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मंगलवार, 18 जून 2013

त्योहार की गरिमा

मुझे हर त्योहार मानते हुए लगता  है........ क्या में वसे ही मन रही हु ...जसे की मेरे पुरखे और खानदान  में मान्य जाता है ...क्योंकि में लड़की थी ......शादी के बाद मेरे पति के रिवाज़ मुझे निभने होंगे ...पर अपने बुजुर्ग से दूर है हम ..जैसा  जितना बताया उतना कर दिया ............पर एक कमी और जिज्ञसा का एहसास रहता है ---क्या  त्योहार  इस वंश में मानता होगा  ऐसे ही जैसे में माना रही हु ..हमेशा मेरे दिमाग में घुमने लगती है ..?....जितना इन्टरनेट पे है उतना भी अधुरा है ..क्योंकि बहुत सी रीतियाँ जैसी  थी और जैसी  निबये  जा रहे  है वो अलग है  ............हर रिवाज़ के पीछे छिपे कारण हर आधार से सही होते है (मेरे हिसाब से )...मुझे हर त्योहार में डूब के मानना ख़ुशी और मस्ति के साथ बहुत से खाने और कुछ कुछ बनाना अच्छा  लागता है ....हम सबको अपने बुजुर्गो से पूछकर रिवाज़ को नेट पर डाल देना चाहिए ....आने वाले कल के लिए .......

मैंने  त्योहार की गरिमा और रिश्तो में नमी को महसूस  किया
दादी के हाथ का लड़ ,ताई के लाडू का स्वाद 
चाची की मठरी और बुआ के दुलार को माँ के पूरे मन से भक्ति के भाव
पापा ताऊ चाचा के तोहफे  के अम्बर
हर छोटे बड़े के अपनेपन को घर में महकते रिश्तों को 
रंगोली को खुद से सजाते पकवान बनते
कब रिश्ते अटूट हो गए पता ही नहीं चला
आज ही सोच  रही थी क्या इस भागदौड़ की ज़िन्दगी में
एक मिनट   भी भगवन के लिए नहीं है ...
सब कुछ होते हुए भी मन की शांति नहीं
बड़ो से दूर रहने का दंश रिश्तो में खिचाव
कभी अपनों से जलन,द्वेष ,कपट की भावना
न जाने क्यों हर त्यौहार पे यह सब त्याग लगता है
मन शुद्ध हो जाता है
वर्त मुझे सुखुं देता है
पता नहीं क्यों मुझे लगता है मैंने सफलता प् ली
शायद यही संस्कार होता है .....
जीवन तो बहुत है जेने के लिए पर सफल जीवन इतना असंनहीं
........




शुभ इच्छा
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