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शुक्रवार, 25 जून 2010

एक बार फिर.........


















कुछ  इचछा  मर से गयी है
कुछ तमना  दब सी गयी है
 कदम कुछ उखड से गए
इस जहाँ में एक सूनापन छा गया
 थोड़े से की चाहत  में पूरा लुटा बेठे
बड़े  सपने  पाले थे आज सब गवा बेठे  है 
क्योंकि नए पंख के लगने का इंतज़ार था 
आज पिंजरे  में बेठे है 
रोज़ सुभ नए सूरज को नमस्कार कर 
शामको ढलते सूरज वही पुराना लगता है 
जाने क्यों फिर सुभ नया लगने लगता है 
चाँद में भी तन्हायी नज़र आती है
तारों के चमक फीकी सी लगती  है 
पुराने सपने नए विचार में बुनते रहते है 
पूरे होने की आशा में एक किरण के तरह याद आते रहते है
संपनो को बुनते समय पंख ला देती हु 
कल फिर उड़ने के लिए
नए विचार में एक बार फिर गुम होने के लिए 
हमेशा हर सपने का ओर -छोर हो यह ज़रूरी तो नहीं 
वसे भी फलसफे तो बहुत होते है 
 दुसरो की थाली में जायद ही दिखत या 
छायी वो प्याज़ हो या काजू 
किसको फर्क पड़ा है 
अपना सिक्का खोट लगने वालो को 
कभी कुछ किसकी का अच्छा लगा है..
सबने बहुत कुछ कहाँ हा यही सोच में भी कह बेठी 
क्या रखा है इन सब में यह तो हमेशा लगता रहता है ...............




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