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रविवार, 28 अप्रैल 2013

अर्श से फर्श


अर्श से फर्श तक के सफ़र में याद आ गयी 
वो बातें तो अर्श पे चढ़ते  भूल गए थे 
उस सफ़र की याद ही रह गयी 
अर्श पे थे तब फर्श याद न रहा 
फर्श के लोग भी कमज़ोर लग रहे थे 
अपनी धुन और  ख़ुशी में इतना मगरूर थे 
लोग हर तरफ जलते है इस एहसास में भुला दिया
हर नज़र में अपने लिए जलना ही देखना चाहते थे 
हर बात में अपनी तारीफ ही सुनना चाहते थे 
बस " मैं " और सिर्फ " मैं " की दिवार बना ली 
अपने को भाग्यविधाता बना दिया 
माँ पिताजी की इज्ज़त भाई  बहिन का प्यार सब छोटा हो गया 
गुरुर का सुरूर सर चढ़ गया 
आज अपना अक्स अपने बच्चो में देखा तो जाना पाया 
क्या कर दिया मैंने ?
जन्मदाता के कर्मो को तोल दिया 
भाई  बहिन के प्यार का मोल किया
दोस्तों की यारी को जलन करार किया 
आज वहोई अक्स वही आवाज़ सुन रहा हु 
फर्क यह है कल जहाँ में था आज मेरे बच्चो की आवाज़ है 
आज अचानक जब फर्श को छुआ तब एहसास हुआ 
एक नजरिया था अर्श का जो आज फर्श का एहसास करा गया 
कर्म को सुधरने  का मौका धर्म से नहीं मिलता 
कर्म का भोग मैंने किया ...और मरण तक करूँगा 
सही गलत हमेशा पहचान थी पर भटकने में भी तो एक पल ही लगता है 
कभी अपने ऊपर आयेगा यह सोचना भूल गया 
 आज मेरी मूक आवाज़ और दर्द को बटने वाला कोई नहीं 
में एक मुसाफिर था -काबिले में रहना है या यायावर आज तनहा हो गया 
ऊपर नीचे विपरीत है पर बोलना तो साथ ही पड़ता 





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