संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

गमगीन

कुछ सिसकियाँ सुन लेने से गम  का अंदाज़ा  नहीं होता
किसी की हँसी से रूह तक नहीं पहुंचा  जा सकता
दिल के राज़ पकड़ना इतना असं नहीं होता
थोड़ी ठोकर से संभालना लाजमी होता है
गमो की गठरी छिपना असं नहीं होत्ता
गमगारो से दिल्लगी न करो
चिंगारी को आग बनाने में देर नहीं लागती
हर कोई गम के समंदर से निकल पाए यह मुमकिन नहीं
गम से साये में छिपे चहरे  के अल्फाज़ पढना इतना असं नहीं होता
हर कोई दिल्लगी करे यह बर्दाश्त नहीं होता
ज़बा  में कडवाहट हो यह ज़रूरी नहीं
 मन का रास्ता साफ़ होंना चाहिए /

4 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बढ़िया भाव...बढ़िया प्रस्तुति..धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

सही है!

दिलीप ने कहा…

bhaav bahuyt achche bas thodi typing ki trutiyan khalti hai...zara dekhiye.....

कविता रावत ने कहा…

दिल के राज़ पकड़ना इतना असं नहीं होता
थोड़ी ठोकर से संभालना लाजमी होता है
.... ठोकर लगती इसीलिए है कि हम संभलकर चले .... बस दुःख इस बात का है कि हर कोई यह समझ नहीं पाता.. और ठोकर-दर-ठोकर खाता चला जाता है ..
बहुत अच्छी प्रस्तुति ....
हार्दिक शुभकामनाएँ

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.