की कुछ हो जाये वह पर डॉक्टर ने कहा की जो तुम्हे देख राह है वो मेरा ही स्टुडेंट है मामराज जी उनकी चल में और बोली में इतना दम था ....मेरा मन था पापा को उठा के सबसे अच्छे हॉस्पिटल में जाऊ पर सब मेरे बस में नहीं था पापा के स्थति गिर रही थी ३ सप्ताह तक अस्पताल में ICU में थे ........हम बाहर चादर डाल के थे .....किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था शून्य था जीवन  ..रोज़ एक हेड इंजुरी का केस आता और २-४ दिन में सब ख़तम हो जाता .....में पंडित के पास चाचा के साथ जाती जो जो कहता हम करते मेरी माँ मुझे झंकझोर  कर बोलती पापा दे दे .................मेरी हिमत नैन डिगती मेरी ताई जी मेरी हिम्मत  थी सारा घर हमारे साथ था हर तरह से
भगवन में मुझे सब बुद्धि दी मैंने  ३ दिन सारा खर्च अपने ऊपर ले लिया ......बहुत लोग मिलने आये ...जितने डॉक्टर को जानते थे उन सब से बात करवा दी ...हमे सब पहचने लग गए ............घर बन गया हॉस्पिटल ताई जी सुबह सबके लिए खाना  ले आती सब खाते ............नज़र चुरा के/ ................पापा के पास जाकर बोला "भैया जी ..".....पापा पूरे हिल  गए ...ताई जी की आँखों से आंसू बह चले ............उम्मीद की किरण दिखाई दी मेरी सहेलियां मुझसे आकर मिली पर में नहीं रोई .............नहीं/
  २ जुलाई को पापा को रूम में शिफ्ट कर दिया ... ..मेरी बहिन की एक्साम थे भाई का १२ के बाद दाखिला करवाना था ..........पापा में कभी कुछ नहीं मनगा सिर्फ पड़ी के अलवा .....भाई को लेके कोउन्सेल्लिंग में कौन जायेगा ........? में गयी ---जब पापा का हाथ रख के अह्सिर्वाद माँगा पापा पूरे हिल गए हम सब समझ गए हमने कभी पापा का हाथ नहीं छोड़ा .........५ जुलाई को हम डेल्ही गए और ६ को दाखिला ले कर आगये ....मेरी एक बहिन बॉम्बे से पापा के पास आ गयी थी .............महीने भर खूबसेवा की उसने ............बहिन के एक्साम ख़तम हो गए ...वो घर  का देखती में बहार का
.....मेरी माँ स्कूल  जाने लग गयी वो भी ज़रूरी था इलाज में पानी की तरह पैसा जाता था कुछ मिलेगा भी नहीं क्योंकि हम प्राइवेट में इलाज करा रह थे ................पापा को हर दो  घंटे  में करवट दिलना , २बर कपडे बदलना , नाक  से खाना खिलाना  सब सीख रही थी ..सीख लिया था मैंने ..इंसुलिन देना ........सारी  नर्स  हमे जानती थी ..............ताउजी और पापा के सबसे अच्छे दोस्त और भाई भारत ताउजी रात भर पापा को  देखते एके एक करके ...........में और माँ भी वही ..वही से स्कूल जाती और आती घर  की शकल नहीं  देखि हमने ...................सरकारी जगा से अपनी खर्चा करवाने के लिया हमे सरकारी अस्पताल में भारती होना था ७ दिन की लिए हम हुए और बिन जान्पेहचाहन  वाले लोगो की तकलीफ का अंदाज़ लगा पाए /इतना बढ़िया  डॉक्टर  के बाद भी junior  स्टाफ का लालच और बेरुखी को पास से देख घर आने के बाद पापा को जांडिस हो गया हम तुरंत हॉस्पिटल ले गए ...............तब में ११ बजे रात को भी घर आई थी /
क्या कोई अपनी लड़की को छोड़ सकता है ..........!! मेरी माँ एक दुःख में घुल रही थी ....उनकी तबियत गिर रही थी आर बेसुद से सब काम कर रही थी ................हम  १४ जुलाई   को सरकारी हॉस्पिटल में गए २० को आगये और २२ को फिर प्राइवेट में गए ५ दिन बाद घर आ गए पापा को हमारे कमरे में शिफ्ट कर दिया /झाड़ू  पोछा करके उनका कमरा रखते ..लोगो को कम से कम मिलवाते ..............
कभी मुसीबत एक एक करके नहीं आती एक साथ आती ..................एसा हमारे साथ था ....किसी भी चीज़ में काम पैसा नहीं दुगना पैसा लगता था .........कही नहीं तो फ्रिज का ३ बार प्लुग बिन काम के टूट गया बल्ब लाइट ख़राब  हो रहे थे .....पापा ने अंडा नहीं खाया था उनको अंडा देना ज़रूरी था .........दिया .....नाक  से मुह तो अभी भी नहीं  लगया   ................सब एक दुसरे से नज़र चुरा का रो लेते थे ............एक compoundar भैया आते थे जो बहुत हिम्मत  बंधा  के जाने लग गए ...........हमारे पास एक दो लोग आये यह पूछने  के कैसे बचाया पापा को ....क्या जवाब दे ..?पापा के कोई घाव सा दिखा वो बेद सोरे था जल्द ही भयिया  ने इतना ढंग  से इलाज किया वो ठीक हो गया पर छोटा था लेकिन बहुत गहरा .....२ महीने लगे उससे ठीक होने में .
इस बीच एक दिन पापा को पेन पकदया पापा ने उस पेन को बंद खोल किया हम बहुत खुश हो गए जब डॉक्टर को बताया उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा..... हम नयी नयी चीज़े देना शरू कर दिया ....
४ सितम्बर को पापा को होमेपथिक दाई दी ७ को पापा को होश आने लग गया पर आवाज़ नहीं आई ..इसलिए पेन और पेपर पर लिखवाते थे उनसे ..२९ को पापा अच्छे से लिखने बोलना समझ में आने लगा १ अक्टूबर को पापा की फ्य्सिओथेरप्य चालू की जो अब तक जरी है ...........बस करने वाले बदलते रहे .....१२ नवम्बर को पापा की cathedar   भी हटा दिया ... पापा बताने लग गए थे ........पापा का एक हाथ पैर नहीं चाल रहा था ...हमारी चिंता बाद रही थी ....और वो आज ७ साल तक वसा ही है पर मुझे लगता है ...........भगवन से कोई शिकायत नहीं क्योंकिहम उनसे पहले सिर्फ आंख खोलने की बात बोलते थे फिर बोलने के लिए फिर खाने के लिए ...फिर सब याद रखने के लिए ..........फिर चलने के लिए यहे एक चमत्कार था .....इतनी बड़ी इंजुरी के बाद ...यहं तक आना पापा के पास उनकी २ साल की मोमोरी नहीं थी जो धीरे धीरे आ गयी ..
पर एक व्यक्ति जो हमेशा हर काम अपने आप करता हो अचानक उससे पलंग पर बता दिया जाये सब सुनाने के लिए कितना लाचार, कितना विवश मेहस करेगा वो .........पापा के बचे सब अच्छी जगह पर नौकरी करते है उन्हें डिग्री मिली काश वो यह सब चाल के जाकर देख पते लेकिन मुझे पता है ...............वो हमारे साथ है इसका मोल इसकी कीमत को नहीं चूका सकता ................
जितने समय में हॉस्पिटल में थी मैंने रोज़ पापा के किसी किसी मंदिर का टीका लगया .............दूर जहाँ से हर कोई मिलने आया  उनसे ...
जब उनको हम घर में ला रहे थे वो कोमा  में थे लेकिन घर से घुसते हुए उन्होंने ऑंखें खोली ...........मेरा विश्वास पापा ठीक होंगे ज़रूर होंगे सही हुआ ............
चमत्कार जब बह्ग्वान को कुछ अच्छा करना होता है वो खुद रस्ते बनता जाता है हम एक सरे compunder   को पापा के लिया कर रहे थे लेकिन वो मुझे सही नहीं लग रह था ............जब ताउजी बुलने गए तो हामरे पडोसी उन्हें मिले और उन्होंने जो compunder  हंसराज भैया वो देवता है ..............उन्होंने पापा का बेड सोरे ठीक कर दिया जो हमे सिर्फ एक दाना दीख रहा था ........एक शरीफ इन्सान एक सुलझा हुआ वय्क्तित्वा ............मेरी भी हाथ की हाड़ी टूट गयी थी जो पापा के फ्य्सियो थे उन्हने मुझे फ्री में excersice  करव्यी एसा कहाँ होता है .............!!
पूरा घर पूरा स्कूल....दोस्त के दोस्त रिश्तेदारों के रिश्तेदार सब हमारे साथ थे ...................है और रहंगे ............कितने धन्यवाद दू समझ नहीं आता ............हर बार माथा टेक देती हु
पापा सिर्फ चलना नहीं पते थे हम उन्हें ज्वाइन करना चाहते थे लेकिन हो न सका .......जयपुर की लोगो ने ज्वाइन करने से इंकार कर दिया जबकि पापा के डॉक्टर का मानना था की वो ठीक हो सकते है और स्कूल जाने के बाद से वो चलना चयिगे .............मेरे डॉक्टर साहब केस करने को तैयार  थे पर मेरी मा भी वही काम करती थी कहीं उन्हें नुकसान न हो इसलिए ...........................इसका गुस्सा आज भी है मुझे माँ से भी और सिस्टम से भी ...........इसके बाद .. पापा ने एक्स्सरिसे करना छोड़ दिया उन्हें फ्य्सियो को बहुत गाली दी लेकिन आज भी उनकी फ्य्सियो से नहीं बनती पर वो भगवन है हमारे लिए वो आज भी आते है .................कितना नमन करू यही सोचती हु .................
मैंने सितम्बर में डॉक्टर भगवती बॉम्बे हॉस्पिटल को एक चिठ्ठी लिकी थी पापा की पूरी डिटेल के साथ उनका जवाब आज भी याद है ..........".your father is suffering from bad head injury and he is the best possible treatment ".इसके बाद मुझे तसल्ली थी सब ठीक है नहीं तो में गलत लेट इलाज के लिए परेशां होती रहती थी ..............
नेट पर बहुत से चीजे पढ़ी ......
पापा ने जब मेरी शादी में  तिलक किया वो पल मेरे जीवन के लिए यादगार पल है मेरी माँ जब करवाचौथ रखती है जब हम निश्चिंत रहते है माँ पापा के पास है तब सब बेमानी लगता है ...............जब बहिन भाई को अवार्ड मिलता है ...........तब पापा है उनका आशीर्वाद वो दे रहे है यही सोच के जो सुकून  मिलता है उससे दुनिया की किसी दौलत से नहीं तौला जा सकता ........
पापा का एक्सिडेंट से पहले मेरे लिए लड़के देखे हा रहे थे कुछ  लोग पापा के लिए पूछे या नहीं पर मेरी शादी के लिए ज़रूर पूछते थे  ..गुस्सा अत्ता था पर माँ बोलती थी क्या पता हम भी एसा ही करते 
लोग यहे तक बोल देते थे --"एसा जीवन से अच्छा ..........".....पर कौन समझये शायद वक्त समझ देगा इन्सान की कीमत कही ज़यादा होती है ...
मैंने अनगिनत पपेर वर्क और application लिखी थी कभी पापा के इन्सुरांस के लिए कभी नौकरी कभी मेडिकल claim  के लिए 
पापा को फोकल seizure आया शायद में दवा देना भूल गयी थी .................मुझे याद है पापा का मुह कुछ टेड सा हो गया था जल्दी से सब को बुलाया..............
जब हम माकन कह्रीद रहे थे माँ पापा की बहुत बहस होती थी .......माँ घर से ज़यादा अस पास को महत्व देती थी और माँ सही थी पापा के टाइम इसे पडोसी मिले जो रात बी रात हमे लेकर गए ..............सिर्फ एक आवाज़ और सब आ जाते थे ...
मेरे जीवन का रास्ता बदलने वाला सोच और संघर्ष की दास्ताँ था यह .........

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