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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

साल भर खुशियाँ

साल  भर  का  बेटा  मेरा
अपार ख़ुशी से भिगो गया वो पल
आचल में  खुशियाँ   बिखर  गयी  है
कभी  उसकी मुस्कान मुझे हसती
कभी उसके रोने से में रो जाती
उसकी हर बड़ी छोटी चाहत अच्छी लागती
चलना पलटना खाना रोना नयी नयी  चीज़े सीखना
मुझे लगन का  पाठ पड़ा गया  बच्चा
बार बार गिरत फिर उठ जाता
उसी उत्साह से फिर चल पड़ता
मुश्किल है बच्चो की परवरिश
प्यार और डांट का एक समीकरण है
उसकी पहला रोना आज भी ताज़ा है मेरे मन में

dutiful और beautiful है बच्चे का आना
देर  रात तक उठाना कभी इतना थक जाना
फिर भी खुबसूरत है बच्चे का आना
कभी बाल  भी नहीं बना पाती फिर भी कभी खाना नहीं खा पाती
कभी ग़ुम नहीं पाती बड़ा ही प्यारा है यह रिश्ता
सब दे कर बहुत कुछ मिल जाता है
कोई माँ अपने को सपूर्ण नहीं मानती
 हर बच्चे के लिए माँ सबसे बेस्ट होत्ती

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