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शनिवार, 20 नवंबर 2010

तुम्हारा साथ खलने लगता है

आज पैसा ,कल का आराम
कितना  पैसा , कैसा  आराम
हर एक मुकाम के बाद सब कम पड़ जाता है
छोटी छोटी खुश्यिओं पे रोक लगाके बड़े आराम की चीज़ तो आ जाती है
पर वो आराम का मुकाम निकल जाता जाता है
बच्चो के साथ बिताये वो पल जो उनके ज़ेहन में सदियों तक रहते है
वो खोके  चंद  पैसे भी किस काम के
अपने जीवन में  बच्चे  को जायदाद न दे कर अपना समय दे दो
बार बार भीख  मांग रही हु  साथ घुमने और थोड़ी से बात करने का समय दे दो
बुदापे तो ओल्ड age होम में भी निकल  जाता है
क्या पाता कितना वक्त हो उस पड़ाव पर इतने बड़े महलो में एक दीपक भी नहीं जल पाता है
बचत अपनी जगह है और पैसे का जूनून अलग है
कितने ही तनहा लोगो का जीवन चार कंधे के लिए  तरस  जाता है
 जवानी में अपने शौक दबा कर बुदापे में समय का इंतज़ार करते है
जब अकेले रहने की आदत हो जाती है फिर एक साथ मिलता है
तब तक तन्हायी बहुत अपनी  सी लागती है
अलग शौक पल जाते है उस  समय के तुम्हारा साथ खलने  लगता है
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