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शनिवार, 26 जून 2010

आज में परायी हो गयी हु

आज में परायी हो गयी हु
माँ को आना खटकता है
भाई को समय नहीं मिलता है
बहिन को काम हो जाता है
पिता को खर्चा सताता  है
आज में परायी हो गयी हु
दिल से सबके बहार  हो गयी हु
बड़े अफसाने दिए याद के आज तो बस में
एक भूले  बिसरे ज़माने के याद रह गयी हु
जाने क्यों सब ने किया एसा कुछ पराया
मुझे अपना जनम द्वार ने बेगाना बनाया
नारी के अस्तित्व की है लड़ायी
एक घर जन्मी तो दुसरे घर से विदाई
कभी डोली कभी अर्थी में  विदाई 
बस इसके बाद कभी नहीं वो किसको याद आई
एक बेटी फिर माँ बनकर यह सब दोहराती
अपनी विदाई किसको याद नेहीं आती ?

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