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सोमवार, 27 सितंबर 2010

अपना साया

चाँद फीका पड़ा गया
अब नहीं किसी का इंतज़ार रहता
किसी से कोई चाहत नहीं
इस  रुसवायी की वजह न जान पाए
कभी असमान के सितारे अपने से थे
कभी चाँद में एक अक्स दिखता था
कभी मन में उमंग बस्ती थी
हर सुबह नयी लागती थी
बिन बारिश जीवन इन्द्रधनुषी होत्ताथा
हर पल किसी  के खयालो की महक थी
एक पल में रेत की तरह सब बह जाता है
ताश की मीनार सा डह गया
मेरे ख्वाबो का गुलिस्तान
अपने साये के तलाश में रूह सी भटक रही हु
फिर से जीना होगा नए सपने सिने होगी
एक नज़रियाँ छोड़ के नए में अपने  को पिरोना है
बस अपना साया मिल जाये
सपनो उम्र खुद बा खुद नाप जाएगी

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