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शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

व्यथा

ख़ामोशी  पाव  पसरती सी
कभी आंसू कभी उदासी बनकर
टूटे कांच के टुकड़ो  में
अपना अक्स  तराशती  सी
खोई सी हैरान है
अपनी ही परेशानियों से त्रस्त है
जीवन  के अस्त होने का इंतज़ार करती
तन्हाईओं  में साथी ढू ढ ती  सी
 बंद  कमरे में  अकेली
अपने विचारो से जूझती
अपनों के पराया  होने से हैरान
बेजान महसूस करती सी
भारी कदमो से आगे बदती हुई
जीवन पथ पर भटकी सी
अपने में  ग़ुम होती सी
अधूरी तमना  और चाहत के बोझ  के साथ
 मुरझाये  फूलो के तरह
पतझड़ के सूखे पतों सी
हवा के हिसाब से चलती हुई
जमी में अपनी जड़ सी जोडती  हुई
अपनी कब्र पर फूल चढ़ती  हुई
अपने आंसू छिपाने की बेअसर  कोशिश करती हुई
अपने हाल पर हर किसको तरस खाता देखती सी
अपनी गलती ढू ढू ती    सी
अपनी शंकाओ का समाधान खोजती सी
खिलोने सी घुमती हुई
गम के संदर में हँसी तलाशती
खुशियों के बहाने बनाती
अपनी खूबसूरती अपनी प्रतिभा छिपाती
कोई नहीं जो दो मीठे बोल बोल दे
दो रोटी के टुकड़े  निगलती
माँ बाप के होते हुए अनाथ सी
थरथरते होटो से अपनी बात बोलने
व्यथा  को व्यक्त करते हुए
                                आगे ..................

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