संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

बहु










बहु को कोई कभी  अपना न पाया
जो बात करे वो किसको न भयी (पसंद आये )
अजब रीत है हर सास बहु होती फिर भी अपना वक्त भूल जाती
घाट घाट का पानी पे कर भी वही पस्त हो जाती है
बहु का कोई सुख नहीं अच्छा लगता
इतनी उम्मीद करते है पर उसकी इच्छा का कोई मान नहीं
बहु को कभी बेटी न बना पाते
अपने अस्तित्त्व को घुलता देख पिगलती बहु एक दिन फिर सास रूप में आ जाती है
कल में भी वही  सास होंगी ...................
बहु बेटे का खर्चा करती पर बचत की भागीदार भी तो होती
यही कम खर्चा  करना होत्ता क्यों बेटे को घोड़ी चदते?
बहु घर के सब का करे ,सब का सम्मान करे
हर सदस्य के फर्मयिएश पूरी करे
पर उसकी छोटी सी चाहत नहीं पूरी  कर पाते
न बुरी नज़र डालो उसके गहने पर कपडे पर
उसके माता पिता का आशीर्वाद है उसमे
नया घर नया रूप है नारी उसका सम्मान करे
अपेक्षा इतनी न हो की उसका दम घुट   जाये
न इतना भेद भाव की दिल को चुभ  जाये
इतना असं नहीं पर इतना मुश्किल भी नहीं
वो भी सास होगी...... इसका एहसास  है उसे भी
 बेटा नहीं बदलती घर को संभालती है
अपने पंख को समाज के बंधन के कारन  नहीं खोल  पाई थी वो खोलना चाहती है
ज़रा प्यार और सम्मान देके देखो
अपेक्षा  के स्तर को कम करके देखो
परिवार का अंग बनके देखो
खुद  बा खुद परिवार में घुल जायगी ...

1 टिप्पणी:

PURNIMA TRIPATHI ने कहा…

बहुत सही कहा है आपने

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.