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बुधवार, 5 मई 2010

में बनू बड़ी

में बड़ी तो बहुत हो गयी ,पर बचपन  में लिखी कविता को भूल नयी पाई ,बड़े दिल से इस कविता को महसूस किया है  / बहुत छिपाने की कोशिश करती हु बचपन को पर दिख ही जाता है  

हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ
खूब खेलु खाऊ पियु मौज मनाऊ
चारो तरफ धमा  चौकड़ी मचाऊ
सबको तंग  कर घर सर पे उठाऊ . 
                            हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ
                            मामी जसे पकवान बनाऊ
                            पापा जसे हुकुम चलाऊ
                            दीदी जसे पढ़ लिख जाऊ
                            भैया जसे गाड़ी चलाऊ
हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ
मामी पापा का नाम बढ़ाऊ
सुन्दर से घर में शादी कर के जाऊ
अपने सब कर्त्तव्य निभाऊ
लड़की नंबर वन कहलाऊ  
हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ

2 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

shubhkamnayein jo chaho sab mile...

Udan Tashtari ने कहा…

जल्दी बड़ी हो जाओ, शुभकामनाएँ.

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